जन्मदिन : धर्म पर क्या थे प्रेमचंद के विचार, क्या लिखा इस्लाम के बारे में

जन्मदिन : धर्म पर क्या थे प्रेमचंद के विचार, क्या लिखा इस्लाम के बारे में
1980 में भारतीय डाकतार विभाग ने मुंशी प्रेमचंद पर डाकटिकट जारी किया

हिंदी के मशहूर साहित्यकार प्रेमचंद (munshi premchand) 31 जुलाई 1880 में पैदा हुए और 08 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हो गया. अपने जीवन में उन्होंने समाज और जीवन से जुड़ी यर्थाथपरक कहानियां और उपन्यास लिखने के अलावा प्रचुर संख्या में लेख भी लिखे. उसी में उन्होंने एक लेख धर्म पर लिखा. कई जगह धर्म और इंसानियत को लेकर अपने विचार जाहिर किये.

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हिंदी के मशहूर साहित्यकार प्रेमचंद (munshi-premchand) का आज जन्मदिन है. वो 31 जुलाई 1880 में बनारस (Varanasi) के लम्ही में पैदा हुए थे. वो अपने समय में बहुत मुखर तरीके से तमाम मुद्दों पर विचार रखते थे. उन पर लिखते थे. उन्होंने धर्म (Religion) से लेकर सियासत (Politics) पर खुलकर लिखा. ये भी लिखा पॉलिटिकल पार्टियां धर्म की आड़ लेकर बात का बतंगड़ बनाती हैं और अपना उल्लू सीधा करती हैं.

प्रेमचंद का लेखन अब करीब 100 साल पुराना होने जा रहा है लेकिन अब भी बहुत सामयिक है. जिन बातों को उन्होंने समझा, लिखा और उठाया-वो अब भी करीब वैसी ही लगती हैं. उनका निधन 08 अक्टूबर 1936 को वाराणसी में हुआ. अपनी जिंदगी में उन्होंने जमकर लिखा.

सांप्रदायिकता को लेकर उन्होंने लिखा, "मैं एक इंसान हूं. जो इन्सानियत रखता हो, इन्सान का काम करता हो, मैं वही हूँ और ऐसे ही लोगों को चाहता हूं. प्रेमचन्द साम्प्रदायिकता को ऐसा पाप मानते थे जिसका कोई प्रायश्चित नहीं.



मैं वो धर्म कभी स्वीकार नहीं कर सकता...
इस बारे में प्रेमचन्द की दृष्टि पूर्ण वैज्ञानिक रही है. वे कहते हैं, " मैं उस धर्म को कभी स्वीकार नहीं करना चाहता जो मुझे यह सिखाता हो कि इन्सानियत, हमदर्दी और भाईचारा सब-कुछ अपने ही धर्म वालों के लिए है, उस दायरे के बाहर जितने लोग हैं सभी गैर हैं, उन्हें जिन्दा रहने का कोई हक नहीं, तो मै उस धर्म से अलग होकर विधर्मी होना ज्यादा पसंद करुंगा."

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प्रेमचन्द का मानना था कि साम्प्रदायिक झगड़ा ज्यादातर मामलों में राजनीतिक हित साधने के लिए राजनीतिक पार्टियाँ करती हैं. वह छोटे - छोटे झगड़ों को बड़ा रूप देकर बड़ा बना देंगे. अपना उल्लू सीधा करते हैं.

सांप्रदायिक सौहार्द्र की कई कहानियां लिखीं
प्रेमचन्द ने साम्प्रदायिक सौहार्द को बनाए रखने के लिए कई कहानियां लिखीं. जिसमें साम्प्रदायिक झगड़े की बुराई और परिणामों के बारे में बताया. इसमें मुक्तिधन, क्षमा, (मानसरोवर-3) स्मृतिका, पुजारी (मानसरोवर-4) मंत्र हिंसा परमो धर्म (मानसरोवर-5) जिहाद (मानसरोवर-7) ब्रह्म का स्वांग तथा खून सफेद (मानसरोवर-8) ऐसी ही कहानियां हैं, जिसके माध्यम से प्रेमचन्द ने साम्प्रदायिक वैषम्य को आवाज देकर सबतक पहुंचाने की कोशिश की.

'मंत्र' कहानी में उन्होंने एक ऐतिहासिक घटना को माध्यम बनाया कि जब 1920-22 में हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित हुई तो चारों तरफ लोग खुश हो गए. लेकिन यह खुशी ज्यादा दिनों तक न रह सकी, क्योंकि इसको भंग करने की साजिश ब्रिटिश शासकों के द्वारा होने लगी वह भंग भी कर दिया गया. 'मुक्तिधन' रहमान के द्वारा गाय के प्रति प्रेम दिखाकर हिन्दू-मुस्लिम सोहार्द बनाए रखने का प्रयास किया.

वाराणसी का लम्ही गांव मुंशी प्रेमचंद का जन्मस्थान है. उनके जीवन का एक हिस्सा यहां भी बीता. गांव में लगी उनकी प्रतिमा


धर्म से गायब होने लगे हैं सत्य और अहिंसा
हिंसा परोधर्मः के माध्यम से धर्म के नाम पर सारे देश में फैली ऐसी अराजकता को प्रस्तुत किया. उन्होंने लिखा, सत्य, अहिंसा, प्रेम तथा न्याय धर्म से गायब होने लगे. हर तरफ असत्य, हिंसा और द्वेष छा गया.इन सबका कारण वह ब्राह्मणों और मौलवियों को मानते थे. उनके ख्याल से ऐसे लोगों ने अपने स्वार्थ को साधने के लिए धर्म का प्रयोग शुरू कर दिया है.

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मानव धर्म अपनाना चाहते थे
वह मानते थे कि सभी धर्म को तिलांजलि देकर मानव-धर्म को अपनाया जाए. जिसमें प्रेम, अहिंसा और एक दूसरे के दुख-दर्द को समझने और बांटने का पूरा अवसर हो. उनका कहना था कि उस मजहब या धर्म के सामने माथा झुकाने से क्या लाभ मिलेगा, जिस धर्म में निष्क्रियता ने घर कर लिया हो जो धर्म केवल अपने को ही जीना सिखाता हो.

धर्म में मनुष्य का मनुष्य रहना जरूरी
इस महान साहित्यकार ने सदा मानव धर्म को ही शीर्षस्थ स्थान प्रदान किया. उनके अनुसार इस धर्म के अंतर्गत मनुष्य का मनुष्य रहना अनिवार्य है. परोपकार के लिए कुछ त्याग भी करना पड़े तो वह आत्मा की हत्या नहीं है. प्रेमचन्द के जीवनदर्शन का मूलतत्व मानवतावाद है. वह मानवतावाद को सबसे पहले मानते थे. वही मानवतावाद जो मनुष्य की तरफदारी करने वाला हो.


1925 में हिंदू-मुस्लिम पर लंबा लेख लिखा
प्रेमचंद ने इस्लामी सभ्यता पर 1925 में लेख लिखा, जो ‘प्रताप’ में प्रकाशित हुआ. "हिंदू और मुसलमान दोनों एक हज़ार वर्षों से हिंदुस्तान में रहते चले आये हैं. लेकिन अभी तक एक-दूसरे को समझ नहीं सके. हिंदू के लिए मुसलमान एक रहस्य है और मुसलमान के लिये हिंदू एक मुअम्मा (पहेली). न हिंदू को इतनी फुर्सत है कि इस्लाम के तत्वों की छानबीन करे, न मुसलमान को इतना अवकाश है कि हिंदू-धर्म-तत्वों के सागर में गोते लगाये. दोनों एक दूसरे में बेसिर-पैर की बातों की कल्पना करके सिर-फुटौव्वल करने में आमादा रहते हैं."

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हिंदू-मुस्लिम क्या समझते हैं एक-दूसरे के धर्म के बारे में
"हिंदू समझता है कि दुनियाभर की बुराइयां मुसलमानों में भरी हुई हैं : इनमें न दया है, न धर्म, न सदाचार, न संयम. मुसलमान समझता है कि हिंदू, पत्थरों को पूजने वाला, गर्दन में धागा डालने वाला, माथा रंगने वाला पशु है. दोनों बड़े दलों में जो बड़े धर्माचार्य हैं, मानो द्वेष और विरोध ही उनके धर्म का प्रधान लक्षण है."

"हम इस समय हिंदू-मुस्लिम-वैमनस्य पर कुछ नहीं कहना चाहते. केवल ये देखना चाहते हैं कि हिंदुओं की, मुसलमानों की सभ्यता के विषय में जो धारणा है, वह कहां तक न्यायी है."

इस्लाम की तारीफ
"जहां तक हम जानते हैं, किसी धर्म ने न्याय को इतनी महत्ता नहीं दी, जितनी इस्लाम ने दी है. इस्लाम धर्म की बुनियाद न्याय पर रखी गयी है. वहां रजा और रंक, अमीर और गरीब के लिए केवल एक न्याय है. किसी के साथ रियायत नहीं, किसी का पक्षपात नहीं. ऐसी सैकड़ों रवायतें पेश की जा सकती हैं जहां बेकसों ने बड़े-बड़े बलशाली अधिकारियों के मुक़ाबले में न्याय के बल पर विजय पायी है. ऐसी मिसालों की भी कमी नहीं है जहां बादशाहों ने अपने राजकुमार, अपनी बेग़म, यहां तक कि स्वयं को भी न्याय की वेदी पर होम कर दिया."

"हज़रत मोहम्मद ने धर्मोपदेशकों को इस्लाम का प्रचार करने के लिए देशांतरों में भेजते हुए उपदेश दिया था : जब लोग तुमसे पूछें कि स्वर्ग की कुंजी क्या है, तो कहना कि वह ईश्वर की भक्ति और सत्कार्य में है."

मुस्लिम बादशाहों के बारे में क्या कहा
अपने इसी लेख में उन्होंने आगे लिखा, "जिन दिनों इस्लाम का झंडा कटक से लेकर डेन्यूब तक और तुर्किस्तान से लेकर स्पेन तक फहराता था, मुसलमान बादशाहों की धार्मिक उदारता इतिहास में अपना सानी नहीं रखती थी. बड़े-बड़े राज्य-पदों पर ग़ैर मुस्लिमों को नियुक्त करना तो साधारण बात थी."

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"महाविद्यालयों के कुलपति तक ईसाई और यहूदी होते थे. इस पद के लिए केवल योग्यता और विद्वता ही शर्त थी, धर्म से कोई संबंध नहीं था. प्रत्येक विद्यालय के द्वार पर ये शब्द खुदे होते थे : पृथ्वी का आधार केवल चार वस्तुएं हैं - बुद्धिमानों की विद्वता, सज्जनों की ईश प्रार्थना, वीरों का पराक्रम और शक्तिशालियों की न्यायशीलता."

क्या लिखा मुहम्मद और उनकी सामाजिक सोच पर
"प्रताप" पत्रिका के इसी लेख में प्रेमचंद ने लिखा, "मुहम्मद के सिवा संसार और कौन धर्म प्रणेता हुआ है जिसने ख़ुदा के सिवा किसी मनुष्य के सामने सिर झुकाना गुनाह ठहराया हो? मुहम्मद के बनाये हुए समाज में बादशाह का स्थान ही नहीं था. शासन का काम करने के लिए केवल एक ख़लीफा की व्यवस्था कर दी गयी थी, जिसे जाति के कुछ प्रतिष्ठित लोग चुन लें. इस चुने हुए ख़लीफा को कोई वजीफ़ा, कोई वेतन, कोई जागीर, कोई रियासत न थी. यह पद केवल सम्मान का था. अपनी जीविका चलाने के लिए ख़लीफ़ा को भी दूसरों की भांति मेहनत-मज़दूरी करनी पड़ती थी. ऐसे-ऐसे महान पुरुष, जो एक बड़े साम्राज्य का संचालन करते थे, जिनके सामने बड़े-बड़े बादशाह अदब से सिर झुकाते थे, वे जूते सिलकर या कलमी किताबें नक़ल करके या लड़कों को पढ़ाकर अपनी जीविका अर्जित करते थे."

"हज़रत मुहम्मद ने स्वयं कभी पेशवाई का दावा नहीं किया, खज़ाने में उनका हिस्सा भी वही था, जो एक मामूली सिपाही का था. मेहमानों के आ जाने के कारण कभी-कभी उनको कष्ट उठाना पड़ता था, घर की चीज़ें बेच डालनी पड़ती थीं. पर क्या मजाल कि अपना हिस्सा बढ़ाने का ख्याल कभी दिल में आए."

"जब नमाज़ पढ़ते समय मेहतर अपने को शहर के बड़े-से-बड़े रईस के साथ एक ही कतार में खड़ा पाता है, तो क्या उसके हृदय में गर्व की तरंगें न उठने लगती होंगी. इस्लामी सभ्यता को संसार में जो सफलता मिली वह इसी भाईचारे के भाव के कारण मिली है."
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