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जन्मदिन : अंग्रेजी का वो बड़ा साहित्यकार जो सुभाष के घर में अंग्रेजों का जासूस था

नीरद सी चौधरी
नीरद सी चौधरी

अंग्रेजी और बांग्ला के बड़े साहित्यकार नीरद सी चौधरी ( Nirad Chandra Chaudhuri ) 101 साल तक जिए. लेकिन वो ऐसे शख्स थे, जिनके बारे में आमतौर पर मीडिया में बाद कहा गया कि वो दरअसल सुभाष चंद्र बोस के घर पर अंग्रेजों के जासूस थे. वहां से अंग्रेजों तक सूचनाएं पहुंचाते थे. आजादी के बाद वो ब्रिटेन जाकर बस गए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 23, 2020, 4:31 PM IST
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नीरद चन्द्र चौधरी अंग्रेजी के बहुत बड़े साहित्यकार थे. देश विदेश में उनका नाम था. 101 साल की उम्र में उनका निधन ब्रिटेन स्थित उनके निवास पर हुआ. उनके बारे में भारतीय अंग्रेजी मीडिया में अब भी ये कयास लगाया जाता है कि क्या वो ब्रिटिश जासूस थे. सूचनाएं भेजने के लिए उन्हें सुभाष चंद्र बोस के घर पर तैनात किया गया था.


नीरद सी चौधरी का जन्म 23 नवम्बर 1897 को किशोरगंज, पूर्वी बंगाल में हुआ. निधन 01 अगस्त 1999 में ऑक्सफ़ोर्ड में. वो भारत में जन्मे प्रसिद्ध बांग्ला तथा अंग्रेज़ी लेखक थे. जिनकी अंतिम पुस्तक 'थ्री हॉर्समेन ऑफ़ द न्यू एपोकैलिप्स' (1997) का प्रकाशन उनके सौवें जन्मदिन से कुछ पहले हुआ था.


एक अंग्रेजी पत्रिका में पिछले दिनों एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई. जिसमें कहा गया कि जब इंग्लैंड में नीरद सी चौधरी का देहांत हुआ तो बोस परिवार का एक सदस्य वहां मौजूद था. उसने जब वहां एक ब्रिटिश खुफिया अधिकारी को देखा तो वो चकित रह गया. उसने उनसे पूछा, वो यहां कैसे. जवाब में ब्रिटिश खुफिया सर्विस का अधिकारी मुस्कुराया. फिर धीमी आवाज में कहा, आप शायद नहीं जानते कि वह हमारे आदमी थे.


सुभाष के बड़े भाई के सेक्रेट्री थे



नीरद चौधरी 1937 से लेकर 1941 तक सुभाष के बडे़ भाई और बंगाल के जाने-माने वकील शरतचंद्र बोस के सेक्रेट्री थे. जब 1941 में ब्रिटिश अधिकारी शरत को गिरफ्तार करने वाले थे, उससे एक दिन पहले नीरद ने वहां नौकरी छोड़ दी थी.



नीरद चौधरी 1937 से 1941 तक सुभाष के बडे़ भाई और जाने माने वकील शरत चंद्र बोस के सेक्रेट्री थे



शरत की गिरफ्तारी से पहले नौकरी छोड़ दी

शरत के नजदीकी होने के नाते ब्रिटिश अफसरों को उनसे पूछताछ करनी चाहिए थी, इसकी बजाए उन्हें ब्रिटिश राज में नई दिल्ली में आल इंडिया रेडियो में टॉप पोजिशन दे दी गई. सुभाष को हमेशा लगता था कि उनके ही कुछ परिचित या घर पर रहने वाला कोई शख्स पुलिस के मुखबिर के तौर पर काम कर रहा है, क्योंकि उनके घर आने वाले हर शख्स और क्रांतिकारियों की सूचना तब पुलिस के पास पहुंच रही थी.




सरकार ने उनकी खुफिया फाइल जारी करने से मना कर दिया 

1967 में सुभाष चंद्र बोस के भतीजे अमीय नाथ बोस ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से नीरद चौधरी के ब्रिटिश खुफिया विभाग से जुडे़ होने की फाइल सार्वजनिक करने को कहा. इंदिरा और अमीय के दोस्ताना संबंध थे. लेकिन इस फाइल को सरकार ने इसलिए जारी नहीं किया, क्योंकि उसका मानना था कि ऐसा करने पर चौधरी की व्यक्तिगत सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी. इसके बाद चौधरी ब्रिटेन जाकर बस गए और अपने निधन तक वहीं रहे. वो लगातार यही मानते थे कि ब्रिटेन ही असल में उनका देश है.


वो जटिल और सनकी शख्स थे



वकील पिता और निरक्षर माता के बेटे नीरद का शेक्सपीयर तथा संस्कृत के शास्त्रीय ग्रंथों पर समान अधिकार था. वह अपनी संस्कृति के साथ पश्चिमी संस्कृति के घोर प्रशंसक थे. "भारतकोश" में उनकी प्रोफाइल में लिखा गया है, "वह एक पांडित्यपूर्ण, लेकिन जटिल व सनकी व्यक्ति थे. उनकी सबसे सटीक व्याख्या ग़लत स्थान पर ग़लत समय में जन्मे व्यक्ति के रूप में की जा सकती है."

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ब्रिटिश शासन के वफ़ादार
भारत के साहित्यिक परिदृश्य पर नीरद चन्द्र चौधरी का आगमन विवादों से घिरा हुआ था. वह ब्रिटिश शासन के प्रति वफ़ादार थे. अपनी पहली पुस्तक 'द ऑटोबायोग्राफ़ी ऑफ़ एन अननोन इंडियन' (1951) को ब्रिटिश साम्राज्य को समर्पित किया था. उनका पक्का मानना था, "हममें जो कुछ भी अच्छा तथा जीवंत है, वह 200 वर्ष पुराने औपनिवेशिक शासन के दौरान ही पोषित और विकसित हुआ है."

आजादी के बाद बुरा हाल हो गया
जब ब्रिटिश राज भारत में रहा, तब तक तो वो आल इंडिया रेडियो में टॉप पोजिशन में नौकरी करते रहे. लेकिन आजादी के बाद वो अस्वीकार्य व्यक्ति बन गए. जब उन्होंने आजादी के बाद अंग्रेजों के शासन की तारीफ की तो उन्हें ऑल इंडिया रेडियो से बाहर निकाल दिया गया. 1970 में वो स्थायी तौर पर बसने के लिए इंग्लैंड चले गए.

आखिरी भूरा साहब कहे गए
नीरद चन्द्र चौधरी को 'अंतिम ब्रिटिश साम्राज्यवादी' और 'अंतिम भूरा साहब' कहा गया. उनकी कृतियों की आलोचना हुई. भारत के साहित्यिक जगत् से उनका बहिष्कार कर दिया गया. वो इंग्लैंंड जाकर ऑक्सफ़ोर्ड में बस गए. बकौल उनके ये घर लौटने के समान था.

अंग्रेजों ने सम्मान दिया
इंग्लैंड में भी नीरद चौधरी आमतौर पर अलग-थलग सरीखे ही थे. अंग्रेज़ों ने उन्हें सम्मान दिया. उन्हें 'ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय' से मानद डॉक्टरेट की उपाधि मिली. महारानी की ओर से मानद सी.बी.ई. से सम्मानित किया गया लेकिन वो वहां भी पूरी तरह स्वीकार्य नहीं हो पाए. हालांकि बाद में उन्हें लगने लगा कि अंग्रेजों की महानता हमेशा के लिए खत्म हो गई है. ये बात उनकी पुस्तकों 'दाई हैंड', 'ग्रेट एनार्क' (1987) में प्रदर्शित हुई. उन्होंने लिखा, "अग्रेज़ों की महानता हमेशा के लिए समाप्त हो गई है."

अपनी आखिरी किताब 'थ्री हॉर्समेन ऑफ़ द न्यू एपोकैलिप्स' में उन्होंने भारतीय लीडरशिप और एक देश तौर पर भारत को कोसने का काम किया. हालांकि बाद में उन्हें अपने देशवासियों की तारीफ भी मिली.

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