कोरोना वायरस: क्या इंसानी शरीर पर वैक्सीन का ट्रायल जानलेवा हो सकता है?

कोरोना वायरस: क्या इंसानी शरीर पर वैक्सीन का ट्रायल जानलेवा हो सकता है?
वैक्सीन में उन लोगों का भी योगदान है, जो ट्रायल का हिस्सा हैं (Photo- pikist)

दुनियाभर में कोरोना वैक्सीन को लेकर ह्यूमन ट्रायल (coronavirus vaccine human clinical trial) चल रहे हैं. यानी हजारों लोग खुद पर वैक्सीन का परीक्षण करवा रहे हैं. ये कितना खतरनाक (clinical trial risks) होता है? क्या परीक्षण में जान का भी खतरा रहता है?

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कोरोना वायरस (Coronavirus) के कहर के बीच इसका टीका बनाने की होड़ लगी हुई है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक अब तक दुनिया में 131 वैक्सीन प्री-क्लिनिकल स्टेज में हैं, जबकि 17 वैक्सीन ह्यूमन क्लिनिकल ट्रायल तक पहुंच गई हैं. अनुमान लगाया जा रहा है कि साल के आखिर तक हमारे पास कोविड-19 (COVID-19) वायरस से निपटने के लिए एक कारगर वैक्सीन होगी. टीका जल्द से जल्द बने, इसके लिए वैज्ञानिक ही काम नहीं कर रहे, बल्कि इसमें उन लोगों का भी योगदान है, जो ट्रायल का हिस्सा हैं. ये अपने शरीर पर कई तरह के ड्रग्स का टेस्ट करवाने को राजी हुए हैं.

ह्यूमन ट्रायल में कई खतरे भी होते हैं और इसका हिस्सा बनने की काफी लंबी प्रक्रिया भी होती है. सबसे पहले तो जानते हैं इसके खतरों को. ट्रायल में अगर किसी डोज से किसी को नुकसान हो तो इसे serious adverse event (SAE) कहते हैं. ये इतना गंभीर होता है कि इसमें ट्रायल में शामिल व्यक्ति की जान भी जा सकती है. या फिर प्रतिभागी गंभीर रूप से बीमार हो सकता है. अगर ट्रायल में हिस्सा लेने वाली महिला है तो ये भी हो सकता है कि गर्भवती होने पर उसके शिशु में बर्थ डिफेक्ट आ जाए. डोज के ज्यादा मात्रा में दिए जाने या थोड़ी भी गड़बड़ी से पैरलिसिस या फिर किसी अंग विशेष में खराब आ सकती है. यानी नतीजे जांचने में जरा भी लापरवाही हो तो लोगों की सेहत पर उल्टा असर हो सकता है.

ह्यूमन ट्रायल में कई खतरे भी होते हैं और इसका हिस्सा बनने की काफी लंबी प्रक्रिया भी होती है (Photo-pixabay)




पोलियो की वैक्सीन का ट्रायल serious adverse event (SAE) का एक उदाहरण है. साल 1951 में पिट्सबर्ग के वैज्ञानिक Jonas Salk को पोलियो का टीका बनाने के लिए फंडिंग मिली. कुछ ही महीनों में उन्होंने दावा कर दिया कि टीका बन गया है. कई सारी दवा कंपनियों को वैक्सीन का लाइसेंस मिल गया. Cutter Laboratories भी इनमें से एक थी. 165,000 वैक्सीन डोज “POLIO VACCINE: RUSH” लिखकर देश के अलग-अलग हिस्सों में भेज दिए गए. कुछ ही हफ्तों में नकारात्मक रिपोर्ट्स आने लगीं. ये अप्रैल 1955 की बात है. इसकी वजह से 70 हजार से ज्यादा लोग हमेशा के लिए दिव्यांग हो गए. कई मौतें हुई. वैक्सीन पर रोक लगा दी गई और दोबारा सारे ट्रायल हुए, इसके बाद वैक्सीन मार्केट में आई.
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इसी तरह से साल 2016 में डेंगू के लिए एक वैक्सीन Dengavxia तैयार करने की कोशिश की गई. लेकिन इसके कारण डेंगू प्रभावित लोगों की हालत और खराब हो गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने की नौबत आ गई.

तमाम खतरों के बाद भी ये जरूरी है कि किसी वैक्सीन को इंसानों पर टेस्ट किया जाए. लेकिन ट्रायल में शामिल लोगों को खतरा न या कम से कम हो, इसके लिए वैज्ञानिक कई शर्तें पूरी करते हैं. जैसे पहले प्री-क्लिनिकल रिसर्च होती है. ये जांच लैब में ह्यूमन सेल कल्चर पर या फिर चूहे या बंदर जैसे जानवरों पर होती है. इस दौरान समझ आ जाता है कि नया तरीका या दवा या टीका प्रभावी है या नहीं. कई बार ये तरीका इंसानी सेहत के लिए घातक भी हो सकता है तो क्लिनिकल रिसर्च के दौरान ही ये सामने आ जाता है.

तमाम खतरों के बाद भी ये जरूरी है कि किसी वैक्सीन को इंसानों पर टेस्ट किया जाए (Photo-pixabay)


इसके बाद भी एकदम से बड़ा समूह लेकर ट्रायल नहीं होता, बल्कि पहले छोटे समूह पर जांच होती है. पहला चरण फेज जीरो कहलाता है. इसमें बहुत छोटे समूह को लिया जाता है, जैसे 11 से 15 व्यक्ति. ट्रायल में शामिल लोगों पर दवा या वैक्सीन का डोज काफी कम मात्रा में दिया जाता है, सिर्फ ये जांचने के लिए कि कहीं इसका कोई खतरनाक असर तो नहीं हो रहा. अगर असर ठीक न दिखे तो ट्रायल बंद करके वैज्ञानिक दोबारा रिसर्च करते हैं.

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दूसरे चरण यानी फेज 1 के दौरान लगभग 20 से 80 लोगों पर जांचकर्ता कई महीनों तक दवा के प्रभाव को देखते हैं. इस स्टेप का मकसद इस बात की जांच करना है कि दवा या वैक्सीन की ज्यादा खुराक या कितनी ज्यादा खुराक ली जाए, जिसका शरीर पर कोई साइड इफेक्ट न हो. यही वो फेज है, जिसमें ये तय होता है कि दवा को कैसे दिया जाए, जिससे वो ज्यादा असर करे यानी सीरप के रूप में, कैप्सूल की तरह या फिर नसों के जरिए. इसके बाद आता है तीसरा चरण यानी फेज 2 ट्रायल, जिसकी सफलता के बाद ही दवा आगे प्रोसेस होती है. आमतौर पर इसके बाद दवा सुरक्षित मान ली जाती है. हालांकि इसके बाद भी एक स्टेप होता है. इसमें पक्का किया जाता है कि दवा सेफ है और उसका असर मौजूदा दवा से ज्यादा नहीं होगा तो कम भी नहीं होगा.

सहमति पत्र साइन किया जाता है और फिर ट्रायल की शुरुआत होती है (Photo-pixabay)


Food and Drug Administration (FDA) के मुताबिक मुश्किल से 25 से 30% दवाएं ही इस चरण तक पहंच पाती हैं. चौथे और आखिरी चरण (phase IV) की शुरुआत तब होती है, जब FDA दवा या टीके को अप्रूव कर चुका हो. ये बाजार में भी आ चुकी होती है. लेकिन इसके बाद भी लंबे समय तक चलने वाली दवा के साइड इफेक्ट को समझने के लिए ये चरण होता है.

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हर कोई ट्रायल में शामिल नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए कई शर्तें होती हैं. हेल्थ की जांच भी होती है. वैज्ञानिक उन्हें बीमारी और उसके मौजूदा यानी वर्तमान में चल रहे इलाज के बारे में बताते हैं. साथ ही नए परीक्षण की पूरी जानकारी दी जाती है कि इसमें क्या होगा और शरीर पर कैसा असर हो सकता है. इसके बाद सहमति पत्र साइन किया जाता है और फिर ट्रायल की शुरुआत होती है. इसमें लगातार आपकी निगरानी होती है.
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