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03 जनवरी 1948 : जब एक हिंदू ने गांधी से पूछा, आप मुस्लिमों से दोस्ताना क्यों हैं

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: January 3, 2019, 10:41 PM IST
03 जनवरी 1948 : जब एक हिंदू ने गांधी से पूछा, आप मुस्लिमों से दोस्ताना क्यों हैं
गांधी की हत्या से पहले

30 जनवरी 1948 के दिन गांधीजी की हत्या हुई. गांधीजी की 150वें वर्षगांठ वर्ष में हम आज से 30 जनवरी तक रोज ये बताएंगे कि आज महात्मा गांधी ने क्या किया...क्या कहा

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  • Last Updated: January 3, 2019, 10:41 PM IST
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3 जनवरी 1948 का दिन भी महात्मा गांधी के लिए  पिछले दिन की मनोस्थितियों से अलग नहीं था. हिंदू संगठन उन पर मुस्लिमों का साथ देने का आरोप लगा रहे थे. उन्हें एक हिंदू का एक लंबा नाराजगी भरा खत मिला कि वो मुसलमानों के साथ इतने दोस्ताना क्यों हैं.

अंग्रेजी समाचार पत्र "द हिंदू" द्वारा प्रकाशित किताब "महात्मा गांधी-द लास्ट 200 डेज (लेखक वी राममूर्ति)" में 3 जनवरी 1948 के दिन को गांधीजी के ऐसे दिन के रूप में जाहिर किया गया, जिसमें गांधी खिन्न थे. उसी दिन उन्होंने जो खत लिखे. उससे उन्होंने फिर मनोस्थिति, निराश और खिन्नता को जाहिर किया.

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उस दिन उन्होंने सांप्रदायिक सद्भाव पर कहा, "मुझे एक हिंदू नागरिक द्वारा लिखा गया एक लंबा पत्र मिला है. जिसने मुझसे नाराजगी करते हुए कहा है कि अब तक की घटनाओं से मैने कुछ नहीं सीखा है. इसीलिए मैं मुसलमानों के साथ दोस्ताना हूं. वो ये जानना चाहता है कि क्या मैंने कभी ये सोचा है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच लड़ाई छिड़ जाए तो भारतीय मुस्लिम किसके प्रति वफादार होंगे और पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में शिरकत करेंगे."



कैसा था 03 जनवरी 1948 गांधीजी के लिए (फाइल फोटो)


जहां भी रहें मनुष्य की तरह रहें
उन्होंने कहा, "मैं यही कह सकता हूं कि हम जहां भी रहना चाहें, वहां एक मनुष्य की तरह रहें. किसी के लिए गलत नहीं सोचें. हर कोई गैर भरोसेमंद नहीं होगा. पूरी दुनिया में क्या हर कोई गैर भरोसेमंद हो सकता है. जिसने भी मुझे ये पत्र लिखा है वो सहिष्णुता से परे जाकर गुस्से में है. हमारा यही अविश्वास देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार है."

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गांधीजी ने नाराजगी और खिन्नता को जाहिर करते हुए आगे कहा, "आज हर ओर जहर फैल रहा है. कश्मीर ने इसमें और जहर घोला है. अगर लड़ाई हुई तो दोनों देश लहूलुहान होंगे. मैं अब जिंदा नहीं रहना चाहता. ना ये संहार देखना चाहता हूं."

भगवान अब मुझे उठा ले
"मैं केवल भगवान से प्रार्थना कर सकता हूं. आप सबसे कहूंगा कि आप इस प्रार्थना में शामिल हों कि भगवान अब मुझे उठा ले. मैं प्रार्थना करूंगा कि वो हमारी अज्ञानताओं और पागलपन को खत्म करे ताकि देश आगे बढ़ सके."

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 ज्यादा तल्ख थे गांधीजी
ये कह सकते हैं कि 03 जनवरी का दिन गांधी के लिए ऐसा दिन था, जब वो खतों का जवाब देते हुए ज्यादा तल्ख थे. 21 दिसंबर 1947 को "हरिजन" के अंक में देव प्रकाश नायर का एक लेख प्रकाशित हुआ "तकली का बौद्धिक तत्व". इस पर गांधीजी को किसी ने मालाबार से खत लिखकर लेख की खिल्ली उड़ाई. इसके जवाब में गांधीजी ने हरिजन में एक जवाबी लेख ही लिख दिया. वो इस तरह था-

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"किसी शख्स ने मालाबार से मुझे खत लिखा है. जिसमें उसने लेख के खिलाफ भड़ास निकाली. उन्होंने कहा कि ये लेख किसी को भी भरमा सकता है कि तकली, चरखा और कताई को शिक्षा से जोड़ा जाए. खासकर शुरुआती तालीम के दौरान. लेकिन इस लेख में उनका ये कहना कि तकली से ही आपको स्वाभाविक तौर पर मैथ, फिजिक्स और इकोनॉमिक्स आदि का ज्ञान मिलेगा, इसे भावुकता भरी बेवकूफी ही कहना चाहिए. तकली उत्साहियों को इस तरह के तर्क करने की जरूरत नहीं."

गांधीजी देश में उभरती सांप्रदायिकता को बंटवारे की जड़ मानते थे (फाइल फोटो)


मैने कब कहा कि तकली में सारा ज्ञान है
जवाब में गांधीजी ने कहा, "लगता है कि पत्र लिखने वाले ने नायर के लेख को ध्यान से पढ़ा नहीं. मैने भी इसे पढ़ा है. इसमें कहीं ऐसा दावा नहीं किया गया है. पत्र लिखने वाले ने लगता है कि खुद ही बहुत कुछ सोच लिया. लेखक ने कहीं नहीं लिखा कि तकली में ही सारा ज्ञान है या सबकुछ तकली से पैदा हुआ है और ना तो उसने तकली को ज्ञान का सार लिखा. हां, उसने तकली के जरिए ये बताया कि किताबी ज्ञान की बजाए बेहतर हो कि व्यावहारिक ज्ञान मिले. चरखा और तकली का पक्ष मैने इस संदर्भ में लिया कि ये स्वालंबी और हमारे नैतिक बल को उठाने का प्रतीक है. लेकिन मैं ये भी कहूंगा कि व्यावहारिक तौर पर मालूम होना चाहिए कि हैंडीक्राफ्ट में बहुत संभावनाएं हैं."

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First published: January 3, 2019, 3:04 PM IST
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