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Explained: क्या कुछ समय बाद इंसान भी सांपों की तरह जहरीले होंगे? मिला प्रमाण

इंसानों को भी सांप की तरह जहरीला बनाया जा सकता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

इंसानों को भी सांप की तरह जहरीला बनाया जा सकता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

हमारे भीतर लार ग्रंथियों (salivary glands) और सांपों की जहर-ग्रंथि (venom glands in snakes) में काफी समानता है. हो सकता है कि क्रमिक विकास (evolution) के दौरान हमारी लार ग्रंथि वैसी की वैसी रह गई हो, जबकि सांपों ने खुद को और जहरीला बना लिया.

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    ताजा स्टडी में इंसानों में जहर को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ है. अमेरिकी विज्ञान पत्रिका प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी (PNAS) में बताया गया कि सांप के भीतर मौजूद जहर-ग्रंथि और हमारे भीतर लार बनाने वाली ग्रंथियों में काफी समानता है. ये कुछ ऐसी है कि कोशिश करने पर इंसानों को भी सांप की तरह जहरीला बनाया जा सकता है. केवल इंसान ही नहीं, बल्कि चूहों की सलाइवरी ग्लैंड जहरीली हो सकती हैं.

    क्या होता है जहर और क्या करता है 
    स्टडी में शामिल एक विशेषज्ञ अग्नीश बरुआ के मुताबिक जहर और कुछ नहीं, बल्कि प्रोटीन का एक मिश्रण होता है, जिसका इस्तेमाल जानवर अपने शिकार को पकड़ने, मारने या खुद को बचाने के लिए करते हैं. सांपों के गले में जहर ग्रंथि को समझने की कोशिश लंबे समय से की जा रही थी. इसी दौरान नई स्टडी में तरीका थोड़ा बदला गया. पहले विशेषज्ञ उन जीन्स पर ध्यान दे रहे थे, जो जहर बनाती हों. लेकिन इस बार टीम ने उन ग्लैंड्स पर फोकस किया जो जहर बनाने वाली जीन्स की मदद करती थीं.

    venom gland snake
    सांप के भीतर मौजूद जहर-ग्रंथि और हमारे भीतर लार बनाने वाली ग्रंथियों में काफी समानता है- सांकेतिक फोटो


    हजारों जीन्स की पहचान हुई जो जहर में मदद करते हैं
    ये स्टडी ओकिनावा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के साथ-साथ ऑस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी ने की. इसके तहत ताइवानी वाइपर के वेनम ग्लैंड को लिया गया. इसके बाद ऐसी 3000 जीन्स की पहचान की गई, जो इस ग्लैंड के साथ सहयोग करती थीं. बता दें कि यहां सहयोग के मायने जहर बनाने में मदद करना ही नहीं, बल्कि जहर के असर से बाकी शरीर को सुरक्षित रखना भी है. ये जीन्स कोशिकाओं को जहर के निर्माण के दौरान आने वाले तनाव से बचाती हैं.

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    लार ग्रंथि और जहर ग्रंथि लगभग एक समान काम करती हैं 
    सांपों की स्टडी के बाद शोधकर्ताओं ने चूहों, कुत्ते, चिंपाजी और इंसानी शरीर की भी स्टडी की. इस दौरान चौंकाने वाली बातें निकलकर आईं. देखा गया कि इन सबके ही शरीर में इस तरह की जीन्स होती हैं जो जहर बनाने में मदद कर सकती हैं. इसे और बेहतर ढंग से समझने के लिए विशेषज्ञों ने स्तनधारियों में लार ग्रंथि का अध्ययन किया. इस दौरान पता चला कि हमारी ग्लैंड भी सांपों के गले में उपस्थिति जहर ग्रंथि जैसी ही है.

    venom gland snake
    हो सकता है कि प्राचीन समय में दोनों के पास ही एक तरह की ग्रंथियां रही हों- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    शायद क्रमिक विकास के कारण हुआ हो बदलाव 
    इस समानता पर विशेषज्ञ ये भी सोच रहे हैं कि शायद प्राचीन समय में दोनों के पास ही एक तरह की ग्रंथियां रही हों, लेकिन समय के साथ इंसानी ग्रंथि लार बनाने वाले अंग में बदल गई हो. बता दें कि अनुपयोगी होने के कारण हमारे शरीर से कई अंग गायब हो चुके हैं, जैसे पूंछ, लंबे कान और नुकीले दांत. द इंडिपेंडेंट में एक शोधकर्ता अग्नीश बरुआ के हवाले से ये बातें बताई गईं. वैसे पहले से ही वैज्ञानिक मान रहे थे कि ऐसा कुछ रहा होगा लेकिन पहली बार इस बात का प्रमाण मिला है. हमारे पास लार ग्रंथियां रह गईं, जबकि रेप्टाइल जैसे सांप ने लगातार इसका इस्तेमाल किया और जहर वाली ग्रंथि बनी रही.

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    जहर-बुझी लड़कियों का लोककथाओं में जिक्र 
    यानी ऐसा भी हो सकता है कि अगर पारिस्थितिकी में कोई बड़ा बदलाव हो तो हमारी लार ग्रंथियां जहर बनाने लगें, हालांकि ऐसा होने की संभावना कम ही है. दूसरी ओर मध्यकाल में विषकन्याओं का जिक्र मिलता है, जिन्हें जहर देकर जहरीला बना दिया जाता था. उनका इस्तेमाल दूसरे राजाओं या सेनापति को मारने या फिर जरूरी जानकारियां निकलवाने के लिए किया जाता. हालांकि ऐसा कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं है जो पुराने समय में विषकन्याओं के होने की पुष्टि कर सके लेकिन तब भी दुनिया भर के साहित्य और लोकगाथाओं में उल्लेख इसके होने पर मुहर लगाता है.

    venom gland snake
    जहरीला बनाने की प्रक्रिया को मिथ्रिडटिज्म नाम से जाना जाता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    कैसे बनाते हैं जहरीला 
    जहरीला बनाने की इस प्रक्रिया को मिथ्रिडटिज्म नाम से जाना जाता है. इसके तहत शरीर में धीरे-धीरे जहर डालकर उसे जहर के लिए इम्यून बनाया जाता है. ये हर तरह के जहर के साथ नहीं किया जाता था. इसके लिए केवल उसी तरह का जहर लिया जाता था जो बायोलॉजिकली ज्यादा जटिल संरचना के हों क्योंकि शरीर का इम्यून सिस्टम उसी पर प्रतिक्रिया देता है. एक बार थोड़ा जहर देने के बाद दोबारा उसी तरह का जहर देने पर लिवर की कंडीशनिंग हो जाती है और वो ज्यादा एंजाइम बनाता है, जिससे जहर पच जाए.

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    सेब का जहर पच जाता है 
    इसे सायनाइड के उदाहरण से समझा जा सकता है. सेब या कई दूसरे फलों के बीज में सायनाइड होता है, जो अक्सर हम खा भी लेते हैं. चूंकि ये थोड़ी मात्रा में शरीर के भीतर जाता है, लिहाजा आदी हो चुका हमारा लिवर उसे पचा जाता है. हालांकि ज्यादा मात्रा के साथ ये नहीं कहा जा सकता. इससे फूड पॉइजनिंग हो सकती है.

    विषपुरुष भी रहे हैं 
    ऐसे उदाहरण आधुनिक समय में भी मिल चुके हैं. जैसे बिल हास्ट एक ऐसे ही विषपुरुष हैं जो मियामी में सांपों के लैब के डायरेक्टर हुआ करते थे. वह मेडिकल और रिसर्च के लिए सांपों के जहर निकाला करते थे. उन्हें सैकड़ों बार दुनिया के सबसे जहरीले सांपों ने काटा था. धीरे-धीरे वह हर तरह के जहर के लिए इम्यून हो गए. गिनीज बुक में भी उनका नाम है.

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