जन्मदिन: जब जिन्ना की मौत के बाद PAK के पहले कानून मंत्री जोगेंद्र नाथ को भारत लौटना पड़ा

दलित चिंतक और ताकतवर नेता जोगेंद्र नाथ मंडल ने जिन्ना की मौत के साथ ही इस्तीफा दे दिया

दलित चिंतक और ताकतवर नेता जोगेंद्र नाथ मंडल ने जिन्ना की मौत के साथ ही इस्तीफा दे दिया

बंगाल के दलित चिंतक और ताकतवर नेता जोगेंद्र नाथ मंडल (Jogendra Nath Mandal) ने जिन्ना की मौत के साथ ही इस्तीफा दे दिया. वे पाकिस्तान में हिंदू दलितों के साथ हो रहे अन्याय से बेहद आहत थे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 29, 2021, 5:47 PM IST
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सालभर पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीएए (PM Narendra Modi on CAA) पर बात करते हुए जोर देकर एक नाम लिया था, ये नाम था जोगेंद्र नाथ मंडल (Jogendra Nath Mandal). भारतीय राजनीति में ये नाम अनसुना लगता है लेकिन पाकिस्तान की शुरुआती राजनीति में ये नाम काफी प्रभावी रहा. दरअसल मंडल पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री थे, जो पचास के शुरुआती दौर में ही इस्तीफा देकर भारत लौट आए थे. इसकी वजह थी वहां अल्पसंख्यकों पर हिंसा और भेदभाव. आज इन्हीं जोगेंद्र नाथ मंडल का जन्मदिन है.

जोगेंद्र नाथ मंडल का जन्म आज ही के दिन 1904 में बिरिसल जिले (तब बंगाल प्रेसीडेंसी, ब्रिटिश भारत) वर्तमान में बांग्लादेश में हुआ था. वे जिस समुदाय से आते थे, उसे तब हिंदू जाति से बाहर माना जाता था. अपने समुदाय को हिंदुओं में बराबरी का हक दिलाने के लिए मंडल ने बाकायदा एक सामाजिक आंदोलन शुरू किया. इस तरह से वे दलित चिंतक और लीडर के तौर पर उभरे थे.

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पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की जोगेंद्र नाथ मंडल से दोस्ती रही (Photo-news18 English)


सुभाषचंद्र बोस से प्रभावित जोगेंद्र नाथ ने आजादी की लड़ाई में भी खासा योगदान दिया लेकिन वे राष्ट्रीय कांग्रेस की बजाए मुस्लिम लीग से जुड़े हुए आंदोलन करते रहे. इसकी वजह ये भी रही कि वे अपनी नमूसूरा जाति के प्रति भेदभाव को लेकर हिंदू वर्ण व्यवस्था से नाराज थे. लेकिन एक बड़ा कारण उनकी मोहम्मद अली जिन्ना से दोस्ती थी. बताया जाता है कि साल 1946 में बंगाल दंगों के दौरान मंडल ने दलित समुदाय से कहा था कि वे मुसलमानों के खिलाफ किसी हिंसा का हिस्सा न बनें. इससे वे जिन्ना के और करीब आ गए.
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इस बीच भारत विभाजन की बात चली. तब जिन्ना को किसी ऐसे शख्स की जरूरत थी, जो पाकिस्तान में उपस्थित अल्पसंख्यक समुदाय के बीच ताकतवर भी हो लेकिन जो जिन्ना से ज्यादा दमदार न हो. यानी एक मायने में देखा जाए तो वे पाकिस्तान में बहुसंख्यक मुसलमानों और अल्पसंख्यक हिंदुओं के बीच संतुलन के लिए किसी लीडर की तलाश में थे. ऐसे में जोगेंद्र नाथ से बेहतर विकल्प नहीं था. वे जिन्ना के विचारों के समर्थक तो थे ही, साथ ही हिंदुओं में लोकप्रिय भी थे.



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महान दलित चिंतक डॉ भीमराव अंबेडकर और जोगेंद्र नाथ मंडल


तो इस तरह से बंटवारे के साथ मंडल पाकिस्तान चले गए. वहां मंडल पाकिस्तान के संविधान सभा के सदस्य और अस्थायी अध्यक्ष बने और कानून और श्रम के लिए नए बने देश के पहले मंत्री की जिम्मेदारी उन्हें मिली. वे कराची में रहने और कामकाज देखने भी लगे. हालांकि कुछ ही समय बाद उन्हें अल्पसंख्यकों के साथ हो रहा भेदभाव दिखा. लगातार पाकिस्तान में खासकर हिंदुओं के साथ हिंसा की खबरों से मंडल परेशान रहने लगे. उन्होंने एक ताकतवर नेता के तौर पर कई बार लियाकत अली खान मंत्रिमंडल से इसे देखने का अनुरोध किया. ये साल 1950 की बात है.

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आखिरकार बंटवारे के तीन ही सालों के भीतर मंडल ने लियाकत सरकार से अपना इस्तीफा दे दिया और भारत लौट आए. तब जिन्ना की मौत हो चुकी थी और मंडल का दलित-मुस्लिम एकता का सपना भी काफी हद तक टूट चुका था. उनका इस्तीफा इसी ओर इशारा करता था. भारत लौटने के बाद दलितों के साथ अन्याय से आहत मंडल गुमनामी की जिंदगी जीने लगे और अक्टूबर 1968 में पश्चिम बंगाल में उनका देहांत हुआ.

बता दें कि सालभर पहले पीएम मोदी ने इन्हीं मंडल का जिक्र करते हुए कहा था कि कैसे एक प्रचंड दलित नेता को पाकिस्तान के चुनाव पर गुमनामी की जिंदगी और मौत मिली, वहीं भारत के साथ पर डॉ भीमराव अंबेडकर संविधान निर्माता के तौर पर आज तक जीवित हैं.
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