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क्या कानून के पास प्रदूषण रोकने के उपाय हैं

सोमवार को प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त तेवर अपनाए

सोमवार को प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त तेवर अपनाए

प्रदूषण (pollution) को लेकर सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सोमवार को सख्त तेवर अपनाए. सवाल है कि कानून के पास ऐसे क्या उपाय हैं, जिनसे प्रदूषण पर लगाम लगाई जा सकती हो..

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    दिल्ली (Delhi) में प्रदूषण (Pollution) ने पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. रविवार को कई जगहों पर प्रदूषण खतरनाक (severe) के स्तर पर रहा. लोगों को सांस लेने में तकलीफ होने लगी. पूरे दिन स्मॉग की गहरी परत बिछी रही. सोमवार को आनन-फानन में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में इस मामले की आपात सुनवाई हुई. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार को झाड़ लगाते हुए कहा कि 'प्रदूषण की वजह से लोगों की जिंदगी के साल कम हो रहे हैं. ये किसी सभ्य समाज में नहीं हो सकता. क्या हमलोग इस वातावरण में जिंदा रह पाएंगे? कोई अपने घर तक में सेफ नहीं है. इस तरह से हम बच नहीं सकते हैं.'

    सोमवार को सुप्रीम कोर्ट प्रदूषण को लेकर काफी सख्त तेवर अपनाए था. सुप्रीम कोर्ट की चिंता और गुस्सा दोनों जायज थे. लेकिन सवाल है कि प्रदूषण को लेकर कानून के पास क्या उपाय हैं? क्या कानून के जरिए प्रदूषण पर लगाम लगाई जा सकती है? इस बारे में भारतीय कानून क्या कहता है?

    प्रदूषण को लेकर क्या हैं कानून

    प्रदूषण को लेकर प्रमुख तौर पर तीन कानून हैं- द एयर (प्रीवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन) एक्ट 1981, द वाटर ( प्रीवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन ) एक्ट 1974 और द एनवॉयरमेंट (प्रोटेक्शन) एक्ट 1986. इन एक्ट से संबंधित करीब 15 नियम कानून हैं. इसमें प्रीवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्यूशन एक्ट 1981 सबसे अहम है.

    इसी एक्ट के अधीन केंद्र और राज्य के पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड काम करते हैं, जिनके जरिए प्रदूषण की जांच की जाती है और नियमों के उल्लंघन पर नजर रखी जाती है. इस एक्ट के जरिए उद्योगों से होने वाले वायु प्रदूषण पर लगाम लगाई जाती है और उल्लंघन होने की स्थिति में जुर्माना लगाया जाता है. उल्लंघन होने की स्थिति में पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड कोर्ट भी जा सकता है.

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    प्रदूषण को रोकने के लिए कानूनन कई एक्ट हैं


    प्रदूषण को लेकर कंट्रोल बोर्ड के पास क्या हैं अधिकार

    पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के पास ये अधिकार है कि प्रदूषण के नियमों का उल्लंघन होने पर वो जुर्माना लगा सकता है. लेकिन जुर्माने की रकम कोर्ट ही वसूल करती है. किसी इंडस्ट्रियल यूनिट से ज्यादा प्रदूषण होने की स्थिति में बोर्ड उसे बंद करने की सिफारिश भी कर सकता है. लेकिन ये सबसे कठोरतम कदम होता है और ये शायद ही उठाए जाते हैं.

    प्रदूषण को लेकर कोर्ट में चल रहे मामले भी लंबे वक्त तक चलते ही रहते हैं. 2017 में प्रदूषण से संबंधित 82 फीसदी मामले साल के खत्म होने तक चलते ही रहे. प्रदूषण के मामलों में दोषी ठहराए जाने का दर भी बहुत कम है. पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड के पास इतने योग्य लोग नहीं होते कि वो पॉल्यूशन के मामलों की सही जांच करके कोर्ट के सामने उसे दोषी ठहरा सकते हों.

    2014 में प्रदूषण फैलाने के 48 मामले दर्ज किए गए, उसमें से सिर्फ 3 मामलों में दोष साबित किया जा सका. इसी तरह 2015 में 50 मामले दर्ज हुए, जिसमें सिर्फ 3 पर दोष साबित हुआ. 2016 में 25 मामले दर्ज हुए लेकिन किसी में दोष साबित नहीं किया जा सका. इसी तरह 2017 में 36 मामलों में सिर्फ 2 में दोष साबित हुआ.

    एक्ट के प्रावधान भी काफी पुराने पड़ गए हैं. 1987 और 2010 में कुछ संशोधन हुआ था. लेकिन ज्यादातर प्रावधान पुराने ही हैं.

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    प्रदूषण कम करने के लिए दिल्ली सरकार ने ऑड-ईवन फॉर्मूला लागू किया है


    प्रदूषण को लेकर केंद्र सरकार की योजना

    इस साल जनवरी में केंद्र सरकार ने नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम की शुरुआत की है. इसमें 5 साल में वायु प्रदूषण को कम करने का लक्ष्य रखा गया है. इसमें पूरे देश में एयर क्वालिटी की जांच होगी और लोगों को इस बारे में जागरूक किया जाएगा. प्रोग्राम के तहत खासतौर से 102 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों पर नजर रखी जाएगी. इस कार्यक्रम में अगले 5 वर्षों में पीएम 2.5 को करीब 20 से 30 फीसदी कम करने का लक्ष्य रखा गया है.

    लेकिन इस कार्यक्रम को किसी कानून का समर्थन प्राप्त नहीं है. जमीनी स्तर पर बिना किसी कानूनी प्रावधान के प्रदूषण कम करने के उपायों पर कैसे अमल लाया जा सकता है. प्रोग्राम में शहरों के प्रदूषण पर ज्यादा फोकस किया गया है, जबकि ग्रामीण इलाकों में पराली जलाने की समस्या की ओर भी ध्यान दिया जाएगा. शहर और क्षेत्र के हिसाब से प्रदूषण का स्तर अलग-अलग होता है. इसलिए प्रदूषण की समस्या से निपटने में स्थानीय कारकों की तरफ ध्यान देना होगा.

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