BR Ambedkar Jayanti : क्यों हिंदू धर्म त्यागकर बौद्ध बन गए थे डॉ. अंबेडकर

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर अपने भाषणों में लगातार ही हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था पर प्रहार करते थे. 1935 में उन्होंने हिंदू धर्म त्याग दिया.

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर अपने भाषणों में लगातार ही हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था पर प्रहार करते थे. 1935 में उन्होंने हिंदू धर्म त्याग दिया.

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर (Dr BR Ambedkar) ने 1935 में हिंदू धर्म (Hindu religion) छोड़ दिया. इसके 21 साल बाद उन्होंने बौद्ध धर्म (Buddhism) अपनाया. उन्होंने क्यों हिंदू धर्म छोड़ा और क्यों इतने साल बाद बौद्धिज्म की शरण में जाने का फैसला किया.

  • News18India
  • Last Updated: April 14, 2021, 10:08 AM IST
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आज भी ये सवाल पूछा जाता है कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने हिंदू धर्म (Hinduism) क्यों छोड़ा. लंबे समय तक उन्होंने कोई धर्म स्वीकार नहीं किया. फिर करीब 20 साल बाद वो बौद्ध धर्म की शरण में गए. आखिर उन्होंने बौद्ध धर्म ही क्यों स्वीकार किया. असल में अंबेडकर बहुत पहले से ही बौद्ध धर्म से प्रभावित होने लगे थे.  हालांकि फिर से कोई नया धर्म स्वीकार करने के फैसले को उन्होंने लंबे समय तक टाले रखा. फिर एक दिन खुद और 3.85 लाख समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया. हालांकि वो अपने भाषणों में इस बारे में बातें 20 साल पहले से करने लगे थे.

इसकी शुरूआत राजनेता और समाज सुधारक डॉ. भीमराव आंबेडकर (Dr Bhim Rao Ambedkar) के 1935 के एक भाषण से होती है. देखें उस यादगार भाषण के ये अंश :

आप एक सम्मानजनक जीवन चाहते हैं तो आपको अपनी मदद खुद (Self Help) करनी होगी और यही सबसे सही मदद होगी... अगर आप आत्मसम्मान चाहते हैं, तो धर्म बदलिए. अगर एक सहयोगी समाज चाहते हैं, तो धर्म बदलिए. अगर ताकत और सत्ता चाहते हैं, तो धर्म बदलिए. समानता (Equality).. स्वराज (Independence).. और एक ऐसी दुनिया बनाना चाहते हैं, जिसमें खुशी खुशी जी सकें तो धर्म बदलिए.


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अंबेडकर ने 1935 में एक भाषण दिया था, जिसका बहुत विरोध भी हुआ था, जिसमें उन्होंने पहली बार दलितों से हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था पर प्रहार करते हुए धर्म बदलने की बात की थी..

गांधी ने भी उनके भाषण पर एतराज जताया था

ये भाषण इस कदर उकसाने वाला समझा गया कि कई नेता उनके विरोध में आ गए. देश की 20 फीसदी से ज़्यादा आबादी को भड़काने के आरोप अंबेडकर पर लगे लेकिन उन्होंने साफ कहा 'जो शोषित हैं, उनके लिए धर्म को नियति का नहीं बल्कि चुनाव का विषय मानना चाहिए'. महात्मा गांधी तक ने उनकी बातों पर एतराज जताया.

गांधी ने कहा था 'धर्म न तो कोई मकान है और न ही कोई चोगा, जिसे उतारा या बदला जा सकता है. यह किसी भी व्यक्ति के साथ उसके शरीर से भी ज़्यादा जुड़ा हुआ है'. गांधी का विचार था कि समाज सुधार के रास्ते और सोच बदलने के रास्ते चुनना बेहतर था, धर्म परिवर्तन नहीं. लेकिन, अंबेडकर कट्टर जातिवादी हो चुके और पिछड़ों का हर तरह से शोषण कर रहे हिंदू धर्म से इस कदर आजिज़ आ चुके थे कि उनकी नज़र में समानता के लिए धर्म बदलना ही सही रास्ता था.



1935 में छोड़ दिया हिंदू धर्म 

किताब "बी आर अंबेडकर एंड बुद्धिज़्म इन इंडिया "  के अनुसार अंबेडकर ने कहा, "मैं हिंदू धर्म में पैदा ज़रूर हुआ, लेकिन हिंदू रहते हुए मरूंगा नहीं." 1935 में ही अंबेडकर ने इस वक्तव्य के साथ हिंदू धर्म छोड़ने की घोषणा कर दी थी. लेकिन, औपचारिक तौर पर कोई अन्य धर्म उस वक्त नहीं अपनाया था. अंबेडकर समझते थे कि यह सिर्फ उनके धर्मांतरण की नहीं बल्कि एक पूरे समाज की बात थी इसलिए उन्होंने सभी धर्मों के इतिहास को समझने और कई लेख लिखकर शोषित समाज को जाग्रत व आंदोलित करने का इरादा किया.

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लंदन के गोलमेज सम्मेलन में महात्मा गांधी के साथ मौजूद डॉ. अंबेडकर. हालांकि तमाम मुद्दों पर गांधी और अंबेडकर के बीच हमेशा मतभेद रहे.


बौद्ध धर्म को ज्यादा तर्कसंगत और वैज्ञानिक माना

साल 1940 में अंबेडकर ने "द अनटचेबल्स" में लिखा, "भारत में जिन्हें अछूत कहा जाता है, वो मूल रूप से बौद्ध धर्म के अनुयायी थे. ब्राह्मणों ने इसी कारण उनके साथ नफरत पाली." इस थ्योरी के बाद अंबेडकर ने 1944 में मद्रास में एक भाषण में कहा कि बौद्ध धर्म सबसे ज़्यादा वैज्ञानिक और तर्क आधारित धर्म है. कुल मिलाकर बौद्ध धर्म के प्रति अंबेडकर का झुकाव और विश्वास बढ़ता रहा. आज़ादी के बाद संविधान सभा के प्रमुख बनने के बाद बौद्ध धर्म से जुड़े चिह्न अंबेडकर ने ही चुने थे.

उन्होंने शपथ दिलाई-हिंदू धर्म के कर्मकांड नहीं करेंगे

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर स्थित दीक्षाभूमि में अंबेडकर ने विधिवत बौद्ध धर्म स्वीकार किया. इसी दिन महाराष्ट्र के चंद्रपुर में अंबेडकर ने सामूहिक धर्म परिवर्तन का एक कार्यक्रम भी किया और अपने अनुयायियों को 22 शपथ दिलवाईं जिनका सार ये था कि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद किसी हिंदू देवी देवता और उनकी पूजा में विश्वास नहीं किया जाएगा. हिंदू धर्म के कर्मकांड नहीं होंगे और ब्राह्मणों से किसी किस्म की कोई पूजा अर्चना नहीं करवाई जाएगी. इसके अलावा समानता और नैतिकता को अपनाने संबंधी कसमें भी थीं.

धर्म परिवर्तन और उसके बाद

अंबेडकर के धर्म परिवर्तन के बाद भी समय समय पर दलितों ने बड़ी संख्या में बौद्ध धर्म स्वीकार किया लेकिन ये सही है कि उनकी 6 दिसंबर 1956 को मृत्यु के बाद ये आंदोलन थोड़ा धीमा जरूर पड़ा. हालांकि अब भी देश में जगह जगह से दलितों के बौद्ध धर्म स्वीकार करने की खबरें आती हैं.

2011 की जनगणना के मुताबिक देश में करीब 84 लाख बौद्ध हैं, जिनमें से करीब 60 लाख महाराष्ट्र में हैं और ये महाराष्ट्र की आबादी के 6 फीसदी हैं. जबकि देश की आबादी में बौद्धों की आबादी 1 फीसदी से भी कम है.

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नागपुर स्थित दीक्षाभूमि का प्रसिद्ध स्तूप, जहां अंबेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकारा था. उनके साथ बड़ी संख्या में उनके अनुयायी भी बौद्ध धर्म में आए थे.


अक्सर लोग पूछते हैं कि डॉक्टर अंबेडकर ने हिंदू धर्म छोड़ा तो बौद्ध धर्म ही स्वीकार क्यों किया. वो मुस्लिम, ईसाई या धर्म की ओर क्यों नहीं गए. सही बात ये है कि उन्होंने दूसरे धर्मों की ओर जाने के  बारे में ना तो कभी सोचा और ना ही कभी कहा.


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