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करगिल युद्ध के दौरान PM वाजपेयी ने कई बार की शरीफ से बात, किताब में सनसनीखेज दावा

देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (flickr)

देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (flickr)

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) के निजी सचिव शक्ति सिन्हा (Shakti Sinha) की आने वाली किताब में करगिल युद्ध और वाजपेयी की कूटनीति पर भरपूर बात की गई है.

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    साल 1999 के करगिल युद्ध की कई बातें एक-एक करके सामने आ रही हैं. उस दौरान देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच कई बार टेलीफोन पर बात हुई. तब भारतीय पीएम ने माना था कि पाक पीएम शरीफ का अपनी सेना पर कोई नियंत्रण नहीं, बल्कि सारी ताकत जनरल परवेज मुशर्रफ के पास थी.

    इस बात का खुलासा पूर्व ब्यूरोक्रेट शक्ति सिन्हा ने अपनी हालिया किताब में किया है. बता दें कि सिन्हा कई सालों तक वाजपेयी के निजी सचिव के तौर पर काम करते रहे. करगिल लड़ाई के दौरान भी वे प्रधानमंत्री दफ्तर में महत्वपूर्ण पद पर थे और सारी कार्रवाई पर बारीकी से नजर रखे हुए थे.

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    अपनी किताब- “Vajpayee: The Years that Changed India” में सिन्हा इसपर विस्तार से बात करते हैं. वे बताते हैं कि तब हालात ऐसे बन चुके थे कि वाजपेयी को अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि पाकिस्तानी हमले में मुशर्रफ का हाथ है. पाकिस्तान के तत्कालीन पीएम शरीफ को किनारे करते हुए सेना प्रमुख मुशर्रफ ने भारत के साथ युद्ध के हालात बना दिए.

    तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच कई बार टेलीफोन पर बात हुई- सांकेतिक फोटो (firstpost)


    वाजपेयी के 96वें जन्मदिन पर 25 दिसंबर को आ रही ये किताब सनसनीखेज खुलासों से भरी दिखती है. लेखक शक्ति सिन्हा ने दावा किया है कि करगिल युद्ध के दौरान डेढ़ महीने के भीतर ही वाजपेयी ने शरीफ से लगभग 4 से 5 बार टेलीफोन पर बात की. भारत-पाक रिश्तों को देखते हुए ये अपने-आप में असामान्य बात है. लेकिन इस बातचीत के पीछे वाजपेयी की मकसद हालात को समझना था. सिन्हा के मुताबिक फोन पर बातचीत शुरू होने के पीछे भी एक कहानी है.

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    द हिंदू ने किताब के हवाले से इसके कुछ हिस्से पर बात की है. इसमें बताया गया कि पाकिस्तान के साथ बेहद तनावपूर्ण संबंधों के बीच ही तत्कालीन पीएम वाजपेयी ने बैक चैनल डिप्लोमेसी का रास्ता भी चुना. ये वो टर्म है, जिसके तहत दो देश किसी तनावपूर्ण मुद्दे को खुली हुई कूटनीति की बजाए कुछ अलग ढंग से सुलझाते हैं. इस कूटनीति के लिए तब आर के मिश्रा नाम के अधिकारी को चुना गया. ये अधिकारी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के पूर्व चीफ थे और विदेशी मामलों की संवेदनशीलता को समझने और उसे जस का तस सामने रखने में माहिर थे. मिश्रा ने वाजपेयी को कई बातें बताई, जिसके बाद ही उन्होंने शरीफ से बातचीत करने और उसे जारी रखने का फैसला लिया.

    वाजपेयी के 96वें जन्मदिन पर 25 दिसंबर को आ रही ये किताब सनसनीखेज खुलासों से भरी दिखती है (news18 creative)


    दरअसल खुद मिश्रा लगातार शरीफ से संपर्क में थे. उन्होंने बातचीत के दौरान पाया कि शरीफ पीएम पद पर रहते हुए भी काफी कमजोर पड़े हुए थे. यहां तक कि उन्हें शक था कि उनके घर पर टैपिंग हो रही है और कोई भी बातचीत गुप्त तौर पर नहीं हो सकती. यही कारण है कि मिश्रा के बातचीत के लिए मिलने पर शरीफ ने उन्हें घर के भीतर बात करने की बजाए गार्डन में टहलते हुए बात करने का न्यौता दिया.

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    मिश्रा ने ये वाकया वाजपेयी को बताया और उन्हें ये समझते देर नहीं लगी कि शरीफ की बजाए सत्ता सेना प्रमुख मुशर्रफ के हाथों में जा चुकी है और शरीफ अब केवल हालातों के दास बनकर रह चुके हैं. इस बात का जिक्र पीएम सचिव सिन्हा ने अपनी किताब में विस्तार से किया है.

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    किताब में वे लिखते हैं- मध्य मई से 4 जुलाई तक डेढ़ महीने की अवधि में वाजपेयी ने निश्चित रूप से शरीफ से 4 से 5 बार बात की होगी, उस समय पाकिस्तान के पीएम सार्वजनिक रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन के सामने घोषणा कर चुके थे कि पाकिस्तान अपनी ओर की नियंत्रण रेखा से अपने सैनिकों को वापस कर लेगा.

    एलओसी पर पाकिस्तानी हमले के पीछे पाक सेना का ही हाथ था- सांकेतिक फोटो


    दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की बातचीत के बारे में सिन्हा ने कई बातें लिखी हैं. जैसे दोनों के बीच फोन पर एक बातचीत जून के मध्य में हुई, जब वाजपेयी श्रीनगर में थे. सिन्हा किताब में लिखते हैं- श्रीनगर पहुंचने के बाद वाजपेयी ने मुझसे कहा कि नवाज शरीफ को फोन लगाइए. मेरी छोटी सी टीम और मैंने कोशिश की लेकिन हमलोग फोन नहीं लगा सके. लेकिन तभी एक स्थानीय ऑफिसर ने कहा कि जम्मू और श्रीनगर से पाकिस्तान कॉल करने पर रोक लगा दी गई थी. तब दूरसंचार विभाग के अधिकारियों को कहा गया कि इस सुविधा को कुछ देर के लिए बहाल करें, ताकि दोनों प्रधानमंत्री बात कर सकें.

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    बैक-चैनल डिप्लोमेसी के अलावा वाजपेयी ने कई और तरीके भी अपनाए, जिससे पाक सैनिक करगिल से पीछे हटे. इसमें खुफिया एजेंसी रॉ का भी बड़ा हाथ रहा. किताब में बताया गया है कि कैसे सेना के दो अधिकारियों के बीच गुप्त बातचीत रॉ ने रिकॉर्ड कर ली और इस बात का इस्तेमाल पाकिस्तान पर इंटरनेशनल दबाव बनाने के लिए हुआ.

    सिन्हा की किताब में एक वाकये का जिक्र है, जिसमें रॉ के तत्कालीन चीफ अरविंद दवे टेलिफोनिक रिकॉर्डिंग लेकर वाजपेयी के पास पहुंचे थे. इसमें पाक आर्मी चीफ परवेज मुशर्रफ और पाकिस्तान के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ ले. ज. मोहम्मद अजीज की बातचीत थी, जिसे सुनने के बाद शक की कोई गुंजाइश नहीं रही कि एलओसी पर पाकिस्तानी हमले के पीछे पाक सेना का ही हाथ था. बता दें कि पाक सेना ने हमले में अपनी भूमिका से इनकार करते हुए कहा था कि इसमें मुजाहिदों का हाथ है. रिकॉर्डिंग बाद में मीडिया में जाहिर हो गई. साथ ही साथ इसे शरीफ को भी भिजवाया गया. इस बातचीत के मीडिया में आने के बाद पाकिस्तान की सेना और उसके प्रमुख की काफी बेइज्जती हुई थी.

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