#MissionPaani: क्यों बहुत जल्द 17 राज्यों में आने वाली है ‘डे ज़ीरो’ की नौबत?

देश के कई इलाकों में पानी की किल्लत भयावह रूप ले चुकी है.

देश के कई इलाकों में पानी की किल्लत भयावह रूप ले चुकी है.

#MissionPaani : दिन दूर नहीं जब पीने के पानी की उपलब्धता सीमित कर दी जाएगी. जल शक्ति मंत्रालय ने चेतावनी जारी है कि पानी का स्तर दिनोंदिन नीचे जा रहा है और भारत के कुछ हिस्सों में यह खतरनाक स्थिति तक पहुंच चुका है.

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हाल में गठित जल शक्ति मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि ऐसे राज्यों, जहांं भूमिगत जल का स्तर ख़तरनाक स्थिति तक चला गया है, में ‘डे ज़ीरो’ की नौबत आ सकती है. ‘डे ज़ीरो’ का मतलब यह है कि सरकार पानी के नलों को बंद करने के लिए बाध्य हो जाएगी और आम जनता और औद्योगिक कार्यों के लिए जल के प्रयोग को सख़्ती से सीमित कर दिया जाएगा.

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फ़र्स्ट पोस्ट ने दावा किया कि उसे इस बारे में 19 जून 2019 को जारी एक पत्र मिला है जिसमें कहा गया है : 'पानी का स्तर हर दिन नीचे जा रहा है और देश के कुछ हिस्सों में यह बहुत ही नाज़ुक स्तर पर चला गया है. कुछ क्षेत्रों में भूमिगत जल का सर्वाधिक दोहन हुआ है और बहुत शीघ्र ये क्षेत्र ‘डे ज़ीरो’ की स्थिति में पहुंच जाएंगे'.



देश के 17 राज्यों के 1,033 सब-डिविज़न ऐसे हैं, जहां अगर भूमिगत जल दोहन तत्काल नहीं रोका गया तो पानी की आपूर्ति शीघ्र समाप्त हो जाएगी. पानी के अभाव वाले राज्य तमिलनाडु में ऐसे 358 सब-डिविज़न हैं, इसके बाद राजस्थान का स्थान है जहां पानी के गिरते स्तर वाले सब-डिविज़न की संख्या 164 है, जबकि उतर प्रदेश में ऐसे सब-डिविज़न 113 हैं.
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अन्य राज्य जहां पानी का गंभीर संकट पैदा हो सकता है उनमें पंजाब, आंध्र प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और तेलंगाना शामिल हैं. नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत की राज्य के जल मंत्रियों के साथ बैठक के एक सप्ताह बाद जल शक्ति मंत्रालय का यह पत्र जारी हुआ. इस बैठक में केंद्रीय मंत्री ने जल संकट से निपटने के लिए राज्यों द्वारा उठाए गए क़दमों की समीक्षा की. मंत्रालय ने स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा कि जल एक सीमित संसाधन है और वैश्विक तापमान में वृद्धि, भूमिगत जल का ज़रूरत से अधिक दोहन और मानवीय ग़लतियों के कारण जलस्रोतों में आगे और कमी आएगी.

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क्या हैं आने वाले चैलेंज?

मंत्रालय के इस नोट में जल को लेकर भविष्य की चुनौतियों का ज़िक्र किया गया है और कहा गया है कि जल का अभाव खाद्य सुरक्षा, पारिस्थितिकी, सामाजिक सामंजस्य, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सतत औद्योगिक विकास को प्रभावित करेगा.

मंत्रालय ने 2018 के आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर बताया है कि जल के अभाव वाले राज्यों के 52 कुओं में पानी का स्तर काफ़ी नीचे चला गया है. यह कमी महाराष्ट्र में सर्वाधिक है जबकि इसके बाद मध्य प्रदेश, केरल, ओडिशा और उत्तर प्रदेश का नम्बर है. मंत्रालय ने कहा है कि दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, पंजाब, तमिलनाडु और उत्तराखंड में भी भूमिगत जल का स्तर काफ़ी नीचे चला गया है.

पीने लायक नहीं रहा पानी

पंजाब में 216 कुओं का विश्लेषण किया गया ताकि जलस्तर में आई कमी का अंदाज़ा लगाया जा सके और इनमें से 181 कुओं में पानी का स्तर बहुत ही नीचे पाया गया है जिसका मतलब यह कि मुख्य रूप से खेती-किसानी पर निर्भर रहने वाले इस राज्य के 84 प्रतिशत कुएं बदहाल हैं. पेयजल की गुणवत्ता एक अलग समस्या है जो राज्य सरकारों के लिए एक अलग चुनौती पैदा कर रही है. 19 राज्यों के कम से कम 214 जिले ऐसे हैं जिसके भूमिगत जल में फ़्लोरायड की मात्रा काफ़ी अधिक पाई गई है और यह ज़रूरी स्तर से काफ़ी अधिक है.

यह बताना बहुत ज़रूरी है कि देश में 85 फ़ीसदी लोग पेयजल और घरों में अन्य कार्यों के उपयोग के लिए भूमिगत जल पर निर्भर हैं. 10 राज्य के 86 जिले भूमिगत पानी में आर्सेनिक की अधिक मात्रा होने की समस्या से जूझ रहे हैं. जल का अभाव और इसका प्रदूषित होना, इन दोनों ही समस्याओं ने पानी को नीतिगत बहस के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है.

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बढ़ रहा है मौतों का आंकड़ा, और बदतर होंगे हालात

जिस तरह से पानी का अभाव होता जा रहा है उसे देखते हुए वर्ष 2050 तक पानी की मांग उसकी आपूर्ति से अधिक हो जाएगी. मंत्रालय ने इस बारे में नीति आयोग की 2018 की एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया जिसमें कहा गया है कि हर साल दो लाख लोगों की मौत का कारण सिर्फ़ पीने के पानी का दूषित होना है और आने वाले वर्षों में यह स्थिति और बदतर होने वाली है.

इसमें आगे कहा गया है: 'भारत अपने इतिहास में सर्वाधिक बड़े जल संकट से गुज़र रहा है जिसकी वजह से लाखों लोगों का जीवन और उनकी आजीविका को ख़तरा पैदा हो गया है. इस समय, 60 करोड़ भारतीय पानी की ऐसी कमी झेल रहे हैं जिसे बहुत अधिक से तीव्र के बीच माना जा सकता है. हर साल दो लाख लोग पेयजल की अनुपलब्धता के कारण मारे जाते हैं. यह संकट आगे और गहराने वाला है. 2030 देश में पानी की मांग उसकी आपूर्ति से दोगुनी हो जाएगी, ऐसा अनुमान है. इसका अर्थ यह हुआ कि करोड़ों लोगों के लिए भारी जल संकट पैदा होने वाला है.'

संसाधनों का प्रबंधन

चूंकि, देश में जलाभाव से ग्रस्त होने वाले क्षेत्रों की संख्या बढ़ती ही जा रही है, सरकार जल संसाधन के शीघ्र ख़त्म होने की स्थिति को रोकने के लिए ठोस क़दम उठाने की ओर आगे बढ़ रही है. जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 जून 2019 को देश के सभी सरपंचों को एक पत्र लिखकर उन्हें जल संरक्षण पर ध्यान देने और इसे एक व्यापक आंदोलन बनाने के लिए हर संभव क़दम उठाने को कहा.

साथ ही, एक अंतर-मंत्रालयीन समिति गठित की गई है, जो जल संरक्षण से संबंधित गतिविधियों को आगे बढ़ाएगी और मानसून के दौरान होने वाली बारिश का अधिकतम प्रयोग करने के बारे में लोगों को शिक्षित करेगी. चूंकि जल राज्य सूची में आता है, केंद्र ने एक मॉडल विधेयक सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के ध्यानार्थ भेजा है, जिसमें भूमिगत जल के विनियमन के लिए उपयुक्त क़ानून बनाने को कहा है ताकि वर्तमान जल संसाधनों को और बढ़ाया जा सके. इस विधेयक के प्रावधानों में अन्य बातों के अलावा वर्षा जल के संग्रहण की बात कही गई है. अब तक 15 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने भूमिगत जल के विनियमन के लिए क़ानून को लागू किया है.

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बारिश का पानी बचाने की योजना

जल शक्ति मंत्रालय के अधीन केंद्रीय भूमिगत जल बोर्ड देश भर में वर्षा जल के संग्रहण और कृत्रिम जलभराई के लिए 1.11 करोड़ संरचना बनाने पर काम कर रही है. इस योजना पर अनुमानतः ₹79,178 ख़र्च होने का अनुमान है ताकि मानसून के दौरान अतिरिक्त जल का संग्रहण किया जा सके और वर्तमान जल संसाधन को बढ़ाया जा सके.

जल शक्ति मंत्रालय का कहना है कि कि आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने मॉडल निर्माण उप-नियम, 2016 जारी किया है, जिसमें सुझाव है कि 100 वर्ग मीटर या उससे अधिक क्षेत्र पर बनने वाले हर तरह के भवन में वर्षा जल संग्रहण की व्यवस्था हो. मणिपुर, सिक्किम, मिज़ोरम और लक्षद्वीप को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इन उप-नियमों के प्रावधानों को स्वीकार कर लिया है. स्थानीय निकायों को भवन निर्माण का जो प्लान सौंपा जाएगा उसमें वर्षा जल संग्रहण के लिए नाले और जल संग्रहण के लिए स्थान बताना होगा. इसके अलावा, ऐसे भवन जिससे 10 हज़ार लीटर या उससे अधिक गंदा पानी निकलता है, उसे इस गंदे जल को साफ़ करने की व्यवस्था करनी होगी. इस साफ़ किए हुए पानी का प्रयोग बाग़वानी में होगा.

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