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Delhi Police Protest : देश की पुलिस को क्यों नहीं है हड़ताल की इजाजत

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Updated: November 5, 2019, 6:46 PM IST
Delhi Police Protest : देश की पुलिस को क्यों नहीं है हड़ताल की इजाजत
दुनियाके कई बड़े देशों में पुलिस के हड़ताल पर जाने के मामले मिलते हैं

कानून-व्यवस्था (Law & Order) बनाए रखने में पुलिस (Police) का सबसे अहम हाथ है इसलिए पुलिसवालों को हड़ताल (Strike) की छूट नहीं मिलती.

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  • Last Updated: November 5, 2019, 6:46 PM IST
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नई दिल्ली. दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट (Tis Hazari Court) में वकीलों (Lawyer) और पुलिस (Police) के बीच झड़प का मामला लगातार तूल पकड़ रहा है. आम लोगों की तरह ही अब दिल्ली पुलिस भी धरना-प्रदर्शन कर रही है. पुलिस की हड़ताल का ये देश में पहला मामला देखने में आ रहा है. इससे पहले डॉक्टर-नर्सों, वकीलों, शिक्षकों और नेताओं की हड़ताल खूब होती रही हैं.

कब और कैसे शुरुआत
2 नवंबर की दोपहर तीस हजारी कोर्ट (tis hazari court) में वकीलों और पुलिस के बीच मामूली बात को लेकर भिड़ंत हो गई. इसमें 10 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हो गए और वकीलों का कहना है कि 4 वकील घायल हुए. कोर्ट में पुलिस और वकीलों के बीच हुई हिंसक झड़पों के बाद कल देश भर की निचली अदालतों के वकील हड़ताल पर रहे थे. साथ ही उन्होंने दिल्ली के कड़कड़डूमा और साकेत कोर्ट में तोड़-फोड़ भी की थी. अब वकीलों की ऐसी हिंसा के खिलाफ पुलिसवाले स्ट्राइक पर उतर आए हैं. मंगलवार सुबह से ही दिल्ली पुलिस मुख्यालय के सामने सड़क पर वर्दी में आकर वे अपने लिए न्याय मांग रहे हैं और काला कोट हाय-हाय के नारे लगा रहे हैं.

देश में अपनी तरह का पहला मामला 

वैसे दुनिया के कई बड़े देशों में पुलिस के हड़ताल पर जाने के मामले मिलते हैं. जैसे इतिहास में सबसे ज्यादा जिक्र बोस्टन पुलिस स्ट्राइक ( Boston Police Strike) का होता है. सितंबर 1919 को बोस्टन के पुलिसवाले हड़ताल पर गए ताकि उनकी तनख्वाह और काम करने के हालातों में सुधार हो सके. इस हड़ताल के दौरान पूरे बोस्टन की व्यवस्था गड़बड़ा गई, जिस पर गुस्साए लोगों ने पुलिस की हड़ताल को लेनिन का एजेंट करार दिया. हड़ताल के दौरान 10 से ज्यादा जानें भी गईं. आखिरकार किसी तरह पुलिसवाले हड़ताल खत्म करने को राजी हुए और 5 दिनों बाद 13 सितंबर को स्ट्राइक खत्म हुई.

सबसे ज्यादा जिक्र बोस्टन पुलिस स्ट्राइक ( Boston Police Strike) का होता है


ब्रिटेन में भी हुई हड़ताल
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British police strike भी काफी जानी जाती है. ये साल 1918 और 1919 में लगातार चली, जिसके बाद ही UK की पुलिस को आकार मिला और उनकी तनख्वाह और पदोन्नति के नियम भी व्यवस्थित हुए. हालांकि इसके बाद भी पुलिस की मांग थी कि उन्हें ट्रेड यूनियन का हिस्सा बनाया जाए, इसे अस्वीकार कर दिया गया. बल्कि पुलिस को Police federation of England and Wales के तहत रखा गया. इस फेडरेशन ने स्ट्राइक के अधिकार के लिए संसद में कानून पास कराने की भी कोशिश 2013 में की लेकिन बहुत कम लोगों ने हस्ताक्षर किए, जिससे कानून नहीं बन सका.

इसलिए नहीं है स्ट्राइक की छूट
चूंकि अधिकतर जगहों पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में पुलिस का सबसे अहम हाथ है इसलिए पुलिसवालों को हड़ताल की छूट नहीं मिलती. ऐसे में उन्होंने अपना विरोध जताने का नया तरीका खोज निकाला. उनके हड़ताल पर जाने को एक खास नाम मिला है- Blue flu. फ्लू यानी सर्दी-बुखार की तर्ज पर पुलिसवाले बीमार होने की छुट्टी ले सकते हैं. इस दौरान अधिकतर पुलिसवाले एक के बाद एक बीमारी की छुट्टी पर चले जाते हैं और एक तरह से अपना विरोध जताते हैं. Blue flu अमेरिका के अधिकतर हिस्सों में पुलिस के विरोध प्रदर्शन का पसंदीदा तरीका है, जहां पुलिस और फायरफाइटर्स को हड़ताल पर जाने की इजाजत नहीं.

राज्य पुलिस बलों और कुछ केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में काफी रिक्तियां हैं


पुलिस खुद ही हैं असंतुष्ट
देश की बात करें तो बीते कुछ सालों में यहां अपराध तेजी से बढ़ा है. Crime Record Bureau की साल 2015 की रिपोर्ट कहती है कि 73 लाख से अधिक गंभीर अपराध सालभर के भीतर हुए. ये वे अपराध हैं जिनकी रिपोर्ट दर्ज की है. बहुत से मामले सामने ही नहीं आ पाते हैं. ऐसे में पुलिस बल की भारी कमी और छोटे स्टाफ पर काम के बेहद दबाव को देखते हुए कई बार कई तरह की पॉलिसी लाने की कोशिश की गई. इनमें से एक है मॉडल पुलिस एक्ट, 2006. इसके तहत सेंट्रल गर्वनमेंट ने मॉडल पुलिस कानून का मसौदा तैयार करने के लिए एक कमेटी बनाई. इससे पहले देश में साल 1861 का पुलिस एक्ट ही चला जा रहा था. कमेटी की रिपोर्ट किस हद तक लागू हो सकी, इसका कोई जिक्र नहीं मिलता है. वर्तमान में राज्य पुलिस बलों और कुछ केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में काफी रिक्तियां यानी खाली पद हैं. इन्हें भी भरने की कोशिश की जा रही है ताकि पुलिस पर दबाव कुछ कम हो सके. केरल में पुलिस के अधिकारों के लिए एक यूनियन भी है, जो समय-समय पर व्यवस्था में सुधार की मांग उठाती रहती है. लेकिन इसका भी कोई पॉलिटिकल झुकाव या ट्रेड यूनियन से जुड़ाव नहीं, बल्कि ये independent स्ट्रक्चर है.

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First published: November 5, 2019, 6:13 PM IST
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