हमेशा के लिए विदा हुआ तीन तलाक, ऐतिहासिक दिन बना 30 जुलाई

मुस्लिम महिला संरक्षण अधिनियम 2019 के साथ ही मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी में नए और उजले दौर की शुरुआत होगी. अब अगर उन्हें तलाक से गुजरना भी पड़ा तो ना केवल न्यायपूर्ण होगा बल्कि कानूनसंगत भी

News18Hindi
Updated: July 30, 2019, 10:31 PM IST
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वर्ष 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने जब तीन तलाक को असंवैधानिक करार देकर ये कहा था कि कुरान में तीन तलाक की कोई पुख्ता व्याख्या नहीं है. उसके बाद दो तरह की बातें हुईं-बहुसंख्य मुस्लिम समाज और संगठन इसके विरोध उठ खड़े हुए लेकिन मुस्लिम महिलाएं आमतौर पर इससे खुश नजर आईं. इसके बाद नजरें सरकार पर आकर टिक गईं कि अब वो क्या करने वाली है. क्या वो इस संबंध में पुख्ता कानून लाकर इतिहास को बदलेगी या फिर उसी पुरानी लीक पर चलेगी, जिस पर अब तक केंद्र में सरकारें चलती रही हैं.

सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद नजरें देश की संसद पर थीं वो इस बारे में क्या रुख दिखाती है. इस दृष्टि से 30 जुलाई का दिन वाकई ऐतिहासिक दिन कहा जाना चाहिए जब देश की संसद ने मुस्लिम स्त्रियों के साथ न्याय किया है. उन्हें उस अन्याय की जंजीरों से छुटकारा दिलाया गया है, जिससे वो ना जाने कितने युगों से बंधी हुई थीं. नया कानून उन्हें उस ताकत से लैस करेगा, जिसकी आवाज लंबे समय से उठती रही है.

ये बिल जब यूपीए सरकार की अगुवाई गुरुवार को लोकसभा में पास हुआ तो ये चौथा मौका था जबकि ये लोकसभा ने इसे हरी झंडी दिखाई. अब सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या राज्यसभा में ये बिल पास हो सकेगा. क्योंकि राज्यसभा में यूपीए अब बहुमत में नहीं है. लेकिन सरकार ने सभी पार्टियों को भरोसे में लिया. जिस तरह से इस बिल के पक्ष में 99 वोट पड़े और विपक्ष में 84, उससे जाहिर है कि कई पार्टियों ने इस पर अपना दृष्टिकोण बदला, इसी का नतीजा है कि राज्यसभा में जब इसे चौथी बार पेश किया गया तो मंजूरी के साथ इतिहास बन गया.

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तीन तलाक अब देश में अपराध बना. अगर कोई पुरुष ऐसा करता पाया गया तो तीन साल की सजा के साथ आर्थिक दंड का भी हकदार होगा


यूपीए सरकार बधाई की पात्र 
पहले ये माना जा रहा था कि इस बिल में राज्यसभा फिर से अडंगी लगाकर इसे प्रस्ताव कमेटी के पास भेज सकती है लेकिन ये प्रस्ताव जब गिर गया तो तय हो गया कि 30 जुलाई का दिन ऐतिहासिक होने जा रहा है. हालांकि इसके लिए यूपीए सरकार और उसके नेतृत्व की तारीफ करनी होगी कि वो लगातार इस बिल पर मजबूती के साथ खड़े रहे और उन्होंने किसी भी तरह के विरोध से खुद को विचलित नहीं होने दिया.
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भारत भी तीन तलाक पर बैन लगाने वाले देशों में शामिल 
अब हम उन 23 देशों के साथ शामिल हो गए हैं, जहां तीन तलाक बैन है. इसमें हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश और श्रीलंका में भी शामिल हैं.

भारत में आमतौर पर मुस्लिम संगठन और नेता बार बार इस बिल को मुस्लिम समाज के लिए अन्यायपूर्ण और गलत साबित करने में लगे थे, लेकिन ये नहीं भूलना चाहिए कि मिस्र वो मुस्लिम देश था, जहां पहली बार तीन तलाक को प्रतिबंधित किया गया था. जो 23 देश तीन तलाक को बैन कर चुके हैं, उसमें ज्यादातर देश मुस्लिम ही हैं. इसमें साइप्रस, जॉर्डन, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया, इराक, ब्रुनेई, मोरक्को, कतर, कुवैत, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया, लेबनान, लीबिया, सीरिया, मलेशिया शामिल हैं.

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बांग्लादेश तो इस मामले में काफी आगे
बांग्‍लादेश तो इस मामले में काफी आगे है. यहां मह‍िला ह‍ितों को ध्‍यान में रखते हुए एक साथ तीन बार बोलकर ल‍िया जाने वाला तलाक बैन है. अगर क‍िसी दंपत्ति को तलाक लेना भी है तो वह तलाक-ए-बिद्दत के तहत नहीं बल्‍क‍ि एक पूरी प्रक्रिया न‍िभाकर अलग होते हैं.हालांकि पाकिस्तान में तीन तलाक अब तक बैन नहीं है लेकिन वहां भी इस बात पर विचार हो कि इसे प्रतिबंधित कर दिया.

तीन तलाक से मुस्लिम महिलाओं का जीवन हर स्तर पर मुश्किल होता रहा है


देश में पिछले कुछ सालों में जब भी तीन तलाक की बात होती रही है तो इसके पक्ष और विपक्ष में तमाम तर्क आते रहे हैं. यद्यपि सभी ने बीते बरसों में देखा कि जो महिलाएं तीन तलाक का शिकार हुईं हैं, उनका जीवन कितना कठिन हो गया, आर्थिक से लेकर सामाजिक स्तर तक उन्हें पग-पग पर मुश्किलों का सामना करना पड़ा.

मसीहा बनीं शाह बानो
1986 में पहली बार शाह बानो मुस्लिम महिला के रूप में तीन तलाक के बाद गुजारे भत्ते के लिए अदालत पहुंची थी. इसके बाद से ही देशभर में तीन तलाक के खिलाफ माहौल बनने लगा था. जब कभी मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को लेकर कोई बहस चलती है, तब शाह बानो केस को याद किया जाता है क्योंकि यह पहला इतना बड़ा और चर्चित मुकदमा था, जिसने पूरे देश को आंदोलित कर दिया था. यहां तक कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसके चलते जो फैसले किए, उसके दूरगामी परिणाम वो हुए, जिसके बारे में किसी ने कभी नहीं सोचा था.

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राजीव गांधी सरकार भी वाहवाही लूट सकती थी लेकिन..
हालांकि राजीव गांधी की सरकार अगर चाहती तो उसी समय तीन तलाक मामले पर न्यायपूर्ण कानून बनाकर वाहवाही लूट सकती थी, बजाए इसके जब उन्होंने इस मामले पर कठमुल्लाओं के विरोध को बढते देखा तो एक कानून मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 पास करवा दिया. जो मुस्लिम महिलाओं के लिए बड़ा कुठाराघात था, जिससे शाह बानो के पक्ष में आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला ही पलट गया. तब इसे सियासी तौर पर मुस्लिम तुष्टिकरण कहा गया था.

राजीव गांधी की सरकार वर्ष 1986 में चाहती तो सख्त कानून बनाकर वाहवाही लूट सकती थी लेकिन वो मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते ऐसा कानून नहीं बना पाई


50 साल पहले संघर्ष की वो शुरुआत
हालांकि इस पूरे सफर में एक और घटना को याद किया जाना चाहिए, जब 50 साल पहले एक सेक्युलरिस्ट ने ट्रिपल तलाक को खत्म करने के लिए संघर्ष की शुरुआत की थी. इस आंदोलनकारी का नाम था हमीद दलवाई जिसने 60 और 70 के दशक में तीन तलाक के खिलाफ आवाज़ बुलंद की थी. हमीद ने ही मुस्लिम महिलाओं को ये हिम्मत दी की तलाक-ए-बिद्दत यानी इंस्टेंट तलाक के खिलाफ घरों से बाहर निकलें. हमीद ने महिलाओं को अपने लिए आवाज़ उठाने के लिए जागरूक किया था.
1966 में मुंबई में विधानसभा के पास एक मार्च निकाला गया. महिलाओं की हाथों में ट्रिपल तलाक खत्म करने को लेकर बैनर और पर्चे थे जिसका नेतृत्व कर रहे थे हमीद दलवाई. ट्रिपल तलाक के खिलाफ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन का ये पहला मामला था. इस मार्च में केवल सात महिलाएं थीं, जो तीन तलाक की शिकार हुई थी.

बीती बात हुए हलाला, हुल्ला जैसे शब्द
ट्रिपल तलाक पर पाबंदी के बाद उलझाने वाले हलाला, हुल्ला, मुहल्लिल, इद्दत और ख़ुला जैसी प्रक्रियाएं और शब्द भी खत्म हो जाएंगे. दरअसल मुस्लिम समाज में तलाक की पूरी प्रक्रिया ही ऐसी है, जिसमें पुरुषों का कुछ नहीं बिगड़ता और महिलाएं पग पग पर कष्ट भोगने पर मजबूत हो जाती है.

संशोधित बिल से जुड़ी पांच अहम बातें

-- तीन तलाक कानून 'गैरजमानती' रहेगा लेकिन आरोपी जमानत मांगने के लिए सुनवाई से पहले भी मजिस्ट्रेट से गुहार लगा सकते हैं. गैरजमानती कानून के तहत, जमानत थाने में ही नहीं दी जा सकती.
-- यह प्रावधान इसलिए जोड़ा गया है ताकि मजिस्ट्रेट 'पत्नी को सुनने के बाद' जमानत दे सकें. सरकार ने साफ किया है कि, 'प्रस्तावित कानून में तीन तलाक का अपराध गैरजमानती बना रहेगा.'

-- मजिस्ट्रेट तय करेंगे कि जमानत केवल तब ही दी जाए जब पति विधेयक के अनुसार पत्नी को मुआवजा देने पर राजी हो. विधेयक के मुताबिक, मुआवजे की राशि मजिस्ट्रेट द्वारा तय की जाएगी.

--पुलिस केवल तब प्राथमिकी दर्ज करेगी जब पीड़ित पत्नी, उसके किसी करीबी संबंधी या शादी के बाद उसके रिश्तेदार बने किसी व्यक्ति की ओर से पुलिस से गुहार लगाई जाती है.
-- विधेयक के अनुसार, मुआवजे की राशि मजिस्ट्रेट द्वारा तय की जाएगी. एक अन्य संशोधन यह स्पष्ट करता है कि पुलिस केवल तब प्राथमिकी दर्ज करेगी जब पीड़ित पत्नी, उसके किसी करीबी संबंधी या शादी के बाद उसके रिश्तेदार बने किसी व्यक्ति द्वारा पुलिस से गुहार लगाई जाती है.

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First published: July 30, 2019, 10:29 PM IST
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