वो पूर्व गृह मंत्री, जिसने जूते पोंछकर किया था 'पापों का प्रायश्चित'!

कांग्रेस के पूर्व दिग्गज नेता बू​टा सिंह.

कांग्रेस के पूर्व दिग्गज नेता बू​टा सिंह.

चार प्रधानमंत्रियों की टीम में रहे बूटा सिंह ने 86 साल की उम्र में आखिरी सांस ली. ब्रेन हेमरेज के चलते एम्स में भर्ती किए गए सिंह अक्टूबर 2020 से कोमा में थे. जानिए छह दशकों के राजनीतिक करियर ने सिंह को क्या पहचान दिलाई.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 3, 2021, 1:22 PM IST
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राजीव गांधी की सरकार (Rajiv Gandhi Government) में देश के गृह मंत्री का पद संभालने वाले बूटा सिंह के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) और कांग्रेस नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) समेत कई गणमान्य लोगों ने श्रद्धांजलि दी. बहुत मुमकिन है कि एक ज़माने में कांग्रेस के दिग्गज नेता बूटा सिंह के बारे में नई पीढ़ी न जानती हो. हो सकता है कि आपको जानकर हैरानी हो कि सिंह को राजीव गांधी का सबसे मज़बूत हाथ और उस समय कांग्रेस के सबसे वफ़ादारों में गिना जाता था. यही नहीं, बार-बार कांग्रेसी रहे बूटा सिंह सिर्फ एक महीने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी सरकार (Vajpayee Government) में मंत्री भी रहे थे!

विवादों से सिंह का साथ अक्सर बना रहा तो इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी तक कांग्रेस के शीर्ष परिवार के बेहद करीबी रहे सिंह का सियासी करियर 1960 के दशक में शुरू हुआ था, जिन्हें बाद में कुटिल, चालाक और शीर्ष नेता समझा गया. जानिए कौन थे बूटा सिंह...

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अकाली दल से हुई शुरूआत
1960 के दशक से अकाली दल से जुड़कर राजनीतिक सफर शुरू करने वाले बूटा सिंह पहली बार 1962 में लोकसभा सांसद चुने गए थे. मोगा से यह चुनाव जीतते ही सिंह ने अकाली दल छोड़कर कांग्रेस का हाथ थामा. 1967 में कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुने गए सिंह अपने करियर में कुल 8 बार लोकसभा सांसद रहे.

टिकट लेने और चुनाव जीतने के लिए सुर्खियों में रहे सिंह को पहली बार 1974 में मंत्री पद मिला था और उसके बाद से उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. इमरजेंसी के चलते जब इंदिरा गांधी सरकार को केंद्र में आने का मौका नहीं मिला और जनता पार्टी सत्ता में आई, तब 1978 में सिंह को कांग्रेस संगठन में महासचिव की भूमिका मिली.

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इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और नरसिम्हा राव, इन तीन कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों के मंत्री रहे बूटा सिंह.



गांधी परिवार से निकटता

कांग्रेस में भूमिका मज़बूत होने के साथ ही सिंह की नज़दीकियां गांधी परिवार के साथ बढ़ती गईं. 1980 में जब इंदिरा गांधी सत्ता में लौटीं तो जूनियर की जगह अब सिंह को कैबिनेट मंत्री का पद मिला. लेकिन सिंह का करियर चरम पर पहुंचा, राजीव गांधी सरकार के समय. 1986 में सिंह को देश के गृहमंत्री का पद सौंपा गया यानी राजीव सरकार में कांग्रेस और देश के दूसरे सबसे बड़े नेता सिंह ही थे.

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जानकार कहते हैं कि उस समय बूटा सिंह को सरकार में शीर्ष पद देने के पीछे वजह यह थी कि राजीव सिख समुदाय में संदेश पहुंचाना चाहते थे कि 1984 के दंगों और इंदिरा गांधी की हत्या के बावजूद कांग्रेस सिखों के प्रति संवेदनशील थी. दूसरी तरफ, सिंह को गांधी परिवार 'यस मैन' कहा जाता था. वो गांधियों के लिए 'सब कुछ' मैनेज कर सकने वाले नेता बताए जाते थे.

विवादों में उलझे रहे सिंह

राजीव सरकार में बड़ा पद मिलने के बाद गांधी परिवार के साथ अपनी वफादारी जताने के चक्कर में बूटा सिंह ने गोल्डन टेंपल में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार के समर्थन में खुलकर बयान दे दिए. नतीजा यह हुआ कि अकाल तख्त ने उन्हें 'जा​तबाहर' कर दिया. एक रिपोर्ट की मानें तो बहिष्कृत सिंह ने गुरुद्वारों में बर्तन धोकर और जूते पोंछकर सेवा करते हुए प्रायश्चित किया. एक और रिपोर्ट कहती है कि सज़ा के तौर पर सिंह को ऐसा करना पड़ा.

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इसके अलावा, राजीव गांधी ने 1989 में जब अयोध्या में राम मंदिर बनवाने के लिए शिलान्यास की इजाज़त दी थी, तब कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों को गिराने के लिए भी सिंह विवादों में रहे. हालांकि बाद में अपनी इस भूमिका से सिंह ने पल्ला झाड़ने की कोशिश की थी. 1995 में नरसिम्हाराव सरकार में खाद्य आपूर्ति मंत्री बनाए गए सिंह का नाम जब जैन हवाला केस में आया तो एक साल बाद ही उन्हें पद छोड़ना पड़ा था.


इस विवाद के चलते कांग्रेस से भी उनका रिश्ता टूटा. 1998 में वाजपेयी सरकार में मंत्री बने सिंह को एक साल के भीतर इस्तीफा देना पड़ा क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड में उनके खिलाफ आरोप तय करने के आदेश दिए थे. पहले इस केस में सीबीआई अदालत ने राव और सिंह दोनों को दोषी ठहराया था, लेकिन बाद में हाईकोर्ट से दोनों नेता बरी हुए.

सिंह की घर वापसी

सोनिया गांधी जब कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं, तब सिंह की कांग्रेस में वापसी हुई. बिहार के राज्यपाल के तौर पर सिंह को दोबारा सैटल करने की कोशिश हुई लेकिन वो फिर विवाद में पड़े. सिंह ने एनडीए के सरकार बनाने के दावे को पटरी से उतारने के लिए विधानसभा को भंग करवा दिया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बूटा सिंह को खासी फटकार लगाई. राज्यपाल के इस कदम को असंवैधानिक करार देकर सिंह को सीधे तौर पर निशाना बनाया.

नतीजतन, सिंह को इस्तीफा देना पड़ा. बाद में उन्हें अनुसूचित जाति आयोग में भूमिका दी गई थी, जो साफ तौर पर सिंह के राजनीतिक पतन का संकेत था. इसके बाद बूटा सिंह ने फिर कांग्रेस से हाथ छुड़ाया और दो लोकसभा चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़े. 2015 में फिर सिंह की कांग्रेस में वापसी हुई लेकिन इस वक्त तक वो कांग्रेस में अपने ही अतीत के साये में घिरे नज़र आने लगे थे.

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