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भाषा जंक्शन : भाषाएं कैसे हमारे दिमाग का विकास करती हैं

क्या है ब्रेन और भाषाओं का रिश्ता.

क्या है ब्रेन और भाषाओं का रिश्ता.

भाषा और संवाद उतना ही अहम होता है जितना खाना और पानी. ये भाषा ही है, जिसके जरिए हम रिश्ते बनाते हैं, जानकारी हासिल करते ...अधिक पढ़ें

जब हम पैदा होते हैं तो हमें कोई भाषा नहीं आती लेकिन हमारा ब्रेन सबसे पहले अगर चीजों को पहचानता है तो भाषा भी सीखता है. कहा जा सकता है कि भाषाओं के साथ ब्रेन का स्वाभाविक विकास होता है. भाषाएं ब्रेन को सक्रिय करती हैं. ब्रेन को विकसित करती हैं. जब भी हम कोई भाषा बोलते हैं तो ब्रेन का काफी हिस्सा इसमें सक्रिय होता है. वैसे रिसर्च ये कहती हैं कि जब हम हिंदी पढ़ते और बोलते हैं तो अंग्रेजी की बजाए ब्रेन का ज्यादा हिस्सा सक्रिय हो जाता है.

मानेसर में नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर (एनबीआरसी) है. जिसने कुछ समय पहले ये अध्ययन किया कि जब हम हिंदी बोलते हैं तो ब्रेन में क्या होता है. इसके लिए उसने फंक्शनल मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग (एफएमआरआई) का इस्तेमाल किया.

हिंदी बोलते समय ब्रेन कितना सक्रिय रहता है
देवनागरी में व्यंजन बाएं से दाएं लिखे जाते हैं जबकि स्वर के चिन्ह इनके आगे या ऊपर-नीचे इस्तेमाल होते हैं. हिन्दी लिपी में स्वर और व्यंजन को साथ मिलाकर लिखने से जो स्क्रिप्ट तैयार होती है, वो खास होती है लेकिन जब हम इसे बोलते हैं तो भी ये खास स्क्रिप्ट का ही काम करती है. इस रिसर्च सेंटर के अध्ययन ने बताया कि हिंदी बोलते और लिखते समय दिमाग का बायां और दायां दोनों हिस्सा सक्रिय हो जाता है.

मानव दिमाग में कुछ पढ़ने के लिए तय न्यूरोलॉजिकल सर्किट्स नहीं होते हैं. इसलिए जब कुछ पढ़ना होता है तो दिमाग खुद नई संरचना तैयार करता है या फिर ब्रेन के कुछ हिस्सों को सक्रिय कर देता है. दिमाग का कितना और कौन सा हिस्सा सक्रिय होगा, ये उस स्क्रिप्ट पर निर्भर करता है.

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हिंदी बोलते और लिखते समय स्वर और व्यंजन का तालमेल अगर बाएं से दाएं लेखनी में होता है तो मात्राएं ऊपर और नीचे की ओर भी होती हैं, जिससे ब्रेन का बड़ा हिस्सा इसके साथ सक्रिय होता है, ये ब्रेन पॉवर के लिए बेहतर होता है.

जब अंग्रेजी या दूसरी भाषाएं पढ़ी जाती हैं
जब अंग्रेजी पढ़ी जाती है तो इस भाषा में रोमन अल्फाबेट्स का इस्तेमाल होता है. इसमें ना तो मात्राएं होती हैं और ना ही स्वर और व्यंजन, हालांकि ये भी बाएं से दाएं लिखी जाती है, लेकिन अंग्रेजी पढ़ते समय ब्रेन का केवल बायां हिस्सा ही सक्रिय रहता है. वैसे चाइनीज भाषा बोलते समय भी दिमाग के दोनों हिस्से सक्रिय हो जाते हैं. साइंटिस्ट ने ये पाया है कि भाषाओं को पढ़ते समय दिमाग का बायां या दायां हिस्सा सक्रिय होता है लेकिन कुछ भाषाओं में ये दोनों हिस्से एक्टिव हो जाते हैं.

पीएनएएस जर्नल में प्रकाशित शोधपत्र के अनुसार जब व्यक्ति कोई शब्द पढ़ता है तो मस्तिष्क में दो प्रक्रिया एक साथ होती है. वैज्ञानिक भाषा में एक प्रक्रिया ‘बॉटम-अप’ कहलाती है जिसके द्वारा मस्तिष्क अक्षरों को पहचानता है और दूसरी प्रक्रिया ‘टॉप-डाउन’ कही जाती है, जिससे मस्तिष्क स्मृति की सहायता से उन शब्दों का अर्थ समझता है.

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ब्रेन के बाएं हिस्से में लेंग्वेज के दो सेंटर्स होते हैं लेकिन आमतौर पर कई भाषाओं को बोलते समय दिमाग के दूसरे हिस्से भी साथ में सक्रिय हो जाते हैं.

ब्रेन में कहा होता है लेंग्वेज सेंटर 
ब्रेन सबसे पहले हमारी वो भाषा सीखता है, जिसको मातृभाषा कहते हैं, यानि हमारे पैदा होने के समय और उसके बाद पेरेंट्स और परिवार के लोग बोलते हैं. हालांकि बड़े होने के साथ हम स्कूलों या परिवेश के चलते एक या दो भाषाएं सीखने लगते हैं. ये सवाल नेचुरल है कि ब्रेन में लेंग्वेज सेंटर कैसा और कहां होता है और जब हम कई भाषाएं सीखते या बोलते हैं तो मस्तिष्क कैसे काम करता है.
शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि दिमाग में दो लेंग्वेज सेंटर होते हैं, जो दोनों ब्रेन के बाएं हिस्से में होते हैं. जिनका काम किसी लेंग्वेज को समझना है. इसलिए अगर कभी हमारे ब्रेन में चोट लग जाती है और बाएं ओर का हिस्सा प्रभावित होता है तो हमारे बोलने पर असर पड़ता है.

जब कई भाषाएं सीखते हैं तो क्या होता है असर 
हालांकि जब हम कई भाषाएं सीखते हैं तो उन्हें अच्छी तरह सीखते हैं तो इसका ब्रेन पर अपना अलग तरीके से असर होता है ये ब्रेन के ज्यादा हिस्सों को सक्रिय करता है और उन्हें बेहतर बनाता है लेकिन ये बढ़े हुए ब्रेन के हिस्से इसके परपंरागत लेंग्वेज सेंटर से अलग होते हैं.
स्वीडन की लुंद यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पाया कि भाषा से ब्रेन के हिप्पोकैंपस हिस्से का विकास होता है, ये हिस्सा सीखने और कुछ तलाशने, पता लगाने के काम में आता है. साथ ही ज्यादा भाषाएं सीखने में ब्रेन का सेरेब्रल कोर्टेक्स या बाहरी परतें भी काम करती हैं.

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कई भाषाएं सीखना हमेशा ब्रेन के विकास के लिए अच्छा रहता है, ये हमें कई दिमागी बीमारियों से भी बचाता है.

बचपन में कई भाषाएं सीखना क्यों होता है आसान
हालांकि एक और रिसर्च कहती है कि बचपन में हमारे लिए ज्यादा भाषाएं सीखना आसान होता है क्योंकि तब ब्रेन इसको आसानी से प्रोसेस कर लेता है औरं नई सूचनाओं को बखूबी अपने पास संजो लेता है. इससे ये भी पता चलता है कि जब भाषाएं सीखते हैं तो ब्रेन कोशिकाएं नए कनेक्शंस तेजी से बनाती हैं.

ये भी कहा जाता है कि जब हम बचपन में कई भाषाएं सीखते हैं तो ब्रेन का तेजी से विकास करते हैं. ऐसा मस्तिष्क के कार्यकारी नियंत्रण क्षेत्र में ‘ग्रे मैटर’ के अधिक जमाव के कारण होता है. पहले माना जाता था कि दो भाषा सीखने से बच्चों में भाषा के विकास में विलंब होता है, क्योंकि इसके लिए उन्हें दो शब्दावलियों को विकसित करना पड़ता है.

बाद में ये गलत साबित हुआ. शोधकर्ताओं ने अमेरिकन साइन लैंग्वेज व स्पोकन इंग्लिश के द्विभाषियों तथा एक भाषा के जानकारों के ग्रे मैटर के बीच तुलना की. जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर (जीयूएमसी) में सेंटर ऑफ लर्निंग के निदेशक ग्विनेवेयर इडेन ने कहा, ‘एक भाषा बोलने वालों की तुलना में दो भाषाओं का अनुभव तथा उनका सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए संज्ञानात्मक नियंत्रण की जरूरत में वृद्धि के परिणामस्वरूप स्पेनिश-अंग्रेजी भाषा बोलने वालों के दिमाग में कुछ बदलाव आते हैं.’

शोधकर्ताओं ने दो भाषा तथा एक भाषा बोलने वालों के ग्रे मैटर के बीच तुलना की. दो भाषा बोलने वालों के मस्तिष्क के फ्रंटल व पेराइटल क्षेत्रों में ज्यादा ग्रे मैटर पाए गए, जो मस्तिष्क के कार्यकारी नियंत्रण में शामिल होते हैं.

तब किन बीमारियों के शिकार नहीं होते
माना जाता है कि अगर आप कई भाषाएं बोलते हैं तो ये ब्रेन के लिए बेहतर होता है. इससे हम अल्जाइमर और देमेंतेशिया जैसी बीमारियों के शिकार नहीं होते

Tags: Brain, Brain power, Hindi Language, Language

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