Bihar Election Result: जानिए बिहार में लेफ्ट ने किस तरह किया कमाल

वाम मोर्चे (Left front) ने इस बार बिहार विधानसभा चुनावों (Bihar Assembly Election) में शानदार प्रदर्शन किया है.
वाम मोर्चे (Left front) ने इस बार बिहार विधानसभा चुनावों (Bihar Assembly Election) में शानदार प्रदर्शन किया है.

बिहार विधानसभा चुनावों (Assembly Election) में इस बार लेफ्ट फ्रंट (Left front), खास तौर पर सीपीआई माले (CPILM) ने शानदार प्रदर्शन कर बिहार में वामपंथ के प्रभाव के लौटने का संकेत दिया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 11, 2020, 1:20 PM IST
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इस बार बिहार का विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly Election 2020) नतीजों से पहले ही कई मायनों में खास रहा. एक बार फिर बिहार में नतीजों उम्मीदों से काफी अलग आ गए. एनडीए (NDA) को निर्णायक बढ़त मिली, अंतिम चुनाव की घोषणा कर चुके मुख्यमंत्री नितीश कुमार को जीवन दान मिल गया और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी ने हार के बावजूद प्रभावी प्रदर्शन किया. लेकिन इन सुर्खियों के अलावा भी इस बार बिहार के चुनावों में और भी नई बातें सामने आईं. जिसमें चिराग पासवान, असुद्दीन औवेसी के साथ ही वाम मोर्चा (Left front) ने भी चुनाव के नतीजों को खासा प्रभावित किया. वाम मोर्चा का प्रदर्शन भी कम चौंकाने वाला नहीं रहा है जिसने 29 सीटों पर चुनाव लड़कर 16 में जीत हासिल की.

शानदार वापसी
वाम मोर्चा बिहार के पिछले कुछ चुनावों में हाशिए पर जाता दिख रहा था, लेकिन इस बार उसने तीन से सीधे 16 सीटें जीत कर न केवल एक लंबी छलांग दिखाई है बल्कि एक साथ कई संदेश भी दे दिए हैं. अगर राष्ट्रीय स्तर की बात करें तो लेफ्ट का प्रमुख गढ़ पश्चिम बंगाल और केरल जैसे ही राज्य रहे हैं. पश्चिम बंगाल में वह कमजोर होती जा रही है. बिहार में वह कभी प्रमुखता और व्यापक तौर तो पर प्रभाव नहीं दिखा सकी, लेकिन उसका जितना भी असर था वह काफी असरदार रहा करता है जो इस चुनाव में एक लौटता दिखा है.

लेफ्ट फ्रंट में सीपीआई माले की शानदार प्रदर्शन
इस बार बिहार में लेफ्ट की तीन पार्टियों ने चुनाव लड़ा. इसमें कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI), कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया मार्क्सिस्ट (CPIM) और कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट) लिबरेशन (CPIML) यानि भाकपामाले शामिल हैं. सीपीआई और सीपीएम ने जहां दो-दो सीटें जीतकर इसबार विधानसभा में उपस्थिति हासिल की है तो वहीं सापीए माले को पिछली बार की 9 सीटें ज्यादा मिली हैं.



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इस बार वाम मोर्चे (Left front) में सीपीआई माले (CPILM) ने 12 सीटें जीती हैं. . फोटो साभारः टि्वटर


वोट शोयरिंग भी बढ़ा लेकिन तस्वीर यह नहीं
केवल सीटों के आधार पर स्थिति की स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती. अगर वोट प्रतिशत भागीदारी के लिहाज से देखा जाए तो यहां भी उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया है. 2015 में जहां उन्होंने 3.5 प्रतिशत वोट हासिल किए थे, तो इस बार उनके खाते में 4.6 प्रतिशत वोट गए.  लेकिन यह सब भी लेफ्ट के शानदार प्रदर्शन को परिलक्षित नहीं करता है.

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क्या और सीटें मिलनी चाहिए थी लेफ्ट को
साल 2015 में सापीआई और सापीआई माले ने 98 सीटों पर चुनाव लड़ा था जबकि सीपीआईएम ने 43 सीटों पर जोरआजमाइश की थी. इनमें से सीपीआई माले ही केवल तीन सीटें जीत सकी थी. जबकि सापीई और सीपीआईएम खाता नहीं खोल सकी थी. जबकि इस बार 29 में से 16 सीटों पर जीत मिली है. इस लिहाज से सीपीआई नेता सीताराम येचुरी का बयान अहम है कि अगर महागठबंधन में उन्होंने और ज्यादा सीटें चुनाव लड़ने के लिए मिली होती तो महागठबंधन के खाते में और ज्यादा सीटें होती है

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इस बार कन्हैया कुमार सीपीआई (CPI) के स्टार प्रचारक तो रहे पर वे लोकसभा चुनावों की तरह सुर्खियां नहीं बटोर सके. . (PTI)


अब फिर बढ़ने लगा है लेफ्ट का असर
येचुरी का बयान का यही मतलब था कि अब लेफ्ट फ्रंट का प्रभाव बिहार में लौट आया है. सीपीआई माले के जनरल सेक्रेटरी दीपांकर भट्टाचार्य का कहना है कि उनकी पार्टी की सफलता अपेक्षित ही थी. इस बार पार्टी खुद को आम लोगों और उनके संघर्ष से जोड़ने में पूरी तरह से सफल रही. दीपांकर इन नतीजों से काफी उत्साहित नजर आ रहे हैं.

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और कन्हैया कुमार
लोकसभा चुनाव में कन्हैया कुमार ने बेगुसराय से सीपीआई की टिकट से चुनाव लड़ा था. करीब 22 प्रतिशत वोट हासिल करने वाले कन्हैया यह सीट तो नहीं जीत सकते हैं, लेकिन वे कई चुनावी रैलियों में खासा आकर्षण बनकर उभरे थे. लेकिन इस बार वे कहीं उस तरह से दिखाई नहीं दिए. फिर भी उनकी भूमिका रैलियों में लच्छेदार भाषण तक ही सीमित रही है. ऐसा कहीं नहीं लगा कि उन्होंने अपना खुद का कोई जनाधार बना लिया है. यह देखना होगा कि आगे लेफ्ट के बढ़ते प्रभाव में वे अपनी जगह कैसे बना पाते हैं.
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