कौन थे परशुराम, जिनकी भव्य प्रतिमा लगाने की बात कर रही हैं मायावती

कौन थे परशुराम, जिनकी भव्य प्रतिमा लगाने की बात कर रही हैं मायावती
उत्तरप्रदेश में भगवान परशुराम की ऊंची प्रतिमा लगाने के वादे की होड़ चल पड़ी है

उत्तरप्रदेश में भगवान परशुराम की ऊंची प्रतिमा (installation of statue of lord Parashuram in Uttar Pradesh) लगाने के वादे की होड़ चल पड़ी है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 10, 2020, 1:48 PM IST
  • Share this:
पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती (Mayawati, former CM of Uttar Pradesh ) ने सरकार बनने पर परशुराम की भव्य मूर्ति बनवाने की बात की है. मायावती का ये वादा सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) के तुरंत बाद आया है, जिसमें उन्होंने परशुराम की 108 फीट ऊंची मूर्ति लगवाने का वादा किया है. माना जा रहा है कि परशुराम को लेकर ये वादा ब्राह्मण वोटरों को लुभाने के लिए किया जा रहा है. इस बीच जानिए, कौन हैं परशुराम, जो ब्राह्मण वोट बैंक का जरिया बन सकते हैं.

आखिर कौन थे परशुराम 
मान्यता है कि परशुराम त्रेता काल में एक ऋषि जमदग्नि के यहां जन्मे थे. उन्हें भगवान विष्णु का अवतार भी माना जाता है. यही वजह है कि उन्हें समय-समय पर भगवान परशुराम के नाम से भी संबोधित किया गया. वैसे हाथों में हमेशा एक अस्त्र परशु रखने के कारण भी उन्हें परशुराम नाम दिया गया. ये कुल्हाड़ी से मिलता-जुलता हथियार है, जिसे हिंदी में फरसा भी कहा जाता है. पुराणों में इस परशु का खूब उल्लेख मिलता है और बताया जाता है कि भगवान परशुराम के इस अस्त्र में चमत्कारिक शक्तियां थीं और ये खुद भगवान शिव ने उन्हें दिया था.

बसपा सुप्रीमो मायावती ने सरकार बनने पर परशुराम की भव्य मूर्ति बनवाने की बात की है (Photo-flickr)

क्रोध के लिए जाने जाते हैं


भगवान परशुराम को दूसरे ऋषियों की तुलना में उनके गुस्से के लिए जाना जाता है. इसके पीछे भी कई मान्यताएं हैं, जिनका जिक्र रामायण, महाभारत, भागवत पुराण और कल्कि पुराण जैसे कई ग्रंथों में मिलता है. परशुराम अपनी मां से बहुत प्रेम करते थे लेकिन पिता की आज्ञा पर एक बार उन्होंने मां का तक वध कर दिया था. हालांकि बाद में खुद ही पिता से उन्हें जीवित कर देने का वर मांगा था. श्रीमद्भागवत में इस बात का उल्लेख भा है.

ये भी पढ़ें: अब भगवान बुद्ध को लेकर क्यों भारत और नेपाल में ठनी?

क्षत्रियों के संहार का किस्सा
वैसे परशुराम को सबसे ज्यादा जिस बात के लिए याद किया जाता है, वो है क्षत्रियों के संहार के लिए. माना जाता है कि उन्होंने 21 बार एक खास वंश के क्षत्रियों को खत्म कर दिया था. इसकी शुरुआत सहस्रार्जुन नाम के राजा से हुई थी. हुआ यूं था कि राजा ने परशुराम के पिता के आश्रम से उन्हें तोहफे में मिली कामधेनु गाय को जबर्दस्ती उठा लिया और अपने महल ले आया. परशुराम गाय वापस लेने गए तो राजा ने उन्हें युद्ध के लिए ललकारा और मारा गया.

ये भी पढ़ें: पुराने समय में मंदिरों में होती थी सम्मोहन क्रिया, बहुत खास था मकसद 

21 बार किया नाश
इसके बाद राजा के पुत्रों ने बदला लेने के लिए परशुराम के पिता यानी ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी. पति की मौत से दुखी परशुराम की माता रेणुका सती हो गईं. इस घटना में माता-पिता दोनों को खोए परशुराम बेहद गुस्से में आ गए और तभी उन्होंने संकल्प लिया कि वे हैहय वंश से सारे क्षत्रियों का नाश कर देंगे. इसके बाद परशुराम ने घूम-घूमकर हर जगह से इस वंश को खत्म कर दिया था. ऐसा 21 बार हुआ था.

परशुराम को सबसे ज्यादा जिस बात के लिए याद किया जाता है, वो है क्षत्रियों का संहार


कर्ण को दिया शाप
इसी बीच परशुराम ने क्षत्रियों को कभी शिक्षा न देने का संकल्प भी लिया था. माना जाता है कि वे धरती पर सभी तरह के अस्त्र-शस्त्रों के सबसे बड़े जानकार थे और उनके सामने देवलोक के देवता भी नहीं टिक सकते थे. उनके इसी ज्ञान के कारण कर्ण उनसे शिक्षा लेने आए. तब कर्ण ने खुद को सूतपुत्र बताया था क्योंकि वे यही जानते भी थे. परशुराम ने उन्हें शस्त्र विद्या देना शुरू कर दिया, तभी एक घटना से उन्हें यकीन हो गया कि कर्ण भी एक क्षत्रिय है. इसपर भड़के हुए परशुराम ने उन्हें शाप दे दिया कि सबसे जरूरी समय आने पर कर्ण अपनी विद्या भूल जाएंगे और मारे जाएंगे. ऐसा ही हुआ. महाभारत के मुताबिक कुरुक्षेत्र में लड़ाई के दौरान कर्ण अचानक विद्या भूल गए और अर्जुन के हाथों मारे गए.

ये भी पढ़ें: क्यों दवाओं पर ट्रंप का नया आदेश भारत के लिए बना मुसीबत?  

वैसे अस्त्र-शस्त्रों के जानकार परशुराम को उत्तर भारतीय मार्शल आर्ट वदक्कन कलरी का जनक भी माना जाता है. ये विद्या केरल के मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु से मिलती-जुलती है.

जानवरों की बोली के ज्ञाता
हालांकि परशुराम का केवल यही पक्ष नहीं था. माना जाता है कि वे पशु-पक्षियों को लेकर काफी नर्म थे. वे सारे जानवरों और पंक्षियों की भाषा समझते और उनसे बात किया करते थे. यहां तक कि खूंखार से खूंखार जानवर भी उनके छूते ही मित्र बन जाता था. साथ ही वे स्त्रियों के मामले में भी उस काल के हिसाब से काफी खुले मन के थे. वे पुरुषों से एकपत्नीव्रता होने की अपेक्षा करते थे और यही सीख देते थे.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज