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लोकसभा चुनाव 2019: ज़ीरो से इस बार बीएसपी को कहां तक ले जा पाएंगी मायावती

लोकसभा चुनाव 2019: ज़ीरो से इस बार बीएसपी को कहां तक ले जा पाएंगी मायावती

मायावती की फाइल फोटो

मायावती की फाइल फोटो

2014 के चुनावों में बीएसपी को देशभर में एक सीट भी नहीं मिली. फिर उत्तर प्रदेश के 2017 के विधानसभा चुनावों में मायावती की पार्टी केवल 19 सीटों पर सिमट गई. जानें असल में बीएसपी कितने पानी में है.

    फ़जील खान
    वर्ष 2014 के चुनाव मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के लिए बहुत अच्छे नहीं रहे थे. लोकसभा चुनावों में वो एक भी सीट हासिल नहीं कर सकी. 2009 के चुनावों में उसने रिकॉर्ड 21 सीटें जीतीं थीं, वहां से वो धड़ाम से नीचे आ गई. ये तब हुआ जबकि पार्टी के पास देश में तीसरा बड़ा वोट शेयर (4.2 फीसदी) है.

    केवल यही नहीं बीएसपी के बारे में जो भी आमतौर पर माना जाता रहा है, उसके प्रतिकूल वो उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भी 2007 में जीती गईं 206 सीटों से 2017 के चुनावों में महज 19 सीटों पर सिमट गई यानी 90 फीसदी की गिरावट.

    वर्ष 2014 में बीजेपी ने लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में 80 में 71 सीटें जीतकर तकरीबन सभी पार्टियों का सफाया कर दिया, भगवा पार्टी ने विधानसभा चुनावों में 312 सीटें हासिल कीं.

    2014 की लोकनीति-सीएसडीएस के अध्ययन में ये मालूम करने की कोशिश की गई कि राज्य में बीजेपी को ये उभार क्यों मिला. अध्ययन में पाया गया कि बीजेपी को सभी वर्गों से पर्याप्त वोट मिले- 70 फीसदी से ज्यादा ब्राह्मणों और अन्य सवर्ण जातियों से, 60 फीसीद ओबीसी, 53 फीसदी कुर्मी और 45 प्रतिशत अन्य दलितों से. इससे ये भी पता लगा कि बीजेपी ने किस तरह दूसरी पार्टियों के वोट काटे.

    2018 में जेएनयू के दो प्रोफेसरों सुधा पई और अविनाश कुमार ने एक अध्ययन के भगवा लहर को जानने की कोशिश की, बकौल इसके बीजेपी ने सपा और बसपा के आधार रहे पिछड़ों और दलितों में जमकर सेंध लगाई और हिंदुओं का एक बड़ा वोट बैंक तैयार किया, इसमें ऊंची, नीची और दलित सभी तरह की जातियां शामिल थीं.

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    2017 में तकरीबन यही हुआ कि बीजेपी ने सभी हिंदू वोटों को एक साथ बांध लिया और दूसरी पार्टियों को इसका नुकसान हुआ. साथ ही इसने बड़े पैमाने पर विधानसभा सीटों पर अपना फैलाव किया, बेशक कई जगह वो इसे सीटों में नहीं बदल पाई. लेकिन क्या बीएसपी वोट बैंक को ठेस पहुंचाना ही भगवा लहर की असली वजह थी.

    लोकसभा में सफाया
    बीएसपी ने पहली बार 1989 में लोकसभा चुनाव लड़ा था. तब उसने 245 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए. उसमें उसे तीन में जीत हासिल हुई. उसने 2.1 फीसदी वोट शेयर प्राप्त किए. इसी चुनावों के जरिए पहली बार 33 वर्षीय मायावती ने बिजनौर से जीत पाकर लोकसभा में कदम रखा.

    इसके बाद आगे के सालों में पार्टी का प्रसार बढ़ता गया. 2009 में पार्टी ने 500 सीटों पर उम्मीदवार खड़े गिए, उसे 6.2 फीसदी वोट मिले, ये उसका सबसे शानदार प्रदर्शन था. 2014 में पार्टी ने 503 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन उसे कहीं भी जीत नहीं मिली.

    बीएसपी की इस जबरदस्त गिरावट की वजह ये थी कि अनुसूचित जाति के साथ बड़े पैमाने पर दलित वोट हिंदू वोटों के साथ बीजेपी की ओर चले गए.


    सीएसडीएस के 2014 के चुनाव पूर्व सर्वे में पाया गया कि बीएसपी औसत तौर पर 20 फीसदी जाटव (परंपरागत बीएसपी वोटर) के वोट मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश में गंवा रही है. मप्र में जाटव वोटों में 13 से 26 फीसदी, राजस्थान में छह से 11 फीसदी, हरियाणा में 16 से 40 फीसदी, दिल्ली में 16 से 40 फीसदी और यूपी में 69 से 85 फीसदी तक की गिरावट हुई.
    वहीं दूसरी ओर बीजेपी को 2014 में 18 फीसदी का इजाफा इन सारे राज्यों में हुआ और वो भी इस जाति ग्रुप में.

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    ये इतना बड़ा झटका था कि पार्टी अपना राष्ट्रीय दर्जा खोने के करीब पहुंच गई थी. बस बीएसपी को 1968 में हुए चुनाव चिन्ह संबंधी आदेश में संशोधन से राहत मिल गई कि किसी भी पार्टी का प्रदर्शन एक नहीं बल्कि लगातार दो चुनावों के जरिए आंका जाएगा. इससे इसका राष्ट्रीय दर्जा बचा रह गया.

    विधानसभा में भी गिरावट
    लोकसभा ही नहीं पार्टी के प्रदर्शन में विधानसभा में जबरदस्त गिरावट रही. 2007 की जबरदस्त जीत की तुलना में पार्टी ने केवल 22.4 फीसदी वोट मिले. जबकि 2007 में ये स्थिति 30.4 फीसदी और 2012 में 25.9 फीसदी की थी.
    1990 की शुरुआत में बीएसपी के संस्थापक कांशीराम ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिए राज्य में जातियों का एक गठबंधन तैयार किया था, जिसमें कुर्मी (बुंदेलखंड और मिर्जापुर) और मुस्लिम बैकवर्ड को नूनिया चौहान, राजभर और अन्य समुदायों के साथ लाया गया था.


    मायावती ने बाद में इस गठजोड़ को और जातियों तक फैलाया. इसमें उन्होंने सवर्ण जातियों और मुस्लिमों को साथ लिया, इससे उन्हें 2007 में बहुमत के लायक जरूरी सीटें हासिल हो गईं. लेकिन 2017 में मायावती इस फार्मूले को दोहरा नहीं पाईं.

    घर के अलावा बाहर कैसी हालत
    बीएसपी ने अगर यूपी में पिछले कुछ चुनावों में बेहतर प्रदर्शन नहीं किया जब कि ये पार्टी के जनाधार वाला अकेला राज्य भी है. मप्र में 2009 में पार्टी ने रीवा से लोकसभा सीट पर जीत शामिल है. पार्टी ने आखिरी बार यूपी से बाहर हरियाणा के अंबाला में 1998 में पार्लियामेंट सीट जीती थी. जबकि 1999 में उसने महज 225 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इसके बाद 2004 में 435, 2009 में 500 और 2014 के चुनावों में 503 सीटों पर.

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    तथ्य ये है कि पार्टी ने पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में अपनी मौजूदगी शुरुआती बरसों में इसके संस्थापक कांशीराम के कारण बनाई थी, जो खुद पंजाब से ताल्लुक रखते थे. 1989 से 1991 के बीच पार्टी ने जिन तीन सीटों पर जीत पाई थी, उसमें पंजाब से दोनों बार उसने एक सीट जीती थी. 1996 में पंजाब ने बीएसपी द्वारा लोकसभा में जीती गई कुल 11 सीटों में तीन का योगदान दिया था. जबकि दो सीटें मप्र से जीतीं थीं और बाकी सीटें यूपी से. हालांकि तब से पार्टी का राष्ट्रीय स्तर सिकुडऩा जारी है.
    सोशल हिस्ट्री और कल्चर एंथ्रोपोलॉजी के प्रोफेसर बद्री नारायण तिवारी मानते हैं कि अलग राज्यों में दलित डेमोग्राफिक्स इस बदलाव की एक बड़ी वजह है.
    यूपी में बीएसपी के सिमटने पर वो कहते हैं कि अलग राज्यों में आतंरिक डायनामिक्स अलग है. यूपी में चमार और जाटव बीएसपी के कोर वोटर रहे हैं, जो दलितों की कुल आबादी के आधे से ज्यादा रहे हैं इन दोनों वर्गों में दलित वर्ग बड़ी तादाद में हैं जबकि दूसरी छोटे ग्रुप बहुत कम.
    तिवारी आगे कहते हैं, जबकि अन्य राज्यों जैसे पंजाब और हरियाणा में अनुसूचित जातियां एक तिहाई से आबादी का पांचवां हिस्सा हैं. इस राज्यों में दलितों का वर्ग बीएसपी को वोट नहीं देता, इसमें चमार शामिल हैं.
    वो कहते हैं कि उदाहरण के तौर पर पंजाब में 18 फीसदी चमार और 17 फीसदी भांगी है. इसी तरह बिहार में चमार दलित आबादी में छोटे ग्रुप हैं, लिहाजा इसकी वजह चमार और जाटव की डेमोग्राफिक स्थिति भी है.
    इसके अलावा अन्य राज्यों में जाटव और चमार बहुत बड़ी तादाद में उस तरह नहीं हैं, जिस तरह यूपी में हैं. बिहार में दलितों में पासवान या पासी ज्यादा संख्या में हैं.
    तिवारी का आंकलन अपनी जगह तब सही लगता है जबकि हम पार्टी को अनुसूचित जाति के अलावा कोर वोट बेस के हासिल वोटों की तुलना करते हैं. जबकि बीएसपी वर्ष 2009 में मप्र से 26 फीसदी जाटव वोट मिले तो अन्य अनुसूचित जातियों से महज पांच फीसदी वोट. इसी तरह हरियाणा में पार्टी ने 62 प्रतिशत जाटव वोट लिये तो अऩ्य दलितों से केवल 16 फीसदी वोट ही पाए. 2009 का ये ट्रेंड 2014 में बना रहा.

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    2011 की जनगणना के अनुसार, एससी जातियां, जिसमें दलित भी मिलते हैं, वो पंजाब के कुल आबादी का 32 फीसदी हैं, हरियाणा का 20 फीसदी, राजस्थान का 18 फीसदी, हिमाचल में 25 फीसदी और मोटे तौर पर बिहार में 16 फीसदी. इन राज्यों में दलितों के इस अनुपात के बाद भी बीएसपी इन राज्यों में इन्हें अपनी ओर गंभीरता से लाने में सफल नहीं रही है, इससे जाहिर है कि बीएसपी इस सामाजिक और राजनीतिक गठजोड़ की फसल इन राज्यों में काटने में नाकाम रही है.

    खराब स्ट्राइक रेट
    यूपी और पड़ोसी राज्यों के अलावा अन्य राज्यों में इसके लगातार खराब प्रदर्शन के बाद भी बीएसपी अलग अलग विधानसभाओं और लोकसभा के चुनावों में अपने कैंडीडेट खड़ा करती है. इसका परिणाम कई बार प्रत्याशियों की जमानत जब्त होने के साथ भी होता है. कोई भी प्रत्याशी अपनी जमानत भी तब नहीं बचा पाता जबकि वो तय संसदीय क्षेत्र में छठा हिस्सा वोट हासिल नहीं कर पाता.
    यूपी के अलावा बीएसपी के प्रत्याशी 20 में 14 राज्यों में 90 फीसदी अपनी जमानत नहीं बचा पाते.



    हैरानी की बात ये है कि पार्टी सभी राज्यों में यथासंभव उपलब्ध सीटों पर चुनाव लड़ती है. दिल्ली में 2008 और 2015 में पार्टी ने 70 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए जबकि 2013 में 69 सीटों पर. छत्तीसगढ़ में बीएसपी पिछले साल 35 सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन 2008 और 2013 में पार्टी ने सभी 90 सीटों पर प्रत्याशी लड़ाए थे. इसी तरह 2014 में उसने 90 में 87 सीटों पर चुनाव लड़ा. वहीं 2009 और 2004 में 86 और 84 सीटों पर ऐसा किया.

    बीएसपी ने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, ओडिशा, गुजरात, केरल और महाराष्ट्र में पिछले तीन चुनावों में कभी एक सीट नहीं जीती. इन छह राज्यों में वर्ष 2000 के बाद से पार्टी की औसत वोट शेयरिंग दो फीसदी से भी कम रही. इसमें केवल महाराष्ट्र अपवाद था, जहां उसे करीब तीन फीसदी वोट हासिल हुए.

    सीएसडीएस के डायरेक्टर संजय कुमार इसे स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहते हैं, एक कैंडीडेट को जीत के लिए चुनाव में डाले गए वोटों के एक चौथाई वोटों की जरूरत होती है तो उसके जीत की संभावना बढ़ जाती है. संजय कुमार के अनुसार, बीएसपी ऐसा करने में सक्षम नहीं है. वो कहते हैं कि आपको किसी भी सीट को पाने के लिए 24 से 25 फीसदी वोटों की जरूरत होती है, अन्य राज्यों में बीएसपी इससे बहुत नीचे रहती है.

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    तब आखिर क्यों बीएसपी इतनी जगहों पर नाकामी के बाद भी उम्मीदवार खड़े करती है, इस सवाल पर कुमार कहते हैं, अगर उन्होंने लड़ना छोड़ दिया तो उनका वोट शेयर नीचे गिरेगा और तब वो नेशनल पार्टी के क्राइटेरिया पर खरे नहीं उतर पाएंगे.

    चुनाव आयोग के अनुसार किसी भी नेशनल पार्टी के उम्मीदवार को आम चुनाव और विधानसभा चुनावों में कुल पड़े वोटों का छह फीसदी वोट हासिल करना चाहिए. साथ ही पार्टी को कम से कम चार या अधिक राज्यों में उम्मीदवार खड़े करने होंगे और हर राज्य में छह फीसदी वोट हासिल करने होंगे-तो बीएसपी बेशक सीटें नहीं जीते लेकिन छह फीसदी वोट हर राज्य में पाने पर ही वो नेशनल पार्टी बनी रह सकती है.

    सुरक्षित सीट का मामला
    किसी पार्टी के लिए जो अनुूसूचित जाति, खासकर दलितों को रिप्रजेंट करने का दावा करती हो, इस मोर्चे पर भी बीएसपी का प्रदर्शन रिजर्व संसदीय क्षेत्रों में बहुत चमकदार नहीं रहा है. यूपी में भी नही, जहां कुल 80 सीटों में 17 सीटें एससी के लिए रिजर्व हैं, जो देश की सबसे ज्यादा सुरक्षित सीटें हैं.

    बीएसपी ने 2004 में रिजर्व में केवल पांच सीटें जीतीं, वर्ष 2009 में उसे केवल एक रिजर्व सीट पर जीत मिली. जबकि 2009 के चुनाव में बीएसपी को 21सीटें मिलीं थीं. अगर हम इन 17 रिजर्व सीटों की बात 1989 से लेकर 2014 चुनाव तक करें तो ये 136 सीटें बैठती हैं. इन वर्षों में बीएसपी को केवल 16 सीटों पर जीत मिली है.
    दूसरी ओर बीजेपी ने वर्ष 2014 में सभी रिजर्व सीटें जीती थीं.



    ओवरआल वर्ष 1989 से 2014 तक इन 17 रिजर्व सीटों को 136 बार चुनाव हुए, जिसमें 65 में बीजेपी ने जीत पाई. एसपी ने 29 बार इन पर जीत हासिल की.

    तिवारी इसे स्पष्ट करते हैं. वो मानते हैं कि चूंकि इन रिजर्व सीटों पर केवल दलित उम्मीदवार ही खड़े होते हैं लिहाजा दलित वोट आपस में बंट जाते हैं, ऐसे में जो उम्मीदवार अपर कास्ट और ओबीसी के ज्यादा वोट हासिल करता है, वो जीत जाता है.

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    तिवारी ऐसी सीटों पर वोट व्यवहार के बारे में कहते हैं, ये जो रिजर्व सीट की चाबी होती है वो दलितों के हाथ नहीं होती है, वो गैर दलितों के हाथ में होती है.

    इन रिजर्व सीटों के पिछले व्यवहार को देखते हुए इस बार 17 में 10 सीटों पर बीएसपी अपने उम्मीदवार खडे़ कर रही है तो बाकि पर समाजवादी सीट के कैंडीडेट खड़े होंगे.

    अब जबकि लोकसभा चुनाव केवल एक महीना दूर है, तो क्या बीएसपी अपना भाग्य बदल पाएगी जबकि उसने इसके लिए समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ करके चुनावी मैदान में उतर रही है. ये भी देखने वाली बात होगी कि क्या ये गठजोड़ यूपी की सियासत में गेम चेंजर साबित हो सकेगा.

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    Tags: Akhilesh yadav, Bahujan samaj party, BJP, BSP, Mayawati, Samajwadi party, SP, UP, Uttar pradesh news

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