Bihar Elections : पहले चुनाव में हिंदुत्व के एजेंडे पर थे मैदान में थे 03 दल, क्या हुआ उनका

स्वामी करपात्री महाराज ने 1952 के चुनावों से पहले अखिल भारतीय रामराज्य पार्टी बनाई. जिसने लोकसभा और कई राज्यों में विधानसभा का चुनाव लड़ा.
स्वामी करपात्री महाराज ने 1952 के चुनावों से पहले अखिल भारतीय रामराज्य पार्टी बनाई. जिसने लोकसभा और कई राज्यों में विधानसभा का चुनाव लड़ा.

बिहार में विधानसभा चुनाव (Bihar Assembly elections) का माहौल गरम हो रहा है. उम्मीदवारों के नाम घोषित होने लगे हैं. समीकरणों के हिसाब से पार्टियां लामबंद हो रही हैं. जातियों की गणित को आंका जा रहा है. इसके बीच जानिए क्या हुआ था जब बिहार में पहले विधानसभा चुनाव 1952 में हुए थे

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 8, 2020, 7:05 PM IST
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गणतंत्र भारत के पहले चुनाव 1952 में हुए. साथ ही साथ सभी राज्यों में भी विधानसभा के चुनाव हुए. इससे पहले बिहार में प्रांतीय असेंबली के जो चुनाव होते थे, उसमें राज्य के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहा जाता था. पहले चुनाव में माहौल उत्साह का भी था और आदर्श राजनीति का भी. हालांकि उस चुनाव में बिहार की सत्ता की लड़ाई कम रोचक नहीं थी. जमकर निर्दलीय प्रत्याशी खड़े थे. अलग अलग विचारधाराओं के दल भी.

उस चुनाव से पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की तूती बोल रही थी. राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद बन गए थे, जो बिहार से ही ताल्लुक रखते थे, लिहाजा बिहार के मतदाताओं पर इसका भी एक असर था लेकिन ऐसा नहीं था कि बिहार की राज्य की राजनीति पर नेहरू या प्रसाद का असर था बल्कि इनके साथ एक और शख्स की बिहार पर मजबूत पकड़ नजर आ रही थी. उन्हें बिहार केसरी कहा जाता था.

ये बिहार केसरी दरअसल स्वतंत्रता सेनानी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह थे. उन्हें लोग श्रीबाबू ज्यादा बोला करते थे. वो बिहार राज्य के 1946 में प्रधानमंत्री बने और फिर पहले मुख्यमंत्री.



कांग्रेस कितनी सीटों पर लड़ी
पहले चुनाव में श्रीबाबू की तूती थी. ये तय था कि अगर कांग्रेस जीती तो वही मुख्यमंत्री बनेंगे. रही बात कांग्रेस की तो उसकी जीत भी उतनी ही तय थी. उसने कुल 330 सीटों मं 322 पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे.

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16 पार्टियां धीं चुनाव मैदान में
राज्य के पहले चुनाव में एक नहीं कई नेशनल और स्टेट लेवल की पार्टियां दमखम दिखा रही थीं. उसमें दमदार वाम संगठन भी और दक्षिण पंथी भी. किसानों और मजदूरों का पक्षधर होने का दावा करने वाले लोग तो बिहार में एक क्षेत्र विशेष की पहचान के नाम पर सियासत में ताल ठोंकने वाले लोग भी. कुल मिलाकर 16 पार्टियां चुनाव मैदान में थीं.

जनसंघ, रामराज्य परिषद और हिंदू महासभा ने लड़ा चुनाव
इसमें 11 राष्ट्रीय पार्टियां थीं तो 05 क्षेत्रीय पार्टियां और बड़ी संख्या में निर्दलीय. कांग्रेस अगर सबसे संगठित पार्टी नजर आ रही थी तो हिंदुत्व के एजेंडे पर तीन बड़े दल चुनाव मैदान में थे. ये थे जनसंघ, हिंदू महासभा और रामराज्य परिषद. 04 वामदल और 02 सोशलिस्ट पार्टियां. इन पार्टियों के नेता छोटे-मोटे नाम नहीं थे.

हिंदू महासभा पर था मदन मोहन मालवीय का नाम 
जनसंघ की स्थापना श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी. उसके पीछे ताकत थी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की. अखिल भारतीय हिंदू महासभा के संस्थापक मदन मोहन मालवीय थे तो अध्यक्ष चंद्र प्रकाश कौशिक. मदन मोहन मालवीय का देश के रजवाड़ों से लेकर आम लोगों के बीच खासा दबदबा था. बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की स्थापना के बाद उनका कद काफी बड़ा हो चुका था. जनसंघ और हिंदू महासभा दोनों का एजेंडा अगर हिंदुत्व था तो हिंदू राष्ट्रवाद भी.

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स्वामी करपात्री की पार्टी थी रामराज्य परिषद 
तीसरी पार्टी जो हिंदुत्व के एजेंडे में चुनाव मैदान में थी, वो थी अखिल भारतीय रामराज्य परिषद. ये उस समय के जाने-माने संत स्वामी करपात्री महाराज द्वारा स्थापित पार्टी थी. स्वामी करपात्री महाराज चुनाव में काफी सक्रिय भी थे. पूरे देश में घूम-घूमकर अपनी पार्टी का प्रचार कर रहे थे.

इन दलों के साथ जो और दल चुनाव मैदान में थे, उनमें फारवर्ड ब्लाक, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, रेवोल्यूशन पार्टी ऑफ इंडिया, सोशलिस्ट पार्टी, शेड्यूल कास्ट फेडरेशन, किसान मजदूर प्रजा पार्टी, झारखंड पार्टी, छोटा नागपुर व संथाल परगना जनता पार्टी, झारखंड पार्टी, लोकसेवक संघ, यूनाइटेड किसान सभा और गणतांत्रिक पार्टी. हालांकि इनमें से अब इक्का-दुक्का पार्टी ही अब बच पाई हैं. बाकी ये तो समय के गर्त में खो गईं या फिर उनका बड़े दलों में विलय होता गया.

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कांग्रेस तब सबसे बड़ी और सबसे संगठित पार्टी थी. बिहार में बिहार केसरी के नाम से लोकप्रिय श्रीअर्जुन सिंह इसके सबसे लोकप्रिय नेता. जो राज्य के पहले मुख्यमंत्री भी बने.


कांग्रेस सबसे बड़ा और संगठित दल था
कुल मिलाकर उस समय सबसे बड़ा और संगठित सियासी दल कांग्रेस था, जो 52 के बाद कई बार बंटा, टूटा और कमजोर हुआ लेकिन सियासत में बरकरार है. हालांकि बिहार की राज्य की सत्ता से एक जमाने से कांग्रेस का बिस्तर गोल हो चुका है. आखिरी बार वो कब सत्ता में थे, ये भी शायद ही किसी को याद हो.

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क्या रहे परिणाम
खैर अब परिणामों पर आते हैं. उसमें सबसे पहले देखते हैं कि हिंदूत्व के एजेंडे पर जो तीन पार्टियां वहां चुनाव लड़ रही थीं, उनका क्या हुआ. हालांकि इन तीनों ही दलों की मुख्य नजर उस समय राष्ट्रीय चुनावों पर थी लेकिन उन्होंने सीमित संख्या में विधानसभा के लिए अपने प्रत्याशी उतारे थे. लेकिन उन्हें बहुत खराब परिणामों का सामना करना पड़ा.

उस चुनाव में 239 सीटें जीतीं और सरकार बनाई. दूसरी बड़ी ताकत बनी झारखंड पार्टी के नाम वाला सियासी दल. उसने केवल 98 सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए थे, जिसमें 32 पर वो जीते. तीसरे नंबर पर थी सोशलिस्ट पार्टी, जिससे जयप्रकाश नारायण जुडे़ हुए थे. उसके हिस्से में 23 सीटें आईं. हालांकि उसने काफी दमदार तरीके से 266 जगह अपने प्रत्याशी खड़े किए थे. 628 निर्दलियों में 14 जीतकर सदन में पहुंचे.

हिंदूत्व के एजेंडे पर लड़ रहे दलों का क्या हुआ
अब ये बड़ा सवाल हो सकता है कि हिंदूत्व और हिंदू राष्ट्रवाद पर चुनाव लड़ रही पार्टियों का क्या हुआ. उसमें केवल स्वामी करपात्री महाराज की रामराज्य परिषद ही 01 सीट पर जीत पा सकी. यानि उस चुनाव में बिहार की जनता ने उन्हें नकारा. हालांकि वो चुनाव जातिगत समीकरण पर भी नहीं लड़ा गया था, जैसा बाद में बिहार की राजनीति का अनिवार्य पहलू बनता चला गया.

अर्जुन सिंह मुख्यमंत्री बने
कांग्रेस के जीतने के बाद तय था अर्जुन सिंह यानि बिहार केसरी मुख्यमंत्री बनेंगे. ऐसा ही हुआ भी. वो सीएम बने और अनुग्रह नारायण सिन्हा उप मुख्यमंत्री. दोनों की जोड़ी में गजब का तालमेल था. उस समय बिहार में जितनी बड़ी परियोजनाएं लगीं और शुरू हो गईं. उससे लगता था कि बिहार बहुत तेजी से विकास की दौड़ में आगे निकल जाएगा. उसी वजह से अर्जुन सिंह को आज भी लोग बिहार के सबसे मुख्यमत्री के तौर पर याद करते हैं.
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