क्या है ब्लैक डेथ, जिसके कहर से बचने अजीबोगरीब मास्क पहनने लगे डॉक्टर

क्या है ब्लैक डेथ, जिसके कहर से बचने अजीबोगरीब मास्क पहनने लगे डॉक्टर
चोंचदार मास्क बनाने का श्रेय फ्रेंच डॉक्टर Charles de Lorme को जाता है

करोड़ों जानें ले चुकी ब्लैक डेथ बीमारी चीन (black death in China) में दोबारा दिखी है. पुराने दौर में इससे बचने के लिए डॉक्टर चोंच वाला मास्क पहनते. चोंच के भीतर दालचीनी, लोबान, शहद या परफ्यूम होता.

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कोरोना संक्रमण का आंकड़ा 1 करोड़ 15 लाख पार कर चुका है. एक तरफ वैज्ञानिक इसकी वैक्सीन बनाने में लगे हुए हैं तो दूसरी ओर चीन से ब्लैक डेथ यानी ब्यूबॉनिक प्लेग (Bubonic Plague or Black Death in China) के दो मरीज दिखे हैं. बीमारी के खतरे का अंदाजा इसी बात से लग सकता है कि तुरंत ही चीन ने अलर्ट जारी कर दिया जो साल के अंत तक प्रभावी रहेगा. वैसे पहले भी ये प्लेग तीन बार हमला कर चुका है. तब डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए पीपीई किट भी नहीं हुआ करते थे. उस वक्त वे ऐसा मास्क लगाया करते थे, जिसका मुंह चिड़िया की तरह था और लंबी-सी चोंच बाहर निकली दिखती थी.

कोविड-19 की फिलहाल तक कोई प्रभावी दवा नहीं आई है. वैक्सीन के ट्रायल जारी हैं. ऐसे में ज्यादा से ज्यादा घर पर रहने की सलाह दी जा रही है. अगर बाहर जाना ही पड़े तो मास्क की अनिवार्यता है. लेकिन आज से सैकड़ों साल पहले भी संक्रामक बीमारियां फैलती थीं. जैसे अक्टूबर 1347 में ब्यूबॉनिक प्लेग फैला. ये आज तक के इतिहास में सबसे संक्रामक बीमारी मानी जाती है, जिसने लगभग 20 करोड़ जानें लीं. उस वक्त ब्यूबॉनिक प्लेग के बारे में खास जानकारी नहीं थी, सिवाय इसके कि ये काफी संक्रामक है.

चीन से व्यापार करके लौटने वाले इटैलियन व्यापारियों में ये प्लेग फैला




तब मरते हुए लोगों की जान बचाने में लगे डॉक्टरों के पास मास्क तो था नहीं. लिहाजा उन्होंने काफी दिलचस्प दिखने वाला मास्क तैयार किया. साथ ही पूरी पीपीई किट तैयार की गई. इसमें सिर से पैर तक काले कपड़े होते थे, सिर पर गोल हैट होती और नोंकदार ग्लव्स होते थे. लेकिन पीपीई किट का सबसे मजेदार हिस्सा था मास्क. ये चिड़िया के चेहरे के आकार का होता था, जिसमें चोंच भी निकली होती थी. गूगल पर bubonic plague doctor नाम डालने पर इस पीपीई किट को पहनी हुई तस्वीरें देखी जा सकती हैं.
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तब प्लेग के बारे में जानकारी न होने के कारण डॉक्टर मानते थे कि ये मरीज से निकलने वाली दूषित हवा के कारण होता है. इस दूषित हवा को miasma कहते थे. इससे ही बचाव के लिए वे लंबी चोंच वाला मास्क पहनते. चोंच के भीतर वे खुशबूदार चीजें, जैसे दालचीनी, लोबान, शहद या परफ्यूम आदि रख लेते और तब मरीज के कमरे में जाते थे. उन्हें यकीन था कि खुशबू सूंघते रहने पर गंदी हवा उनकी नाक तक नहीं जा सकेगी और वे बीमारी से बच जाएंगे.

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चोंचदार मास्क बनाने का श्रेय फ्रेंच डॉक्टर Charles de Lorme को जाता है. वे 17वीं शताब्दी में फ्रांस के काफी ख्यात डॉक्टर थे, जो राजाओं का इलाज किया करते. पीपीई किट के साथ ही मरीज को देखने वाले लोग अपने एक लोहे की एक रॉड भी रखा करते थे. वे मरीज को देखने से पहले इससे ठेलकर पीछे करते थे. ये सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेंन करने का 17वीं सदी का तरीका था.

ये आज तक के इतिहास में सबसे संक्रामक बीमारी मानी जाती है, जिसने लगभग 20 करोड़ जानें लीं


हालांकि जिस गंदी हवा से बचने के लिए इतने तरीके आजमाए गए, वो बीमारी हवा से नहीं, बल्कि येर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया से होती थी. चूहों में पाया जाने वाला ये बैक्टीरिया मक्खियों के जरिए इंसानों में फैलता था. बीमारी की शुरुआत होती है साल 1347 के अक्टबूर से, जब 12 जहाज इटली के सिसली बंदगाह पर लगे. जहाज पर गए लोगों के परिवार उनके इंतजार में किनारे खड़े थे. जब तट पर लगने के काफी देर बाद तक जहाज से कोई नहीं उतरा तो नीचे इंतजार में खड़े लोग ऊपर पहुंचे. वहां का नजारा देखते ही चीखें निकल गईं. जहाज पर लाशों का ढेर लगा था. कुछेक लोग ही जिंदा थे. उन्हें उठाकर लाया गया और ठीक होने का इंतजार शुरू हुआ.

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जिंदा बचे लोगों की हालत भी ठीक नहीं थे, उनके शरीर पर गिल्टियां बनी हुई थीं, जिनसे पस (मवाद) और खून बह रहा था. वे लोग तो ठीक नहीं हुए, बल्कि उनकी देखभाल कर रहे लोग भी बीमार होने लगे. अगले 5 सालों में उन 12 जहाजों के कारण यूरोप में 20 मिलियन से भी ज्यादा जानें गईं. मौतों का ठीक आंकड़ा अब तक बताया नहीं जा सका लेकिन माना जाता है कि इसकी वजह से एक तिहाई यूरोपियन आबादी की मौत हो गई. बाद में उन जहाजों को डेथ शिप कहा गया.

चोंच के भीतर वे खुशबूदार चीजें, जैसे दालचीनी, लोबान, शहर या परफ्यूम आदि रख लेते (Photo-Flickr)


इटली और यूरोप के दूसरे देशों तक पहुंचने से पहले चीन से ही प्लेग की शुरुआत हुई थी. इतिहासकारों के अनुसार लगभग 2 हजार साल पहले चीन की वजह से ही दूसरे देशों में प्लेग का एक खास प्रकार पहुंचने लगा. अक्सर व्यापार के आने-जाने वाले जहाजों के जरिए ये फैलता था. 1340 के बाद चीन में एक बार​ फिर प्लेग ने दस्तक दी लेकिन अब ये बड़ी तेजी से दूसरे महाद्वीपों तक पहुंच गया. साल 1346 में यूरोप के 12 जहाज चीन की सीमा पर लगे थे, तब वहां प्लेग चल रहा था.

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तेजी से फैली बीमारी
प्लेग से संक्रमित चूहे सामान के साथ जहाज पहुंच गए और लगभग 4 हफ्तों के रास्ते में उनसे होता हुआ संक्रमण जहाज के हरेक आदमी तक पहुंच गया. इनमें व्यापारी भी थे, नाविक भी और दूसरे कर्मचारी भी. जल्दी ही जहाज लाशों और बीमारों से पट गया. इटली पहुंचने पर इसी जहाज के जरिए बीमारी दूसरों तक पहुंची और लगभग 8 महीनों के भीतर ही बीमारी अफ्रीका, इटली, स्पेन, इंग्लैंड, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, हंगरी, स्विट्‌जरलैंड, जर्मनी, स्कैन्डिनेविया और बॉल्टिक पहुंच चुकी थी.

लगभग 2 हजार साल पहले चीन की वजह से ही दूसरे देशों में प्लेग का एक खास प्रकार पहुंचने लगा था


इलाज कैसे होता था
तब प्लेग के इलाज के लिए अजीबोगरीब तरीके अपनाए जाते थे, जैसे गिल्टियों पर उबलता पानी डाल देना या उस हिस्से को गर्म सलाख से दागना. ज्यादातर मरीजों की इलाज के दौरान ही मौत हो जाती. जल्दी ही यूरोप के लोग इस बीमारी को ईश्वर की नाराजगी मानने लगे. इससे बचने के लिए वे तरीके खोजने लगे. इसी दौरान एक अजीब और भयानक प्रथा जन्मी, जिसे मानने वाले ईश्वर के गुस्से से बचने के लिए खुद को कोड़े मारते थे, उन्हें Flagellants कहा जाता था. ये लोग साढ़े 33 दिनों तक दिन में रोज 3 बार खुद को कोड़े मारते. धीरे-धीरे ये पंथ लोकप्रिय हो गया लेकिन प्लेग ने तब भी पीछा नहीं छोड़ा.
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