अंबेडकर ने अपने अनुयायियों के साथ क्यों चुनी थी बुद्धम शरणं गच्छामि की राह

सामुहिक धर्म परिवर्तन के दौरान भीम राव अंबेडकर.
सामुहिक धर्म परिवर्तन के दौरान भीम राव अंबेडकर.

साल 1940 में अपने अध्ययन के आधार पर अंबेडकर ने द अनटचेबल्स (The Untouchables) में लिखा कि भारत में जिन्हें अछूत कहा जाता है, वो मूल रूप से बौद्ध धर्म के अनुयायी थे और ब्राह्मणों ने इसी कारण उनके साथ नफरत पाली. इस थ्योरी के बाद अंबेडकर ने 1944 में मद्रास में एक भाषण में कहा और साबित किया कि बौद्ध धर्म सबसे ज़्यादा वैज्ञानिक और तर्क आधारित धर्म है.

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14 अक्टूबर 1956 को भीम राव अंबेडकर (Bhimrao Ambedkar) ने अपने 3 लाख 65 हजार दलित अनुयायियों के साथ इतिहास कायम किया था. उन्हें हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना (Conversion to Buddhism) लिया था. अंबेडकर के बौद्ध धर्म अपनाने की वजह से भारत में दलित आंदोलन को एक नई दिशा मिली थी. इसके बाद आगे चलकर बड़ी संख्या में दलित जाति के लोग बौद्ध धर्म अपनाते गए. वक्त के साथ इस मूवमेंट को दलितों की बड़ी आवाज माना गया.

अंबेडकर वर्ण व्यवस्था की वजह से आजीवन हिंदू धर्म के आलोचकों में से रहे. वो ब्राह्मणवाद को भारत के अंग्रेजों से भी बड़ा खतरा मानते थे. उनके हिंदू धर्म छोड़ने की शुरुआत 1935 के एक भाषण से होती है. हिंदू धर्म में जातिवाद के साथ बचपन से ही संघर्ष करने वाले अंबेडकर ने पहली बार एक आक्रामक और ज़बरदस्त भाषण देकर नीची समझी जाने वाली जातियों को आंदोलित किया था. महाराष्ट्र के येवला में शोषित वर्ग को धर्म चुनने का अधिकार देने की वकालत करने वाले इस भाषण में पूरे समाज की पीड़ा और भावना इस कदर छुपी थी कि एक ऐतिहासिक घटना का जन्म होना ही था. देखें उस यादगार भाषण के ये अंश :

आप एक सम्मानजनक जीवन चाहते हैं तो आपको अपनी मदद खुद करनी होगी और यही सबसे सही मदद होगी... अगर आप आत्मसम्मान चाहते हैं, तो धर्म बदलिए. अगर एक सहयोगी समाज चाहते हैं, तो धर्म बदलिए. अगर ताकत और सत्ता चाहते हैं, तो धर्म बदलिए. समानता.. स्वराज .. और एक ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं, जिसमें खुशी खुशी जी सकें तो धर्म बदलिए.



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बाबासाहेब ने सिर्फ दलितों के उत्थान की बात नहीं की बल्कि समाज के सभी शोषित वर्गों और खासकर महिलाओं के सशक्तिकरण पर जोर दिया.

अलग धर्म अपनाने पर की लंबी रिसर्च
'मैं हिंदू धर्म में पैदा ज़रूर हुआ, लेकिन हिंदू रहते हुए मरूंगा नहीं.' 1935 में ही अंबेडकर ने इस वक्तव्य के साथ हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा कर दी थी. लेकिन, औपचारिक तौर पर कोई अन्य धर्म उस वक्त नहीं अपनाया था. अंबेडकर समझते थे कि यह सिर्फ उनके धर्मांतरण की नहीं बल्कि एक पूरे समाज की बात थी इसलिए उन्होंने सभी धर्मों के इतिहास को समझने और कई लेख लिखकर शोषित समाज को जाग्रत व आंदोलित करने का इरादा किया.

बौद्ध धर्म को माना सबसे तार्किक
साल 1940 में अपने अध्ययन के आधार पर अंबेडकर ने द अनटचेबल्स में लिखा कि भारत में जिन्हें अछूत कहा जाता है, वो मूल रूप से बौद्ध धर्म के अनुयायी थे और ब्राह्मणों ने इसी कारण उनके साथ नफरत पाली. इस थ्योरी के बाद अंबेडकर ने 1944 में मद्रास में एक भाषण में कहा और साबित किया कि बौद्ध धर्म सबसे ज़्यादा वैज्ञानिक और तर्क आधारित धर्म है. कुल मिलाकर बौद्ध धर्म के प्रति अंबेडकर का झुकाव और विश्वास बढ़ता रहा. आज़ादी के बाद संविधान सभा के प्रमुख बनने के बाद बौद्ध धर्म से जुड़े चिह्न अंबेडकर ने ही चुने थे.

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फिर हुआ ऐतिहासिक धर्म परिवर्तन
14 अक्टूबर 1956 को नागपुर स्थित दीक्षाभूमि में अंबेडकर ने विधिवत बौद्ध धर्म स्वीकार किया. इसी दिन महाराष्ट्र के चंद्रपुर में अंबेडकर ने सामूहिक धर्म परिवर्तन का एक कार्यक्रम भी किया और अपने अनुयायियों को 22 शपथ दिलवाईं जिनका सार ये था कि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद किसी हिंदू देवी देवता और उनकी पूजा में विश्वास नहीं किया जाएगा. हिंदू धर्म के कर्मकांड नहीं होंगे और ब्राह्मणों से किसी किस्म की कोई पूजा अर्चना नहीं करवाई जाएगी. इसके अलावा समानता और नैतिकता को अपनाने संबंधी कसमें भी थीं.

धर्म परिवर्तन और उसके बाद
अंबेडकर के धर्म परिवर्तन को असल में दलित बौद्ध आंदोलन के नाम से इतिहास में दर्ज किया गया, जिसके मुताबिक अंबेडकर के रास्ते पर लाखों लोग हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध बने थे. लेकिन, 6 दिसंबर 1956 को अंबेडकर की मृत्यु के बाद यह आंदोलन धीमा पड़ता चला गया. 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में करीब 84 लाख बौद्ध हैं, जिनमें से करीब 60 लाख महाराष्ट्र में हैं और ये महाराष्ट्र की आबादी के 6 फीसदी हैं. जबकि देश की आबादी में बौद्धों की आबादी 1 फीसदी से भी कम है.

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