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अब कर्नाटक के असली किंग बन गए हैं येडियुरप्पा, यूं उपचुनाव में जमाया रंग

News18Hindi
Updated: December 9, 2019, 3:11 PM IST
अब कर्नाटक के असली किंग बन गए हैं येडियुरप्पा, यूं उपचुनाव में जमाया रंग
उपचुनाव के नतीजों से कर्नाटक विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत हासिल हो गया है.

17 विधायकों (MLAs) को अयोग्य करार देने से पैदा हुई रिक्तियों को भरने के लिए 15 सीटों पर 6 दिसंबर को उपचुनाव हुए थे. इन में से दो सीटों मस्की और राजराजेश्वरी नगर पर कर्नाटक हाईकोर्ट में मामला लंबित है, इसलिए यहां चुनाव बाद में होंगे. बाकी बची सभी 15 सीटें बीजेपी (BJP won 15 seats) ने जीत ली हैं.

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  • Last Updated: December 9, 2019, 3:11 PM IST
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15 मई 2018 को कर्नाटक विधानसभा चुनावों की गिनती जैसे-जैसे आखिरी दौर में पहुंच रही थी बीएस येडियुरप्पा की मुश्किलें बढ़ रही थीं. कारण ये था कि बीजेपी सिंगल लारजेस्ट पार्टी बनने के बावजूद बहुमत के जादुई आंकड़े से कुछ अंक पीछे रह गई थी. हालांकि सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते बीजेपी को सरकार बनाने का मौका मिला लेकिन आखिरकार येडियुरप्पा सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाए. उन्होंने एक भावनात्मक भाषण दिया और अपने पद से त्यागपत्र दे दिया. उधर कांग्रेस ने जनता दल सेकुलर को बिना शर्त समर्थन देकर कुमारस्वामी को राज्य के मुख्यमंत्री पद पर बिठा दिया.

कांग्रेस ने जेडीएस को समर्थन दे तो दिया था लेकिन दोनों दलों के बीच तालमेल ठीक से नहीं बैठ पाया. आखिर करीब एक साल बाद सरकार गिर गई. इसके बाद एक बार फिर गेंद येडियुरप्पा के पाले में आ गई. जुलाई महीने में वो एक बार फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने. अब 17 विधायकों को अयोग्य करार देने से पैदा हुई रिक्तियों को भरने के लिए 15 सीटों पर 6 दिसंबर को उपचुनाव हुए थे. इन में से दो सीटों मस्की और राजराजेश्वरी नगर पर कर्नाटक हाईकोर्ट में मामला लंबित है, इसलिए यहां चुनाव बाद में होंगे. बाकी बची सभी 15 सीटें बीजेपी ने जीत ली हैं. माना जा रहा है कि इस जीत के साथ ही अब कर्नाटक की राजनीति में स्थायित्व का दौर आएगा. जीत के बाद खुद येडियुरप्पा ने भी कहा कि अब वो राज्य में स्थायित्व वाली सरकार देने की कोशिश करेंगे. बीजेपी की प्रचंड जीत ने साबित कर दिया है कि कर्नाटक की राजनीति के असली किंग बीएस येडियुरप्पा हैं.

जोड़-तोड़ के महारथी
येडियुरप्पा कर्नाटक में पॉलिटिक्स के जोड़-तोड़ के महारथी हैं. बुकंकरे सिद्धालिंगप्पा येडियुरप्पा कर्नाटक राजनीति के इतने मजबूत नाम हैं कि उनका विकल्प खोज पाना मुमकिन नहीं. एक हारी हुई बाजी को जीतकर वो ऐसा साबित भी कर चुके हैं.

बीजेपी के सारथी येडियुरप्पा ही क्यों
वैसे कर्नाटक में पिछले चुनावों से पहले जब बीजेपी को कर्नाटक में अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करनी थी तो उसके सामने मुख्यमंत्री पद के तीन विकल्प थे. अनंत हेगड़े, प्रताप सिम्हा और बीएस येडियुरप्पा. लेकिन बीजेपी ने अपना दांव पहले दोनों नेताओं की हिंदुत्ववादी छवि को दरकिनार करते हुए येडियुरप्पा पर लगाया. यह गलत भी साबित नहीं हुआ और बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. हालांकि वह बहुमत से थोड़ी दूर रहे और कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर गठबंधन सरकार बनाई.

वो भी येडियुरप्पा ही थे जिन्होंने दक्षिण भारत में पहली बार कमल खिलाकर किसी राज्य में बीजेपी का खाता खोला था. बाद में हालांकि वो भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे, पार्टी से दरकिनार कर दिए गए, जिसके बाद उन्हें अपनी एक पार्टी कर्नाटक जनता पक्ष बनानी पड़ी. लेकिन 2014 में उनकी बीजेपी में फिर से वापसी हुई और वो कर्नाटक के प्रदेश अध्यक्ष के रास्ते से होते हुए पार्टी के सीएम कैंडिडेट भी बने.

जमीनी नेता रहे हैं येडियुरप्पा
येडियुरप्पा को सिर्फ लिंगायत का नेता नहीं कहा जा सकता है. कर्नाटक के मांड्या जिले के बुकानाकेरे में सिद्धलिंगप्पा और पुत्तथयम्मा के घर 27 फरवरी 1943 को जन्मे येडियुरप्पा ने चार साल की उम्र में अपनी मां को खो दिया था. उन्होंने अपने पॉलिटिकल करियर की शुरुआत साल 1972 में शिकारीपुरा तालुका के जनसंघ अध्यक्ष के रूप में की थी. इमरजेंसी के दौरान वो बेल्लारी और शिमोगा की जेल में भी रहे. यहां से उन्हें किसान नेता के तौर पर पहचान मिली. साल 1977 में जनता पार्टी के सचिव पद पर काबिज होने के साथ ही राजनीति में उनका कद और बढ़ गया.

विवादों से गहरा नाता
येडियुरप्पा पर जमीन घोटाले और अवैध खनन घोटाले के आरोप लग चुके हैं. लोकायुक्त की रिपोर्ट के चलते बीजेपी आलाकमान ने मुख्यमंत्री की कुर्सी से रुखसत होने को कह दिया था. नवंबर 2010 में येडियुरप्पा पर आरोप लगा कि उन्होंने बेंगलुरु में प्रमुख जगहों पर अपने बेटों को भूमि आवंटित करने के लिए अपने पद का दुरुपयोग किया जिससे वह विवादों के एक और घेरे में आ गए. पांच फरवरी 2011 को उन्होंने अपनी संपत्ति सार्वजनिक की और और कांग्रेस को चेतावनी दी कि वह उनके पास 'काले धन' की बात साबित करके दिखाए.

एक सप्ताह में दो बार हासिल किया था विश्वासमत
मई 2008 में उन्होंने बहुमत से कम के आंकड़े के साथ शासन की शुरुआत की लेकिन विपक्षी और निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में कर उन्होंने जबर्दस्त बहुमत जुटा लिया जो इस्तीफा देकर उपचुनाव में उतरे. उन्होंने अपने अभियान को 'ऑपरेशन लोटस' नाम दिया और 224 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा बहुमत हासिल करने में सफल रही. लेकिन खनन क्षेत्र से जुड़े प्रभावशाली रेड्डी बंधु जनार्दन और करुणाकर उनके लिए परेशानी का सबब बने रहे. बाद में बीजेपी के ही 11 बागी विधायकों और पांच निर्दलीय विधायकों ने येडियुरप्पा सरकार से समर्थन वापस लेकर उन्हें संकट में डाल दिया. वह बच गए और दो बार विश्वास मत में जीत हासिल की. पहला ध्वनि मत से जीता जिसे राज्यपाल एच.आर. भारद्वाज ने असंवैधानिक करार दिया. उसके बाद उन्हें एक और शक्ति परीक्षण करना पड़ा जिसमें वह 100 के मुकाबले 106 मतों से विजयी हुए. भारद्वाज के साथ अक्सर मतभेद रखने वाले येडियुरप्पा भारतीय विधायिका के इतिहास में पहले ऐसे मुख्यमंत्री साबित हुए, जिन्होंने एक ही सप्ताह में दो बार विश्वास मत जीता.

येदियुरप्पा ने कहा, ‘लगता है हमारे सितारे ही गर्दिश में’

कुमारस्वामी से मिला था धोखा
बगावत करने वाले 11 विधायकों को उच्च न्यायालय द्वारा अयोग्य करार दिये जाने के फैसले से संकट टलता देख रहे येडियुरप्पा के सामने फिर से कठिनाई का दौरा शुरू हुआ जब जेडीएस ने उन पर तथा उनके परिवार पर भूमि घोटालों के अनेक आरोप लगाए. गौरतलब है कि कांग्रेस की धरम सिंह नीत गठबंधन सरकार को हटाने में जेडीएस नेता कुमारस्वामी की मदद करके येडियुरप्पा ऊंचाई पर पहुंचे थे. कुमारस्वामी ने बीजेपी की मदद से सरकार बनाई. जेडीएस और बीजेपी के बीच समझौता हुआ, जिसके मुताबिक कुमारस्वामी पहले 20 माह तक मुख्यमंत्री रहेंगे, जिसके बाद 20 महीनों के बाकी कार्यकाल में इस पद पर येडियुरप्पा काबिज होंगे.

कुमारस्वामी की सरकार में येडियुरप्पा को उप मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री मनोनीत किया गया. बहरहाल अक्टूबर, 2007 में जब येडियुरप्पा के मुख्यमंत्री बनने की बारी आई तो कुमारस्वामी ने अपने पद से इस्तीफा देने से इनकार कर दिया. इसके बाद येडियुरप्पा व उनकी पार्टी के सभी मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया तथा पांच अक्टूबर को राज्यपाल से मिलकर सरकार से भाजपा का औपचारिक समर्थन वापस ले लिया. कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लग गया.



राष्ट्रपति शासन की अवधि के दौरान जेडीएस और भाजपा ने अपने मतभेद दूर करने का फैसला किया और येडियुरप्पा मुख्यमंत्री बने. उन्होंने 12 नवंबर 2007 में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. जेडीएस ने मंत्रालयों के प्रभार को लेकर उनकी सरकार को समर्थन देने से इनकार कर दिया, जिसके बाद 19 नवंबर, 2007 को उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया. घोटाले के आरोपों के बाद पार्टी से निकाल दिए गए 75 साल के येडियुरप्पा ने 2011 में अपना अलग संगठन बनाया था लेकिन 2013 में इसका प्रदर्शन काफी खराब रहा था लेकिन वह बीजेपी के वोटबैंक का एक हिस्सा काटने में सफल रहे थे. इस वजह से बीजेपी को कर्नाटक में पराजय का मुंह देखना पड़ा था और 2014 में बीजेपी से उनका फिर से समझौता हो गया.

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First published: December 9, 2019, 2:19 PM IST
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