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इतिहास- मध्य यूरोपीय कांस्य युग में अनोखी चीजों का मुद्रा की तरह होता था उपयोग

मध्य यूरोप (Central Europe) के कांस्य युग (Bronze Age) के बारे में यह खोज नई पद्धति से की गई है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)
मध्य यूरोप (Central Europe) के कांस्य युग (Bronze Age) के बारे में यह खोज नई पद्धति से की गई है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

मध्य यूरोप (Central Europe) के कांस्य युग (Bronze Age) में लोग कांसे के छल्ले, कुल्हाड़ी के फलक वगैरह का उपयोग मानक मुद्रा (Standard currency) के तौर पर उपयोग में लाते थे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 23, 2021, 2:53 PM IST
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पैसा यानि कि मुद्रा (Currency) आधुनिक सभ्यता (civilization) में आर्थिक गतिविधियों का प्रमुख आधार है. आज पैसे के बिना आधुनिक जीवन की कल्पना करना ही संभव नहीं है. मानक मुद्रा (Standard currency) की अहमियत और निर्भरता दोनों को आज नकारा नहीं जा सकता, लेकिन मानक मुद्रा हर सभ्यता में उपयोग में नहीं लाई जाती थी. पुरातत्वविदों  कांस्ययुग (Bronze Age) में मानक मुद्रा के उपयोग को लेकर एकमत नहीं हैं.  लेकिन ताजा अध्ययन से पता चला है कि मध्य यूरोप में कांस्य युग के लोग कांसे के छल्ले (Rings), कुल्हाड़ी के फलक (Blades) का उपयोग मानक मुद्रा के तौर पर करते थे.

मानक मुद्रा का उपयोग
आमतौर पर माना जाता है कि कांस्य युग में मुद्रा का चलन व्यापक नहीं था. लेकिन शोध में कहा गया है कि मध्य यूरोपीय लोगों ने इस युग में इस प्रकार की मुद्रा का मानकीकरण कर रखा था. लेडन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का यह अध्ययन  PLOS ONE जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

सटीक मापन की कमी
उस दौर में मानकीकरण के सटीक मापन नहीं हो पाता था, इसलिए पुरातत्वविद इस बात से सहमत नहीं हैं कि आज के जर्मनी, ऑस्ट्रिया, चेक रिपब्लिक और दूसरी जगहों पर मिली चीजें वास्तव में एक मुद्रा के तौर पर उपयोग में लाई जाती थीं या फिर उनका दूसरी चीजों के लिए इस्तेमाल हुआ करता था. ये चीजें करीब छह हजार साल पुरानी हैं. उस दौर में मध्य यूरोप में कृषि प्रधान समाज हुआ करते थे जहां कांसे को उकरण, हथियार, इमारतों के निर्माण की सामग्री आदि के लिए उपयोग में लाया जाता था.



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मध्य यूरोप (Central Europe) के कांस्य युग (Bronze Age) में कांसे के छल्ले, कुल्हाड़ी के फलक आदि का उपयोग मुद्रा के लिए होता था. (तस्वीर: Leiden University)


नई पद्धति से लगाया पता
यूरोपीय प्रागैतिहास के असिस्टेंट प्रोफेसर और इस अध्ययन के प्रमुख लेखक माइकेल कुइजप्रेस का कहना है कि यह शोध नई पद्धति पर आधारित है जो उन्होंने विकसित की है, वह उस युग में लोग वजन कैसे लेते होंगे, इसके ज्यादा साम्य है. कुइजप्रेस और उनके सहलेखक कैटेलिन पोपा ने 100 संचय वाले स्थानों के करीब 5000 से ज्यादा चीजों का अध्ययन किया.

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नहीं होता था तराजु का उपयोग
उस युग में इन इलाकों के लोग किसी तरह के तराजु का उपोयग नहीं करते ते बल्कि एक वैज्ञानिक सिद्धांत वैबर फ्रैक्शन का उपयोग कर वजनों की तुलना करते थे. माना यह जाता है कि अगर दो वस्तुओं का भार एक ही सा है तो उसे हाथों का उपयोग कर नहीं बताया जा सकता है. शोधकर्ताओं ने पाया कि 70 प्रतिशत छल्ले जिनका औसत 195 ग्राम था इतने समान थे कि हाथ से उनके भार में अंतर कर पाना मुश्किल था.

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इस तरह के छल्ले छह हजार साल पहले मुद्रा के तौर पर अपनाए गए थे. (तस्वीर: Twitter BrianRoemmele)


कितनी कीमती थी ये मुद्रा
ऐसा नहीं है कि ये दुनिया की सबसे पुरानी मुद्रा है. इससे बहुत पहले मैसोपोटामिया ने 5 हजार साल पहले सिक्कों को चलाया था. लेकिन कुइजप्रेस का कहना है कि उनकी पद्धति पुराने समय की चीजों के अवलोकन करने के ज्यादा उपयोगी है. जहां तक यह पता लगाने की बात है कि कोई वस्तु आज की मुद्रा के हिसाब से कितनी कीमती है और उससे क्या क्या खरीदा जाता होगा, यह जानना असंभव है. कुइजप्रेस का कहना है कि यह बहुत साफ है कि इन चीजों की सामग्री बहुत कीमती है.

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इतिहासकारों को हमेशा से ही मानना रहा है कि कांस्ययुगीन मध्य यूरोप में वजन लेने की और मुद्रा व्यवस्था पनपी नहीं होगी. फिर भी इस अध्ययन को प्रागैतिहासिक पुरातत्व विज्ञान की एक अवधारणा को तोड़ने वाला माना जा सकता है जिसमें समझा जाता है कि पुरातन समाजों में व्यवस्थित व्यवावसायिक अर्थव्यवस्था नहीं होती होगी.
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