Explained: कैसे होती है पशुओं की इंटरनेशनल तस्करी, कैसे काम करता है गिरोह?

लंबी-चौड़ी सीमा पशु और खासकर गौ-तस्करों को काफी मदद दे रही है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

लंबी-चौड़ी सीमा पशु और खासकर गौ-तस्करों को काफी मदद दे रही है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

भारत से बांग्लादेश की 2,216 किलोमीटर लंबी-चौड़ी सीमा पशु और खासकर गौ-तस्करों (cow smuggling) को काफी मदद दे रही है. पशुओं की ये तस्करी बांग्लादेश (Bangladesh) का राजस्व भी बढ़ा रही है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 9, 2021, 12:06 PM IST
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गाय की तस्करी को लेकर सीबीआई (CBI) ने चौंकाने वाला खुलासा किया है. उनके मुताबिक लगातार देश के गायों की खेप की खेप बांग्लादेश सीमा के जरिए बाहर पहुंचाई जा रही है. यहां तक कि इस तस्करी में सीमा सुरक्षा विभाग (BSF) और कस्टम वालों की भी मिलीभगत बताई जा रही है. साथ ही कई वरिष्ठ नेता भी एजेंसी के रडार पर हैं. जानिए, कैसे काम करता है भारत से बांग्लादेश का तस्कर समूह.

गायों की तस्करी कितनी बड़ी समस्या

इस बारे में लगभग सालभर से बात हो रही है. पश्चिम बंगाल में 2,216 किलोमीटर लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा के जरिए हर साल बड़ी संख्या में मवेशियों की बांग्लादेश में तस्करी होने का अनुमान है. सीमावर्ती क्षेत्र मालदा-मुर्शिदाबाद के कच्चे रास्ते से रोजाना गायें बांग्लादेश पहुंचती हैं. सीबीआई का मानना है कि जिस संख्या में गायों की तस्करी होती है, उसे केवल पांच फीसदी ही बीएसएफ के जवान रोक पाते हैं. बाकियों को या तो जानकारी कम है या फिर मिलीभगत है. अब सीबीआई इसके पीछे काम करने वाले सिंडिकेट के बीच सांठगांठ का खुलासा करने की कोशिश में है.

india bangladesh border
लंबा-चौड़ा बॉर्डर है, जिसपर चारों ओर बाड़ नहीं घेरी जा सकती- सांकेतिक फोटो

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक सीबीआई ने संदेह के आधार पर अब तक कई नाम खोजे हैं. इनमें कई बड़े नाम भी शामिल हैं. जैसे एक नाम तो तृणमूल नेता विनय मिश्रा का है. सितंबर 2020 में सीबीआइ ने गो तस्करी के सरगना एनामुल हक के कोलकाता स्थित घर तथा ऑफिस में छापामारी अभियान के दौरान वहां से कई दस्तावेज निकाले. इन्हीं के जरिए विनय मिश्रा का पता चला. पशु तस्करी करके इस नेता ने काफी धन बनाया है, इसकी जांच भी अब एजेंसी कर रही है. हालांकि नेता खुद देश में नहीं हैं.

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कैसे होता है गायों का अवैध व्यापार?



नस्ल और ऊंचाई के आधार पर गायों की कीमत तय होती है. जैसे हरियाणा और यूपी की नस्लें ज्यादा कीमत पर बिकती हैं, जबकि बंगाल की गायों की कीमत अपेक्षाकृत कम है. ईद के दौरान इनकी मांग और कीमत ज्यादा हो जाती है. बांग्लादेश में मुस्लिम-बहुत आबादी के कारण वहां बीफ-ईटर ज्यादा है इसलिए गायों की तस्करी बंगाल की सीमा से होती है.

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जब गायों को बीएसएफ जब्त करती है तो जानकर इनकी कीमत कम लगाई जाती है. साथ ही केवल कुछ ही व्यापारियों को कम कीमत पर इन्हें खरीदने की इजाजत मिलती है. नीलामी के बाद गायों को दोबारा बढ़ी हुई कीमत पर व्यापारी बांग्लादेश में तस्करी कर देते हैं.

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नस्ल और ऊंचाई के आधार पर गायों की कीमत तय होती है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


गायों या दूसरे मवेशियों की तस्करी के लिए तस्कर आएदिन नए तरीके अपनाते हैं. जैसे लंबा-चौड़ा बॉर्डर है, जिसपर चारों ओर बाड़ नहीं घेरी जा सकती. और न ही सीमा पर उतनी पक्की चौकसी हो पाती है. इसी बात का फायदा तस्कर उठाते हैं.

वे इसके लिए पहले से रोड मैप बनाए रखते हैं. इसमें ये भी अनुमान लगाया जाता है कि कहां-कहां क्या रुकावट आ सकती है और उसे दूर कैसे करना है. इसके अलावा स्थानीय तस्कर बाड़ काटकर भी तस्करी में लिप्त रहते हैं. कई बार सीमा पार लाने- ले जाने के लिए महिलाओं या बच्चों का इस्तेमाल भी होता है क्योंकि उनपर आसानी से शक नहीं किया जाता. लीवर के इस्तेमाल से भी मवेशी सीमा पार भेजे जाते हैं, जिसे झूला तकनीक कहते हैं. ये तकनीक छोटे मवेशियों के लिए इस्तेमाल होती है.

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यहां आपको बता दें कि देश में गाय और गोमांस की तस्करी पर पूरी तरह बैन है. हालांकि पश्चिमी बंगाल से ये हो रहा है. साल 2016 में सीबीआई ने इस तस्करी का अनुमानित फायदा लगभग 15 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा माना था. इसके अलावा असम से भी तस्करी होती है. गायों को इंटरनेशनल बॉर्डर पार करवाकर बांग्लादेश के गाय तस्करों को बेच दिया जाता है.

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गायों या दूसरे मवेशियों की तस्करी के लिए तस्कर आएदिन नए तरीके अपनाते हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


आंकड़ों के लिहाज़ से भी ये मुद्दा गंभीर दिखता है. साल 2014 में तस्करी करके ले जाए जा रहे करीब एक लाख दस हज़ार पशुओं को बीएसएफ ने ज़ब्त किया था. साल 2016 तक आते - आते सीमा पर ज़ब्त पशुओं की संख्या एक लाख 69 हज़ार तक पहुंच गई. जब्ती की इस संख्या से इस बात का अंदाज़ नहीं लगाया जा सकता है कि सही मायने में कितने पशुओं की तस्करी हुई. इसकी सबसे बड़ी वजह ये भी है कि कई भौगोलिक परिस्थितियों के चलते सीमा पर पूरी तरह से बाड़ लगाया नहीं जा सका है, जिसका फायदा तस्कर उठाते हैं.

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इसके अलावा हमारे यहां कानूनी प्रक्रिया का लंबा चलना जैसी बातें भी है, जिसका सीधा असर गायों और दूसरे मवेशियों पर हो रहा है. एक बात ये भी है कि बांग्लादेश में पशु तस्करी को अपराध नहीं माना जाता, बल्कि ये वहां की सरकार के लिए राजस्व का जरिया है. जैसे भारत का तस्कर बांग्लादेश की सीमा में जाते ही पशुओं के बदले कर चुकाता है और बाकायदा व्यापारी कहलाता है. बांग्लादेश में पशुओं को खरीदकर ज्यादा कीमत पर दूसरे बीफ खाने वाले देशों को भी बेचा जाता है. ये भी वहां आय का एक जरिया है. साथ ही पशुओं से जुड़े चमड़ा उद्योग भी वहां खूब चलते हैं. तो कुल मिलाकर हमारे यहां के मवेशी पड़ोसी देश की जीडीपी में योगदान दे रहे हैं.
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