नंदीग्राम से चुनाव : ममता बनर्जी के बड़े फैसले के पीछे 5 बड़े प्लॉट

न्यूज़18 कार्टून

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West Bengal Assembly Elections 2021 : विरोधी के गढ़ में घुसकर लड़ने, BJP के बढ़ते रथ को रोकने के मंसूबों के बीच जानना यह चाहिए कि ममता के गणित क्या हैं और पीके (Prashant Kishor) साथ ही बोस का क्या रोल है?

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  • Last Updated: March 8, 2021, 12:22 PM IST
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री (West Bengal CM) ममता बनर्जी ने नंदीग्राम से चुनाव (Nandigram Election) लड़ने का ऐलान किया, तो आश्चर्य की बात नहीं थी क्योंकि जनवरी में वो इस फैसले के स्पष्ट संकेत दे चुकी थीं. आश्चर्य की बात यह थी कि भवानीपुर सीट (Bhabanipore) ममता ने छोड़ी और नंदीग्राम के साथ ही एक और सीट से लड़ने का अपना विकल्प खुला रखा. नंदीग्राम सीट पर उन सुवेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) का ज़मीनी आधार बताया जाता है, जो ममता की तृणमूल कांग्रेस (TMC) से बिदककर भाजपा का बंगाल में चेहरा बन चुके हैं.

बंगाल में भाजपा का मतलब एक तरह से अधिकारी परिवार बन चुका है और ऐसे में अधिकारी परिवार के गढ़ में जाकर ममता के चुनाव लड़ने का फैसला न केवल बेहद दिलचस्प है बल्कि कई उलझे हुए सिरों को जोड़कर कहानी नहीं, एक उपन्यास रचता है. इस उपन्यास के भीतर कितने प्लॉट हैं? आपको सिलसिले से बताते हैं.

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प्लॉट 1 : इतिहास कैसे सुलगता है यहां?
साल 2007 में नंदीग्राम में स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन के तहत कृषि भूमि के अधिग्रहण के खिलाफ ममता अपनी पार्टी टीएमसी के साथ सड़कों पर उतरी थीं. प्रदर्शन में पुलिस की तरफ से भी हिंसा हुई थी, जिसमें 14 मौतें हुई थीं और बाद में इस पूरे विरोध प्रदर्शन की वजह से लेफ्ट का वर्चस्व बंगाल में खत्म हुआ था.

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नंदीग्राम के बाद 2008 में सिंगूर में भी इसी तरह के आंदोलन से ममता बनर्जी का जनाधार बना था. ममता नंदीग्राम को अपने लिए लकी बताती रही हैं क्योंकि एक तरह से उनकी राजनीति का उद्धार यहीं से हुआ था. हालांकि अब यहां उनकी लोकप्रियता को लेकर कई तरह की खबरें हैं, लेकिन 'मां, माटी, मानुष' नारे वाले जिस इतिहास को वह दोहराती हैं, बहुत पुराना नहीं है.

प्लॉट 2 : अधिकारी को चैलेंज करने का अर्थ?
पश्चिम बंगाल में भाजपा को रोकने के लिहाज़ से ममता बनर्जी का यह कदम बहुत ही अहम और आक्रामक माना जा रहा है. राजनीति के जानकार इसे कैल्कुलेटिव मूव बता रहे हैं, लेकिन यह एक महत्वाकांक्षी कदम है. अस्ल में, इस विधानसभा चुनाव में बंगाल में भाजपा का मतलब अधिकारी परिवार हो गया है, तो अधिकारी को पछाड़कर ही ममता भाजपा को रोक सकती हैं.

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पूर्वी मेदिनीपुर ज़िले और उसके आसपास के इलाके को सुवेंदु अधिकारी का गढ़ माना जाता है. उनके पिता, भाई सभी यहां से चुनाव जीतते रहे हैं. टीएमसी के टिकट पर खुद अधिकारी ने 2016 में यहीं से चुनाव जीता था. अब इस नंदीग्राम सीट पर सीधे ममता का चुनाव मैदान में आना, अधिकारी के लिए भी उतनी ही मुश्किल स्थिति होगी, जितनी खुद ममता के लिए.

प्लॉट 3 : क्या सिर्फ मुस्लिम वोटों से है आस?
शिशिर अधिकारी लोकसभा सांसद रह चुके हैं, दिब्येंदु अधिकारी भी और सोमेंदु अधिकारी की पकड़ भी यहां कम नहीं है. पूर्व और पश्चिम मेदिनीपुर एक तरह से अधिकारी परिवार का किला है इसलिए ममता का यहां ताल ठोकना आसान कदम नहीं देखा जा रहा. लेकिन वोटों का गणित यहां कुछ कहता है.

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करीब 25 फीसदी वोट यहां मुस्लिमों के हैं,​ जिनसे ममता को पूरी आस है. लेकिन ये वोट कांग्रेस और लेफ्ट के साथ पिछले ही दिनों जुड़े अब्बास सिद्दीकी के उम्मीदवार के साथ बंटेंगे. कहा जाता है कि नंदीग्राम क्षेत्र में सिद्दीकी की पकड़ नज़रअंदाज़ नहीं की जा सकती. दूसरी तरफ, नंदीग्राम में भाजपा की पकड़ भी देखने लायक है.

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ममता बनर्जी के प्रचार का एक दीवार पोस्टर.


2016 विधानसभा चुनाव में भाजपा को यहां भले ही 10 हज़ार से कुछ ज़्यादा वोट मिले थे लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र से 62 हज़ार से ज़्यादा वोट बीजेपी के पक्ष में गए थे. आंकड़े ये हैं तो नंदीग्राम से लड़ने के पीछे क्या है ममता का दांव?

प्लॉट 4 : ममता के लिए बोस का क्या रोल है?
पूर्णेंदु बोस, सीपीआई मार्क्सवादी के साथ ट्रेड यूनियन के लीडर के तौर पर चर्चित रहे इस नाम का कनेक्शन ममता के साथ चर्चा में है. 15 साल पहले 2006 में जब चुनाव में टीएमसी को काफी झटका लगा था, तब यही बोस थे, जो सिंगूर को मुद्दा बनाने का आ​इडिया लेकर ममता के पास पहुंचे थे. और इस आ​इडिया से ममता की सियासी किस्मत खुल गई थी.

अब यही बोस इस बार ममता के लिए संजीवनी लाने वाले हनुमान बनेंगे. कैसे? खबरों की मानें तो ममता ने बोस को दो बार की जीती हुई राजारहाट गोपालपुर विधानसभा सीट छोड़कर पूरा फोकस नंदीग्राम से उन्हें जिताने पर करने को कहा है. ममता ने डील की है अगर वो नंदीग्राम से जीतीं तो बोस को बेहद अहम पद मिलेगा.


ममता ने 1969 में खत्म कर दी गई विधायिका परिषद को भी राज्य में दोबारा बहाल करने का वादा किया है, अगर वो जीतीं तो. स्वराज्य की रिपोर्ट यह भी कहती है कि बोस ने यह डील मंज़ूर करते हुए ममता से यह भी कहा कि वो शोभनदेब चट्टोपाध्याय को इस ​बार टिकट न दें, लेकिन बोस के साथ पिछले कुछ समय से उलझे सीनियर नेता शोभनदेब की राजनीतिक बलि भवानीपुर से टिकट देकर दी जा रही है.

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गौरतलब है कि ममता के लॉंचपैड बने सिंगूर और नंदीग्राम के विरोध प्रदर्शनों के ज़माने में भी उन्हें माओवादियों का समर्थन मिला था. बोस के साथ ही इस बार डोला सेन भी ममता के लिए नंदीग्राम में चुनाव मैनेज करेंगी और बताया जाता है कि ये दोनों ही माओवादियों के बीच खासी पैठ और पकड़ रखते हैं.

प्लॉट 5 : अधिकारी या पीके, राजनीति कौन छोड़ेगा?
नंदीग्राम में कम से कम 50 हज़ार वोटों से ममता को हराने का दावा कर चुके अधिकारी कह चुके हैं कि वो इस लक्ष्य में फेल हुए तो राजनीति छोड़ देंगे. दूसरी तरफ, ममता बनर्जी के लिए चुनावी मैनेजमेंट देख रहे विश्लेषक प्रशांत किशोर ने इस दावे को पूरी तरह खोखला बताया है कि अधिकारी का दबदबा नंदीग्राम में इतना है कि उन्हें हराया नहीं जा सकता.

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सुवेंदु अधिकारी बनाम ममता बनर्जी.


'उनकी छवि को बढ़ा चढ़ाकर बताया जाता है, उन्हें नंदीग्राम का हीरो कह दिया जाता है, जैसे नंदीग्राम को ममता दीदी ने नहीं, उन्होंने बनाया हो. इस बार दीदी मैदान में हैं, तो आप उन्हें बुरी तरह हारते हुए देखेंगे.' पीके ने इंडिया टुडे से एक इंटरव्यू में एक बेहद सनसनीखेज़ दावा यह किया कि अगर बंगाल में भाजपा की सरकार बनी या उसे 100 से ज़्यादा सीटें मिलीं तो वह राजनीतिक विश्लेषण और चुनाव मैनेजमेंट का काम छोड़ देंगे.

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पीके के मुताबिक इस चुनाव में सबको पता चल जाएगा कि अधिकारी का आधार कितना है. अब तस्वीर यह है कि भाजपा के साथ ही कांग्रेस व लेफ्ट भी यह दावे कर रहे हैं कि नंदीग्राम से जीतना ममता के बस की बात नहीं है, तो दूसरी तरफ, समीकरणों और पीके का दावा यह है कि अधिकारी की इमेज हवा हवाई ज़्यादा है, ज़मीनी नहीं.
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