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Birthday : क्यों साथियों ने उस दिन नहीं दिया था मंगल पांडे का साथ

मंगल पांडे

मंगल पांडे

Birthday Mangal Pandey : 19 जुलाई 1857 को मंगल पांडे का जन्मदिन होता है. वो पहले शख्स थे, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया था. अंग्रेजों ने 15 दिनों के भीतर उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया लेकिन उन्होंने उनकी चिंगारी ऐसी आग जरूर बन गई, जिसने आने वाले समय में अंग्रेजों के लिए लगातार मुश्किल खड़ीं कीं

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दिन था 21 मार्च 1857. बैरकपुर में 34वीं पलटन की परेड चल रही थी. गुस्से में भरा एक सिपाही अपनी भरी हुई बंदूक लेकर कतार में सामने आ गया. वो करीब डेढ़ महीने से गुस्से से भरा हुआ था. उसे महसूस हो रहा था कि अंग्रेजों ने दगा करके उसके धर्म को भ्रष्ट कर दिया है. उन दिनों अंग्रेजों की सेना में ब्राह्णण बहुत कम शामिल होते थे. काश उस दिन उसके साथियों ने अगर उसका साथ दिया होता तो अंग्रेजों के होश तभी फाख्ता हो जाते.

वो ब्राह्णण सिपाही मंगल पांडे थे, जिन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला विद्रोही भी कहा जाता है. ये भी कहा जाता है कि अगर वो नहीं होते तो आजादी की लड़ाई की चिंगारी उस तरह 1857 में सुलगी ही नहीं होती. उन्होंने पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ पहली बार व्यापक तौर पर गुस्से का माहौल बनाया था. हालांकि ये बात भी सही है कि उसी दौरान चुपचाप देशभर में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की योजना कई रजवाड़े बना चुके थे. इसे बस अमल में लाया जाना था.

मंगल पांडे का आज यानि 19 जुलाई को जन्मदिन है. वर्ष 1827 में बलिया के नगवा में उनका जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ. शायद परिवार को उनका सेना में जाना पसंद नहीं था. उन दिनों गांवों में खेती का हाल बुरा था. किसानों की सारी आमदनी तमाम कर देने में चली जाती थी. गांवों में तब ज्यादातर ब्राह्मण परिवार भी आर्थिक तौर भी मुश्किल से गुजर रहे थे, लिहाजा तब गांवों के तमाम ब्राह्णण युवा भी सेना में शामिल होने लगे.

बंगाल की बैरकपुर छावनी में शहीद सैनिक मंगल पांडे का स्मारक

तब उस शख्स ने मंगल पांडे पर ताना कसा
सेना में जाने के बाद वो ध्यान रखते थे कि किस तरह पूरी शुचिता के साथ धर्म का पालन करें. जात-पात का भाव भी ज्यादा था. ये जनवरी 1857 की बात है. बंगाल आर्मी के ब्राह्णण सिपाही मंगल पांडे से किसी व्यक्ति ने पानी पीने के लिए लोटा मांगा. मंगल पांडे ने लोटा देने से इनकार कर दिया, क्योंकि वो व्यक्ति नीची जाति का था. इस पर उस व्यक्ति ने ताना कसा कि जिस ऊंची जाति का तुम्हें घमंड है, वो तो सेना में रहकर कारतूसों को दांत से काटने के बाद ऐसे ही भ्रष्ट हो चुकी है.

सिपाही गुस्से से उबल रहे थे
मंगल पांडे गुस्से से वापस छावनी में आये. अपने साथियों को ये जानकारी दी. साथियों में भी नाराजगी फैल गई. अंग्रेजों को पता लगा कि कारतूस की चर्बी की वजह से सैनिकों में नाराजगी फैल रही है. वो सावधान हो गए. हालांकि उन्होंने सफाई भी दी कि इस कारतूस में गाय की चर्बी नहीं है. लेकिन इस सफाई से मामला और बिगड़ गया.इसके बाद कई और अफवाहें फैलीं, जिसने सिपाहियों का गुस्सा बुरी तरह बढ़ा दिया. वो अंदर ही अंदर क्रोध से उबल रहे थे. स्थिति विस्फोटक होती जा रही थी.

अंग्रेज उन्हें दबाव में लेने लगे
जनवरी में सिपाहियों ने कारतूस इस्तेमाल करने से साफ मना कर दिया. अंग्रेज अफसर सैनिकों का डराने लगे कि अगर वो इसी तरह इनकार करते रहे तो उन्हें दूरदराज के स्थानों या दूसरे देश भेज दिया जाएगा. ऐसा लगने लगा कि अंग्रेजों ने ठान लिया है कि वो इस कारतूस का इस्तेमाल करवा करके ही रहेंगे. उत्तेजित सिपाहियों के सब्र का बांध टूटने ही वाला था.

क्या हुआ था 21 मार्च 1857 के दिन
21 मार्च 1857 के दिन जब बैरकपुर में 34वीं पलटन की परेड चल रही थी, तभी मंगल पांडे अपनी भरी हुई बंदूक लेकर कतार में सामने आ गया. उसने अपने साथियों को अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए ललकारा. लेकिन उसका कोई भी साथी अपनी जगह से हिला भी नहीं. इतिहासकार अशोक गांगुली की किताब भारतीय स्वाधीनता संग्राम का इतिहास कहती है कि उसके बार बार कहने के बाद भी कोई सिपाही अपनी जगह से हिला भी नहीं.

अगर दूसरे साथियों ने साथ दिया होता तो…
अगर उस दिन मंगल पांडे के ललकारने पर उसके दूसरे साथी आगे बढ़े होते तो शायद बहुत कुछ नहीं होता. हो सकता है कि अंग्रेज अफसर दबाव में आ जाते. हो सकता है कि तब 1857 के विद्रोह की शक्ल कुछ और होती. अपने साथियों को आगे नहीं बढ़ता देखकर मंगल पांडे ने सार्जेंट मेजर ह्यूसन पर गोली चला दी. ह्यूसन वहीं ढेर हो गया. तब दूसरा अफसर लेफ्टिनेंट वाग अपने घोड़े पर सवार होकर आगे बढ़ा. मंगल पांडे ने उसे जख्मी कर दिया.

मंगल पांडे ने खुद को गोली मार ली थी लेकिन …
इसके बाद जब अंग्रेज अफसरों ने मंगल पांडे को गिरफ्तार करना चाहा तो उन्होंने खुद को गोली मारकर मरना बेहतर समझा. अपने पर गोली दाग दी. लेकिन मरने की बजाए मंगल पांडे जख्मी हो गए. अस्पताल में इलाज हुआ. ठीक होने के बाद उनका कोर्ट मार्शल किया गया. फांसी की सजा सुनाई गई. 08 अप्रैल 1857 को यानि मुश्किल 15 दिनों के भीतर ही उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया. लेकिन मंगल पांडे का नाम अमर हो गया.

Tags: 1857 Indian Mutiny, 1857 Kranti, Freedom fighters, Freedom Movement, Freedom Struggle Movement, Mangal Pandey

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