Explained: क्या है Black Fungus का कोरोना मरीजों की दी जा रही ऑक्सीजन से संबंध?

ऑक्सीजन देते हुए ह्यूमिडिफिकेशन की प्रक्रिया में स्टेराइल पानी का इस्तेमाल होना जरूरी है- सांकेतिक फोटो (Photo- news18 English via Reuters)

ऑक्सीजन देते हुए ह्यूमिडिफिकेशन की प्रक्रिया में स्टेराइल पानी का इस्तेमाल होना जरूरी है- सांकेतिक फोटो (Photo- news18 English via Reuters)

देश में कोरोना के बीच ब्लैक फंगस (Black fungus amid coronavirus) की बीमारी दोगुना वार कर रही है. कोरोना से सीधा संबंध न होने के बाद भी इसका ग्राफ बढ़ने की कई वजहों में एक है- ऑक्सीजन देते हुए स्टेराइल पानी (non-sterile water) का इस्तेमाल न होना.

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देशभर में कोरोना महामारी के बीच ब्लैक फंगस भी कोहराम मचा रहा है. खासतौर पर महाराष्ट्र, गुजरात और मध्यप्रदेश में ब्लैक फंगस तेजी से पैर पसार रहा है. कई राज्यों ने इसे महामारी तक घोषित करते हुए इसपर ध्यान देने की बात की. ब्लैक फंगस के बारे में कहा जा रहा है कि ये आमतौर पर कोरोना के दौरान मरीजों के स्टेरॉयड के ज्यादा सेवन से होता है. हालांकि अब ये भी सामने आया है कि अस्पताल में ऑक्सीजन ले रहे मरीजों के उपकरण में स्टेराइल वॉटर का इस्तेमाल न होना या फिर उपकरणों का डिसइंफेक्ट न होना भी इस फंगल बीमारी की वजह बन रहा है.

ब्लैक फंगस के मामले दूसरे देशों में नहीं

इस फंगस का कोरोना से कोई सीधा संबंध नहीं. कोरोना संक्रमण के मामले अमेरिका और यूरोपियन देशों में भी आए लेकिन वहां पर ब्लैक फंगल फैलने जैसी खबरें नहीं आईं. तो फिर क्या वजह है कि हमारे यहां ये शिकायत मिल रही है? कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक ब्लैक फंगस से तेजी से बढ़े मामलों के पीछे ऑक्सीजन ले रहे मरीजों के आसपास साफ-सफाई का पूरा ध्यान न दिया जाना है.

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कोरोना का कहर झेल चुके पश्चिमी देशों की बजाए भारत में ब्लैक फंगस बीमारी फैल रही है- सांकेतिक फोटो (Photo- news18 English via AP)

असल में मौजूदा लहर के दौरान अस्पताल में भर्ती होकर ऑक्सीजन ले रहे मरीजों की संख्या बढ़ी. विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार जल्दबाजी में ऐसे मरीजों को ऑक्सीजन देते हुए उसमें नल का पानी इस्तेमाल होता है, जिससे संक्रमण का डर होता है.

ऑक्सीजन और स्टेराइल पानी में ताल्लुक

अस्पतालों में जो ऑक्सीजन उपयोग में आती है, उसे मेडिकल ऑक्सीजन कहते हैं. ऑक्सीजन का ये रूप काफी शुद्ध होता है. इसकी शुद्धता 99.5% होती है, जो काफी सारी प्रक्रियाओं से गुजरकर मिलती है. शुद्धिकरण के बाद ये ऑक्सीजन तरल रूप में सिलेंडरों में स्टोर की जाती है और अस्पतालों तक पहुंचती है. वहां से ये गैस के रूप में मरीजों को मिलती है.



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यहां हो सकती है समस्या

मरीजों को दिए जाने के दौरान इसे नमीकरण (humidification) की प्रक्रिया से गुजारा जाता है. इसके लिए इसे स्टेराइल पानी से भरे कंटेनर में रखते हैं. गौर करें कि ये पानी स्टेराइल होना चाहिए, यानी किसी भी तरह की गंदगी के मुक्त. अस्पतालों के प्रोटोकॉल के तहत ये पानी लगातार बदला भी जाना चाहिए. अगर ये पानी साफ नहीं है या फिर नल से लिया गया हो, तो बहुत डर है कि मरीज को ब्लैक फंगस अपनी गिरफ्त में ले ले. चूंकि अभी अस्पतालों और निजी क्लिनिकों पर काफी बोझ है, ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि स्टाफ स्टेराइल पानी की बजाए सादा लेकिन अशुद्ध पानी इस प्रक्रिया में लगा रहा हो. ब्लैक फंगस बढ़ने की एक वजह ये भी मानी जा रही है और इसका जिक्र भी किया जा रहा है.

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अस्पतालों में जो ऑक्सीजन उपयोग में आती है, उसे मेडिकल ऑक्सीजन कहते हैं- सांकेतिक फोटो

समझिए, क्या है स्टेराइल पानी?

ये जीवाणुमुक्त पानी होता है यानी किसी भी तरह से बैक्टीरिया या फिर दूसरे जर्म्स से रहित. ये पानी चिकित्सा अनुसंधान में अहम भूमिका निभाता है. अगर लैब में किसी प्रयोग के दौरान पानी स्टेराइल न हो तो इससे न केवल प्रयोग के रिजल्ट पर असर होता है, बल्कि शोध कर रहे लोगों की सेहत पर भी असर हो सकता है. शिशुओं और कमजोर इम्युनिटी वाले लोगों के लिए भी रोजमर्रा में स्टेराइल पानी के उपयोग की सलाह दी जाती है. यही कारण है कि अस्पताल में ऑक्सीजन लेते हुए इस बात पर ध्यान देने की बात की जा रही है कि प्रक्रिया के दौरान स्टेराइल पानी ही इस्तेमाल हो.

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स्टेरॉयड किस तरह से लाया खतरा?

इसके अलावा ब्लैक फंगस फैलने की एक वजह स्टेरॉयड का गैरजरूरी या जरूरत से ज्यादा सेवन भी कहा जा रहा है. बता दें कि कोरोना के इलाज के दौरान स्टेरॉइड का सेवन केवल और केवल डॉक्टरों की सलाह पर ही होना चाहिए. वही तय करेंगे कि कब और कैसे और कितनी मात्रा में ये खाना चाहिए. बीमारी की शुरुआती अवस्था में स्टेरॉइड लेने पर इसका उल्टा असर होता है और कोरोना का प्रकोप तो कम नहीं होता, बल्कि स्टेरॉइड के कारण मरीज की इम्युनिटी कम जरूर हो जाती है. यही वो समय है, जब ब्लैक फंगस का संक्रमण होता है. इसके अलावा उन लोगों में इसका खतरा रहता है जो डायबिटीज या कैंसर के मरीज हों.

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ब्लैक फंगस फैलने की एक वजह स्टेरॉयड का गैरजरूरी या जरूरत से ज्यादा सेवन भी कहा जा रहा है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

ब्लैक फंगस क्या है?

ब्लैक फंगस संक्रमण कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता वालों को ही होता है. अब चूंकि कोरोना के हमले के कारण बहुत से लोग कमजोर हो चुके हैं तो ऐसे में ये फंगल इंफेक्शन भी बढ़ा. जबकि पहले ये बीमारी कीमोथेरेपी, अनियंत्रित शुगर, किसी भी तरह के ट्रांसप्लांट से गुजरने वाले लोगों और बुजुर्गों को ज्यादा प्रभावित करती थी.

इस तरह होता है संक्रमण

बीमारी म्यूकॉरमाइसाइट्स नामक फफूंद से होती है. ये फफूंद नाक से होते हुए शरीर के बाकी अंगों तक पहुंचता है. आमतौर पर ये फंगस हवा में होता है और सांस के जरिए नाक में जाता है. कई बार शरीर के कटे या जले हुए स्थानों के इस फंगस के संपर्क में आने पर भी इंफेक्शन हो जाता है. यानी नाक इसके प्रवेश की मुख्य जगह है लेकिन ये शरीर के किसी भी अंग पर आक्रमण कर सकता है.

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