बर्थडे स्पेशल: मां की अपने बेटे के लिए आर्मी वर्दी की चाहत ने बदल दी पाकिस्तान की तकदीर

भारत में जन्मे, तुर्की में पढ़ाई शुरू करने वाले पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ का आज जन्मदिन है.

Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: August 11, 2018, 2:56 PM IST
बर्थडे स्पेशल: मां की अपने बेटे के लिए आर्मी वर्दी की चाहत ने बदल दी पाकिस्तान की तकदीर
परवेज मुशर्रफ की फाइल फोटो
Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: August 11, 2018, 2:56 PM IST
18 साल का एक लड़का, जिसके पिता सिविल सेवा के अधिकारी हैं और मां दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कॉलेज की ग्रेजुएट. लड़का मां का चहेता है. वह मां से पूछता है कि उसे अपने करियर के लिए कौन सी फील्ड चुननी चाहिए? मां को आर्मी की वर्दी बहुत पसंद है. उसे वर्दी के कांसे के बटन शानदार लगते हैं. वह बेटे से सेना में जाने को कहती है और बेटा चला जाता है. तीन साल आर्मी कॉलेज में ट्रेनिंग लेता है और आर्मी ज्वाइन करने के एक साल बाद ही पड़ोसी मुल्क से एक बड़ा युद्ध लड़ता है. उसमें बहादुरी दिखाता है और एक मुल्क की तकदीर बदलने की शुरुआत हो जाती है. यह लड़का था परवेज़ मुशर्रफ और मुल्क पाकिस्तान.

इस किस्से का जिक्र मशहूर पत्रकार सुहासिनी हैदर ने एक दफे किया था. आर्मी की शानदार दिखने वाली वर्दी और उसके कांसे के बटनों वाली बात खुद मुशर्रफ की मां ज़रीन ने उनसे कही थी.

दिल्ली की है पैदाइश
परवेज़ मुशर्रफ अपने तीन भाइयों में दूसरे नंबर पर हैं. मुशर्रफ का जन्म दिल्ली में एक बड़े से घर में 11 अगस्त, 1943 को हुआ था. इस बड़े से घर को 'नहर वाली हवेली' कहा जाता था और यह सर सैयद अहमद खां के घर के पड़ोस में थी. मुशर्रफ के पिता सैयद मुशर्रफ अंग्रेजों के दौर में सिविल सेवा के अधिकारी थे, जो भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान पाकिस्तान चले गए थे. मुशर्रफ उस वक्त 4 साल के थे.

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ईसाई मिशनरियों से पूरी की पढ़ाई
पाकिस्तान आकर सैयद मुशर्रफ ने पाकिस्तान की सिविल सेवा में नौकरी कर ली और विदेश सेवा में होने के नाते उन्हें तुर्की में पोस्टिंग दे दी गई, जहां वे सात साल रहे. परवेज़ मुशर्रफ की शुरुआती पढ़ाई तुर्की में हुई. यही वजह है कि परवेज़ मुशर्रफ तुर्की भाषा के भी अच्छे जानकार हैं. साल 1956 में यह परिवार वापस पाकिस्तान लौट आया और कराची में बस गया. यहीं मुशर्रफ ने अपनी स्कूल की पढ़ाई रोमन कैथोलिक और ईसाई मिशनरिज़ स्कूल से पूरी की.
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साल 1965 और साल 1971 में भारत के खिलाफ लड़े
साल 1961 में मुशर्रफ पाकिस्तान मिलिट्री एकेडमी गए और साल 1964 में आर्मी ज्वाइन की. एक साल बाद ही साल 1965 में पहली बार लेफ्टिनेंट के तौर पर लड़ाई के मैदान में उतरे. अपनी जन्मभूमि और पड़ोसी भारत के खिलाफ. अच्छे से लड़े और वीरता पुरस्कार पाया. साल 1968 में मुशर्रफ ने शादी कर ली, जिसके बाद फिर से साल 1971 के युद्ध में भी भारत के खिलाफ उतरे, लेकिन पाकिस्तान ने इस युद्ध में भारत से मुंह की खाई और पूर्वी पाकिस्तान आज़ाद हो गया. जिसके बाद मुशर्रफ स्पेशल सर्विस कमांडो ग्रुप में चले गये.

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प्रोफेसर मुशर्रफ भी बने
इसके बाद से मुशर्रफ ने अपना ध्यान पढ़ाई-लिखाई में फिर से लगाया और खुद पॉलिटिकल साइंस की पढ़ाई की. ग्रेजुएशन के दौरान मुशर्रफ ने गणित की पढ़ाई की थी और गणित के बेहतरीन छात्र भी रहे थे लेकिन बाद में उनका इंट्रेस्ट इकॉनमिक्स की ओर भी बढ़ गया था. लेकिन शायद मुशर्रफ का इंट्रेस्ट अब राजनीति में बढ़ रहा था, इसलिये उन्होंने पॉलिटिक्स पढ़ी और बाद में मिलिट्री एकेडमी में पढ़ाई भी.

मौत से खेलकर बने पाकिस्तान के सर्वेसर्वा
अक्टूबर, 1998 में मुशर्रफ को चार स्टार के साथ पाकिस्तान का जनरल और आर्मी चीफ बना दिया गया. लग रहा था पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और परवेज़ मुशर्रफ के बीच संबंध बहुत अच्छे चल रहे हैं लेकिन मुशर्रफ को अभी अपने पड़ोसी के हाथों जलील होना बाकी था. एक बार भारत के हाथों मुंह की खा चुके मुशर्रफ ने कारगिल में घुसपैठ करवाई और भारत ने इसका मुंहतोड़ जवाब दिया. तभी पाकिस्तान में मुशर्रफ के बढ़ते प्रभाव को देखकर और कारगिल में पाकिस्तान को हुए नुकसान का प्रयोग कर प्रधानमंत्री शरीफ ने उन्हें पद से हटाना चाहा.

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मुशर्रफ उस दौरान देश से बाहर कोलंबो में थे. जब उन्हें इस षड्यंत्र की भनक लगी तो वे देश वापस लौटे. वे अभी कराची एअरपोर्ट के ऊपर ही पहुंचे थे कि उनके पायलट को बताया गया कि प्लेन को नीचे उतरने की अनुमति नहीं है. प्लेन में 6 मिनट का तेल और बचा था. प्लेन क्रैश होने की कगार पर था और मुशर्रफ की जान जाने की कगार पर लेकिन तभी आर्मी ने गेम कर दिया. सारी की सारी सेना परवेज़ मुशर्रफ के साथ थी. नवाज शरीफ गिरफ्तार कर लिये गये और सेना ने खून की एक बूंद बहाए बिना ही पाकिस्तान की सत्ता अपने हाथों में ले ली और मुशर्रफ पाकिस्तान के सर्वेसर्वा बन गये.

अमेरिका के साथ वफादारी निभाने की भरसक कोशिश की
साल 2002 में जनमत संग्रह के जरिए पाकिस्तान का राष्ट्रपति बनकर मुशर्रफ ने अपनी स्थिति 5 सालों के लिए मजबूत कर ली. मुशर्रफ ने साल 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद पाकिस्तान की अमेरिका के साथ वफादारी दिखाने की भरसक कोशिश की. मुशर्रफ ने आतंकवाद विरोधी छवि बनाने की कोशिश की और जॉर्ज डब्ल्यू बुश के नॉन-नाटो सहयोगियों में प्रमुख बने रहे.

हालांकि उनके दौर में भी पाकिस्तान आतंकवादियों के कहर से बचा नहीं रहा और इस्लामाबाद की लाल मस्जिद में एक भयंकर आतंकी हमला हुआ, जिसमें 102 लोग मारे गए. साल 2007 में होने वाले चुनावों को भी मुशर्रफ ने टाल दिया, जिसके बाद लोगों में उनके खिलाफ गुस्सा साफ जाहिर होने लगा. मुशर्रफ के प्रति यह गुस्सा लोकतांत्रिक राजनीति को नजरअंदाज करने, भ्रष्टाचार और राजनीतिक हत्याओं में हाथ होने के शक के चलते उपजा था. राजनीतिक दल उनके खिलाफ एकजुट हो गये. 'बेनजीर भुट्टो' और 'कबायली नेता' बुगती की हत्या में भी उनका हाथ होने की खबरें आई थीं. लोगों ने एकजुट होकर उनके खिलाफ प्रदर्शन किए और हबीब ज़ालिब की नज्म को मुशर्रफ के लिए नारे के तौर पर पढ़ा, 'तुमसे पहले जो शख्स यहां तख्तनशीं था, उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यकीं था.'

मुशर्रफ को महाभियोग का सामना करने से बचने के लिये गद्दी छोड़नी पड़ी. जिसके बाद वे भागकर इंग्लैण्ड चले आये. इसके बाद बरसों बाद वे पाकिस्तान लौटे. पाकिस्तानी के कुछ टीवी चैनलों पर राजनीतिक विश्लेषक के रूप में दिखने लगे लेकिन इस दौरान उनपर ट्रैवल बैन था. जो अभी कुछ महीने पहले खत्म हुआ है.

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