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गांधी से पहले भी हुआ था 'असहयोग आंदोलन', इस सिख धर्मगुरु ने की थी शुरुआत

News18Hindi
Updated: February 3, 2020, 10:29 AM IST
गांधी से पहले भी हुआ था 'असहयोग आंदोलन', इस सिख धर्मगुरु ने की थी शुरुआत
नामधारी संप्रदाय की शुरुआत करने वाले सद्गुरु राम सिंह कूका ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन छेड़ा था.

भारत की आजादी की लड़ाई (Indian Freedom Struggle) में असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी से जोड़कर देखा जाता है. लेकिन उनसे पहले भी एक सिख धर्मगुरु ने अंग्रेजों को खिलाफ बड़ा असहयोग आंदोलन छेड़ा था.

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  • Last Updated: February 3, 2020, 10:29 AM IST
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भारत के स्वतंत्रता संग्राम में असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation) को आम तौर पर महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) के साथ जोड़कर देखा जाता है. महात्मा गांधी ने स्वराज को लेकर ब्रिटिश सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन की शुरुआत की थी. ये आंदोलन देश में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक बड़ी आवाज बन गया था. लेकिन कम लोगों को पता है कि भारत में गांधी के इस असहयोग आंदोलन से पहले भी एक भारतीय ने अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन किया था. इनका नाम था राम सिंह कूका और इन्होंने सिखों के नामधारी संप्रदाय की स्थापना की थी. इन्हें सद्गुरु राम सिंह कूका ने नाम से जाना जाता है.

महाराजा रणजीत सिंह की सेना का बने हिस्सा
गुरु रामसिंह कूका का जन्म 3 फरवरी 1816 की वसन्त पंचमी को लुधियाना के भैणी गांव में जस्सासिंह के घर में हुआ था. शुरुआत से ही धार्मिक रुझान रखने वाले राम सिंह कुछ सालों तक महाराजा रणजीत सिंह की सेना में भी रहे. वो नामधारी आंदोलन की शुरुआत करने वाले बालक सिंह के शिष्य बन गए. बालक सिंह से ही राम सिंह ने सिख धर्म की गुरुओं और खालसा पंथ की बेहतर तालीम हासिल की. अपनी मृत्यु के पहले बालक सिंह ने राम सिंह को नामधारियों का लीडर बना दिया.

महाराजा रणजीत सिंह


20 साल की उम्र में राम सिंह ने महाराजा रणजीत सिंह की सेना ज्वाइन की. तीन साल बाद जब महाराजा की मृत्यु हो गई और उनकी सेना और वैभव कमजोर पड़ गए. तब ब्रिटिश सरकार के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए राम सिंह ने सिख संप्रदाय के सम्मान की रक्षा के लिए काम करना शुरू किया. उन्होने नामधारियों में कई नई प्रथाएं शुरू कीं. वो समाज सुधार की दिशा में काम करने लगे.

जब बढ़ता गया प्रभाव
1860 तक धर्मगुरु के तौर पर राम सिंह कूका का प्रभाव काफी विस्तृत हो गया था. उनके पंथ के मानने वालों की तादाद अच्छी खासी हो गई थी. राम ने खुले तौर पर ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए गए सामानों का इस्तेमाल न करने की मुहिम चलाई थी. ब्रिटिश सरकार के साथ किसी भी तरह का सहयोग न करने की उनकी नीति को भारत में पहले असहयोग आंदोलन के तौर पर देखा जाता है. वो लोगों को जागरूक करते थे कि ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए गए कपड़ों का प्रयोग न किया जाए और न ही ब्रिटिश एजुकेशन सिस्टम का हिस्सा बना जाए. वे सबसे अंग्रेजों का विरोध करने तथा समाज की कुरीतियों को मिटाने को कहते थे. उन्होंने सामूहिक, अन्तरजातीय और विधवा विवाह की प्रथा चलाई. उनके शिष्य ही ‘कूका’ कहलाते थे.आंदोलन दबाने की कोशिश
राम सिंह के अंग्रेजों की इस खुली खिलाफत का खामियाजा भी उठाना पड़ा. ब्रिटिश सरकार ने कई कूका लोगों को गोली मरवाकर हत्याएं करवा दी थीं. कइयों को तोप के सामने रखकर उड़वा दिया गया था. अंग्रेज जानते थे कि इन सबके पीछे गुरु रामसिंह कूका की ही प्रेरणा है. इसलिए उन्हें भी गिरफ्तार कर बर्मा की एक जेल में डाल दिया गया. 14 साल तक कठोर अत्याचार सहकर 1885 में सदगुरु रामसिंह कूका ने अपना शरीर त्याग दिया.

2014 में भारत सरकार द्वारा जारी किए गए डाक टिकट की तस्वीर


2014 में भारत सरकार ने जारी किया था डाक टिकट
साल 2014 में राम सिंह कूका की याद में भारत सरकार ने एक डाक टिकट जारी किया था. सूचना एवं प्रसारण मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राम सिंह कूका के बलिदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है. उन्होंने कहा था कि कूका आंदोलन के लोगों ने ब्रिटिश सरकार के तानाशाही रवैये के खिलाफ बड़े स्तर पर आवाज उठाई थी. कूका आंदोलन न सिर्फ देशभक्ति का बल्कि आत्मसम्मान का आंदोलन भी था.
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First published: February 3, 2020, 10:06 AM IST
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