Birthday Chaudhary DaviLal : जब ताऊ ने गुस्से में गवर्नर को थप्पड़ जड़ दिया

चौधरी देवीलाल को भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा किंगमेकर माना जाता है.
चौधरी देवीलाल को भारतीय राजनीति में सबसे बड़ा किंगमेकर माना जाता है.

चौधरी देवीलाल (Chaudhary Devi Lal) का आज जन्मदिन है. उन्हें राजनीति का ताऊ भी कहा जाता था. असल में वो भारतीय राजनीति के सबसे बड़े किंगमेकर (Kingmaker of Indian Politics) बने. एक बार दबंग ताऊ को हरियाणा के राज्यपाल (Haryana Governor) पर इतना गुस्सा आया कि उन्होंने गवर्नर को करारा थप्पड़ जड़ दिया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 25, 2020, 12:25 PM IST
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तब पूरा देश हतप्रभ रह गया था जब राज्यपाल के पक्षपात से हरियाणा (Haryana) के दिग्गज नेता चौधरी देवीलाल (Devilal) इतने गुस्से में आ गए कि उन्होंने उन्हें थप्पड़ जड़ दिया. देवीलाल को भारतीय राजनीति में किंगमेकर भी कहा जाता है. जब 1989 में उन्होंने चंद्रशेखर के भारी विरोध के बाद भी वीपी सिंह को प्रधानमंत्री बनवा दिया.

चौधरी देवीलाल का आज जन्मदिन है.उनका जन्म 25 सितंबर, 1914 को सिरसा में हुआ था. उन्हें भारतीय राजनीति का दबंग ताऊ कहा जाता था. देवीलाल लंबे चौड़े डीलडौले वाले शख्स थे. दबना उनकी आदत में शुमार नहीं था. देवीलाल अपने अक्खड़ स्वभाव और खरी खरी बोली के लिए भी जाने गए. उनके साथ विवाद भी कम नहीं जुड़े.

उनका गवर्नर वाला मामला अब भी पुराने लोगों की जुबान पर रहता है. ये भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित और सबसे सनसनीखेज मामलों में भी रहा. हरियाणा में 1982 का चुनाव हुआ. 90 सीटों वाली विधानसभा में 36 सीटें जीतकर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी. भारतीय राष्ट्रीय लोक दल का बीजेपी से चुनाव से पहले से गठबंधन था. इस गठबंधन को 37 सीटें मिलीं.



देवीलाल को सरकार बनाने के लिए बुलाया गया
किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था. अब ये राज्यपाल पर था कि वो किस गठबंधन को सरकार बनाने के लिए बुलाते हैं. उस दौरान हरियाणा में गणपतराव देवजी तपासे राज्यपाल थे. राज्यपाल ने पहले देवीलाल को 22 मई 1982 को सरकार बनाने के लिए बुलाया. इसी बीच भजनलाल कांग्रेस और निर्दलियों को एककर उसके नेता घोषित किये गए. उनके पास बहुमत के लिए जरूरी 52 विधायकों का समर्थन था.

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भजनलाल को बना दिया गया मुख्यमंत्री
गवर्नर तपासे ने तुरंत भजनलाल को बुलाया और मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. देवीलाल बहुत नाराज हुए. वो अपने और बीजेपी के विधायकों के साथ राजभवन पहुंचे. उनमें और राज्यपाल के बीच विवाद होने लगा.

ताऊ ने गवर्नर को थप्पड़ जड़ दिया
ये विवाद इतना बढ़ा कि ताऊ देवीलाल राज्यपाल की ठुड्डी पकड़कर बात करने लगे. तभी लोगों ने गुस्से में ताऊ को तपासे को एक थप्पड़ लगाते देखा. हर कोई सन्न रह गया.

सुरक्षा गार्ड नहीं बचाते तो गवर्नर की हालत और खराब होती
राज्यपाल के गार्ड तुरंत उन्हें वहां से सुरक्षित निकाल ले गए. अन्यथा हालात और खराब हो सकते थे. इस थप्पड़ की गूंज बहुत दिनों तक भारतीय राजनीति में रही. तपासे पुराने नेता थे. महाराष्ट्र में लंबे समय तक राजनीति कर चुके थे लेकिन उनको अंदाज नहीं था कि ताऊ से कहा-सुनी यहां तक पहुंच जाएगी. हालांकि इस पर आगे कोई कार्रवाई किसी ने नहीं की.

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जब हरियाणा के राज्यपाल ने देवीलाल को मुख्यमंत्री पद के लिए बुलाने के बाद आनन-फानन में भजनलाल को मुख्यमंत्री बना दिया तो चौधरी देवीलाल नाराज हो गए. (इंडियल लोकदल ट्विटर हैंडल)


आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया
देवीलाल ने स्वंतत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया और जब देश आजाद हुआ तो राजनीति के जरिए समाजसेवा के क्षेत्र में आ गए. 22 वर्षों के संघर्ष के बाद पहली बार वो 1952 में विधायक बने. पहली बार वो पंजाब से चुने गए. 1956 में वो पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष बने.

कांग्रेस से अलग होकर लोक दल बनाई
देवीलाल ने हरियाणा को अलग राज्य बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. 1958 में वो सिरसा से चुने गए. 1971 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी. 1975 के आपातकाल में चौधरी देवीलाल को इंदिरा गांधी की सरकार ने गिरफ्तार कर लिया. वो तकरीबन 19 महीने तक जेल में रहे. आपातकाल के बाद हुए चुनाव में उन्होंने जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा. वो हरियाणा के सीएम बने. इमरजेंसी के मुखर विरोध की वजह से उन्हें लोगों ने शेर-ए-हरियाणा का खिताब दिया था.

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अस्सी के दशक में चौधरी देवीलाल ने लोक दल नाम से अलग पार्टी बनाई. उन्होंने हरियाणा के गरीबों के लिए न्याय युद्ध चलाया. इस आंदोलन ने उन्हें हरियाणा के किसान मजदूरों का चहेता बना दिया. चौधरी देवीलाल ने राजनीति में कई मुकाम हासिल किए. उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1987 के चुनाव में देवीलाल की पार्टी ने हरियाणा की 90 में से 85 सीटें जीत लीं. देवीलाल दूसरी बार हरियाणा के सीएम बने.

भारतीय राजनीति के सबसे बड़े किंगमेकर
चौधरी देवीलाल अपनी बात के पक्के होते थे. जो कहते थे वो करते थे. हालांकि उनके नाम विवाद भी कम नहीं रहे. उन्हें भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा किंगमेकर कहा जाता है, जिन्होंने अपने पास आई हुई प्रधानमंत्री पद की थाली वीपी सिंह की ओर सरकार दी.

1989 के चुनाव परिणाम आ चुके थे. जनता दल की अगुवाई में संयुक्त मोर्चा को सरकार बनानी थी. चुनाव से पहले ऐसा लग रहा था कि वीपी सिंह ही जनता दल के जीतने पर प्रधानमंत्री बनेंगे. लेकिन चुनाव परिणाम आते ही चंद्रशेखर ने भी नेता पद के लिए दावेदारी ठोक दी. ऐसे में  वीपी सिंह संसदीय दल के नेता के रूप में जीत के प्रति सशंकित हो उठे.

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1990 में चौधरी देवीलाल को उप प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाते हुए तत्कालीन राष्ट्रपति आर. वेंकटरमण. (इंडियल लोकदल ट्विटर हैंडल)


देवीलाल संसदीय दल के नेता चुन लिये गए
1989 के चुनाव के बाद जब संयुक्त मोर्चा के संसदीय दल की बैठक में देवीलाल को संसदीय दल का नेता चुन लिया गया. अब वो प्रधानमंत्री की कुर्सी के एकदम करीब थे. कहा जा सकता है कि संयुक्त मोर्चा की वो बैठक उनके प्रधानमंत्री बनने पर मुहर लगा चुकी थी. उन्हें नेता बनाने का प्रस्ताव किसी और ने नहीं बल्कि खुद विश्वनाथ प्रताप सिंह रखा. चंद्रशेखर ने इसका समर्थन किया.

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मैं ये पद विश्वनाथ प्रताप सिंह को सौंपता हूं
अब इसके बाद देवीलाल को उस बैठक को संबोधित करना था. वो खड़े हुए. बोले- ‘मैं सबसे बुजुर्ग हूं, मुझे सब ताऊ बुलाते हैं. मुझे ताऊ बने रहना ही पसंद है. मैं ये पद विश्वनाथ प्रताप सिंह को सौंपता हूं.’

हर कोई हैरान था कि उन्होंने ऐसा क्यों किया
पूरी सभा में सन्नाटा छा गया. लोग हैरान रह गए कि देवीलाल ने ऐसा क्यों किया. प्रधानमंत्री की कुर्सी को क्यों ठुकरा दिया. उस वाकये के बाद देवीलाल भारतीय राजनीति के सबसे बड़े किंगमेकर बन गए. वीपी सिंह केवल चौधरी देवीलाल की वजह से प्रधानमंत्री बन पाए.

क्या देवीलाल और वीपी में गुप्त समझौता हो चुका था
हालांकि तब के अखबारों में अगले दिन जो रिपोर्ट्स प्रकाशित हुईं, उसमें कहा गया कि संसदीय दल की बैठक के पहले ही देवीलाल और वीपी सिंह के बीच गुप्त समझौता हो चुका था. देवीलाल ने वीपी सिंह को दिए वादे का पालन किया. संसदीय दल के नेता की कुर्सी वीपी सिंह को सौंप दी.

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बाद में वीपी ने देवीलाल को मंत्रिमंडल से निकाल दिया
ये भी राजनीति का ही खेल है कि वीपी सिंह ने बाद में देवीलाल को अपने मंत्रिमंडल से हटा दिया. फिर वीपी सिंह की सरकार गिर गई. चौधरी देवीलाल फिर उपप्रधानमंत्री बने. चंद्रशेखर के साथ. चंद्रशेखर महज चार महीने के भीतर इस्तीफ़ा देने पर मज़बूर हुए, तब भी देवीलाल के पास मौका था कि वे प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी जता सकते थे. लेकिन उन्होंने वैसा नहीं किया. अगर वो तब राजीव गांधी से बात करते तो कांग्रेस उन्हें समर्थन देकर प्रधानमंत्री बना सकती थी.

ये दो उदाहरण ये दर्शाते हैं कि देवीलाल को देश के सबसे बड़े पद का लालच नहीं था. हालांकि कुछ जानकार ये भी कहते हैं कि देवीलाल में प्रधानमंत्री पद का आत्मविश्वास नहीं था और ना ही उनका राष्ट्रीय विजन था. इस बात का उन्हें अहसास भी था. लंबी बीमारी के बाद 6 अप्रैल 2001 को उनका निधन हो गया.



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