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जब नेहरू ने नोबल विजेता सीवी रमन के लिए खास पद बनवाया

News18Hindi
Updated: November 7, 2019, 3:23 PM IST
जब नेहरू ने नोबल विजेता सीवी रमन के लिए खास पद बनवाया
नेहरू के साथ देश के दिग्गज वैज्ञानिक सर सी वी रमन

रमन एक महान वैज्ञानिक होने के साथ ही भारत में वैज्ञानिक संस्‍थाओं के प्रणेता भी थे. जब भारत गुलाम ही था और जर्मनी में हिटलर के डर से यहूदी वैज्ञानिक भाग रहे थे तब रमन ने उन वैज्ञानिकों को भारत में बसाने की योजना भी पेश की थी, लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरू की खासी दिलचस्‍पी के बावजूद तब वह योजना कामयाब नहीं हो सकी.

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  • Last Updated: November 7, 2019, 3:23 PM IST
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भारत के महान वैज्ञानिक सी वी रमन का आज जन्‍मदिन है. रमन भारत के उन महान वैज्ञानिकों में थे जिन्‍हें भौतिक विज्ञान में रमन इफेक्‍ट के लिए नोबेल प्राइज से सम्‍मानित किया था. भारत आजाद होने के बाद तत्‍कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने डॉ सी वी रमन की वैज्ञानिक क्षमता को पूरा फायदा उठाने की व्‍यवस्‍था की.

नेहरू डॉ रमन और वैज्ञानिकों का कितना सम्‍मान करते थे इस उस पत्र से समझा जा सकता है जो नेहरू ने रमन की नियुक्ति के लिए लिखा था. नेहरू के जीवन पर आधारित किताब नेहरू मिथक और सत्‍य में इस पूरे प्रसंग का जिक्र किया गया है.

पुस्‍तक का अंश देखें:

नेहरू सिर्फ इस बात पर ध्यान नहीं दे रहे थे कि मुल्क साइंस के मामले में तरक्की करे. वह इस बात का ख्याल भी रख रहे थे कि बड़े वैज्ञानिकों को पूरा सम्मान मिले. शांति स्वरूप भटनागर और सी वी रमन जैसे महान वैज्ञानिकों की गरिमा के हिसाब से नेहरू ने पदों का निर्माण किया. उनके कार्यकाल को आगे बढ़ाने के बारे में नेहरू जिस अदब के साथ सरकारी नोटशील लिखा करते थे, उतना सम्मान शायद बादशाह अकबर ने अपने नवरत्नों को ही दिया होगा.

11 जनवरी 1949 को नेहरू ने अपने प्रिंसिपल प्राइवेट सेक्रेटरी को नोट लिखा:

‘‘डॉ. सी वी रमन के लिए 1948 में नेशनल प्रोफेसरशिप ऑफ फिजिक्स बनाई गई थी. इसे साफ तौर पर सिर्फ उन्हीं के लिए रचा गया था, क्योंकि डॉ. रमन विज्ञान की दुनिया की एक बड़ी हस्ती हैं. विज्ञान के क्षेत्र में सरकार उनकी सेवाओं का अधिक से अधिक इस्तेमाल करने के लिए उत्साहित थी और चाहती थी कि वह अपनी मर्जी के मुताबिक रिसर्च का काम कर सकें. उनकी जैसी विशिष्ट प्रतिष्ठा वाले वैज्ञानिक को उनके काम के अनुपात में ऐसा सम्मान मिलना ही चाहिए. यह पद दो साल के लिए ढाई हजार रुपए प्रतिमाह के वेतन पर बनाया गया था और इसे इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस के साथ जोड़ा गया था.’’

तब विज्ञान के क्षेत्र में सीमित अवसर थे लेकिन रमन ने उसी का रास्ता चुना

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महान वैज्ञानिकों के लिए पद सृजन की स्वस्थ परंपरा की स्थापना करते हुए नेहरू कहते हैं, ‘‘टेक्निकल दिक्कतों को देखते हुए इस तरह की नियुक्तियां परमानेंट आधार पर नहीं की जातीं. लेकिन इनके लिए तय किया गया समय, खास महत्व नहीं रखता. सबसे अच्छा तो यही होता कि इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जाती, बल्कि यह कहा जाता कि कोई भी पक्ष 6 महीने का नोटिस देकर काम से अलग हो सकता है. मैं वित्त मंत्रालय की एप्रोच पसंद नहीं करूंगा, क्योंकि इस समय बहुत सारी दिक्कतें हैं. लेकिन प्रोफेसर रमन को सूचित कर दिया जाए कि सरकार अनंत समय तक उनकी सेवाएं लेना चाहती है. उनकी नियुक्ति निजी तौर पर की जा सकती है और उसे इंडियन एकेडमी ऑफ साइंस से अटैच करने की जरूरत नहीं है.’’

इसी पत्र में नेहरू ने प्रोफेसर रमन द्वारा रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट के लिए एक लाख रुपये सालाना ग्रांट देने की मांग का जिक्र किया. नेहरू ने कहा कि इस मांग को वित्त मंत्रालय भेजना संभव नहीं है क्योंकि वित्त मंत्रालय पहले ही हर तरह की ग्रांट रोक चुका है. इनमें से कई ग्रांट बहुत महत्वपूर्ण योजनाओं की थीं लेकिन देश की वित्तीय स्थिति ठीक न होने के कारण मंत्रालय के पास कोई चारा नहीं था.

लेकिन इससे, हमारे लिए रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट का महत्व कम नहीं हो जाएगा. डिपार्टमेंट ऑफ साइंटिफिक रिसर्च रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट को लेकर उत्साहित है और उससे जितना संभव बन पड़ेगा, वह उतना फंड इस संस्थान को देगा.’’ सी वी रमन ने 1948 में बेंगलुरु में रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना की थी.

विज्ञान को लेकर नेहरू और सी वी रमन की जुगलबंदी बहुत पुरानी थी. जब 1938 में सुभाष चंद्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष थे, तब भी नेहरू और रमन ने योजना बनाई थी कि जर्मनी में हिटलर के अत्याचार के कारण वहां से पलायन कर रहे यहूदी वैज्ञानिकों को किसी तरह भारत लाया जा सके. उस जमाने में जर्मनी के यहूदी समुदाय में सबसे बड़े वैज्ञानिक हुआ करते थे और अल्बर्ट आइंस्टाइन भी उनमें से एक थे. लेकिन सुभाष चंद्र बोस को यह योजना पसंद नहीं आई और इस पर काम नहीं हो सका.

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First published: November 7, 2019, 3:09 PM IST
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