जानिए, नेपाल की एक और करतूत, जिससे बिहार में आ सकता है 'जल प्रलय'

जानिए, नेपाल की एक और करतूत, जिससे बिहार में आ सकता है 'जल प्रलय'
अब नेपाल बिहार में बांध की मरम्मत के काम में अड़ंगा लगा रहा है

नेपाल ने बिहार की गंडक नदी पर बांध की मरम्मत रुकवा (Nepal stopped dam repair work at Gandak) दी है. उसका कहना है कि जिस हिस्से में बांध आता है, वो जमीन उसकी है. इससे बिहार में बाढ़ का खतरा (risk of floods in Bihar) एकदम से बढ़ गया है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 23, 2020, 10:27 AM IST
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भारत-नेपाल सीमा विवाद (India-Nepal border dispute) के साथ ही दोनों देशों के बीच एक के बाद एक मुद्दे आ रहे हैं. अब नेपाल बिहार में बांध की मरम्मत के काम में अड़ंगा लगा रहा है. उसने चंपारण के उस हिस्से पर दावा किया है, जिसपर बांध बना हुआ है. विवाद भारत-नेपाल की सीमा को दिखाने वाले पिलर नंबर 345/5 और 345/7 के बीच की जमीन पर है, जो लगभग 500 मीटर में फैली है. बता दें कि यहां पर पहले से बने बांध के बारे में नेपाल का कहना है कि भारत ने उसके हिस्से पर बांध बनाया है. मरम्मत रोकने के लिए नेपाल ने रास्ते में रुकावट डाल दी है ताकि निर्माण सामग्री न पहुंचाई जा सके. इससे बिहार के निचले हिस्सों में बाढ़ के कारण भारी तबाही मच सकती है.

बिहार और नेपाल के बीच लगभग 700 किलोमीटर लंबा इंटरनेशनल बॉर्डर है. इसमें गंडक नदी के बैराज पर 36 द्वार बने हैं. इसमें से 18 द्वार नेपाल में आते हैं, जबकि बाकी 18 भारत में पड़ते हैं. हर साल मॉनसून से पहले इन बांधों की मरम्मत होती है. इस बार भी हर साल की तरह भारत ने अपने हिस्से में सुधार कार्य करवा डाला लेकिन नेपाल के हिस्से में मरम्मत नहीं हो पा रही है क्योंकि नेपाल ने उस जगह पर रुकावट डाल दी है, जहां बांध की मरम्मत के लिए सामान रखा हुआ है.


लाल बकेया नदी के गंडर डैम में होने वाले मरम्मत कार्य को चलने की भी अनुमति नहीं दे रहे हैं. मालूम हो कि ये एक नो मेन्स लैंड है. इसके अलावा कई दूसरी जगहों पर भी नदी के प्रबंधन के काम में नेपाल रोड़ा अटका रहा है. वैसे मॉनसून में बाढ़ को लेकर पहले भी दोनों देशों के बीच थोड़ी किचकिच होती आई है लेकिन मरम्मत का काम रोकने जैसा कदम पहली ही बार लिया गया है.



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नेपाल ने उस जगह पर रुकावट डाल दी है, जहां बांध की मरम्मत के लिए सामान रखा हुआ है


खुद बिहार के जल संसाधन मंत्री संजय झा ने इस बारे में ट्वीट किया. उनके मुताबिक गंडक बैराज के नेपाल में पड़ने वाले हिस्से में गेट बंद कर दिए हैं. इससे वहां जाना मुमकिन नहीं. 21 जून को ही 1.5 लाख क्यूसेक पानी गंडक नदी से निकला है. अगर पानी इसी तरह बढ़ा तो पूरे उत्तरी बिहार में पानी ही पानी हो जाएगा.

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वैसे हर साल बांधों के प्रबंधन का काम क्यों करना होता है इसकी भी एक वजह है. असल में बांध मिट्टी के हैं. इनसे हर साल पानी में मिट्टी का क्षरण होता है. किस जगह कितनी मिट्टी बही, ये देखने के बाद बिहार जल संसाधन मंत्रालय तय करता है कि कहां मरम्मत करनी चाहिए और कहां नहीं. इसका एक प्रोटोकॉल बना हुआ है, जो सालों से चला आ रहा है. नेपाल ने कभी मरम्मत पर आपत्ति नहीं ली लेकिन इस बार मामला अलगग लग रहा है.

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बता दें कि इससे पहले भी इनके प्रबंधन का काम भारत ही करता आया है, जिसे दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध बताया जाता रहा. साथ ही दोनों देशों के बीच 1954 में हुई कोसी संधि और 1959 में हुई गंडक संधि के तहत ऐसा किया जाता है. अब मरम्मत का काम रुकने से पूर्वी और उत्तरी चंपारण के निचले हिस्सों में बारिश बढ़ने पर तबाही का अंदेशा लगाया जा रहा है.

पहले ही नेपाल ने नए राजनैतिक नक्शे को लाकर विवाद खड़ा किया हुआ है


इससे पहले नेपाल ने नए राजनैतिक नक्शे को लाकर विवाद खड़ा कर दिया. इसमें भारत के तीन हिस्सों लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को उसने अपना इलाका कहा है. नया नक्शा नेपाल की राष्ट्रपति की भी मंजूरी पा चुका है. इसके ठीक बाद नेपाल में नागरिकता कानून को लेकर भी बात हो रही है. भारत से शादी करके नेपाल पहुंची युवतियों को देश की नागरिकता पाने के लिए 7 सालों का इंतजार करना होगा. साथ ही उसे तभी नागरिकता मिल सकेगी, जब वो भारत की नागरिकता सरेंडर करने के लिए प्रमाण दिखाए. बता दें कि इससे पहले भारतीय बहू को तुरंत ही नेपाल की नागरिकता मिल जाती थी और यही भारत में भी होता आया है.

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देशों के बीच विवाद की शुरुआत भारत के लिपुलेख के रास्ते कैलाश मानसरोवर तक जाने के लिए सड़क बनाने पर हुई. चीन को इसमें भारत का सामरिक फायदा दिख रहा है. इसी वजह से माना जा रहा है कि उसने नेपाल को भारत के खिलाफ भड़काया. नेपाल में चूंकि चीन लगातार भारी इनवेस्टमेंट कर रहा है, इसलिए ये पड़ोसी देश भी भारत के खिलाफ हो गया.
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