क्या कमजोर हो गया है RTI एक्ट, जानें सरकार ने क्या किए हैं बदलाव?

सूचना के अधिकार एक्ट में सरकार ने बदलाव किए हैं. इसके बाद कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. केंद्र सरकार पर निशाना साधा जा रहा है कि उसने एक्ट को कमजोर कर दिया है और अब उस पर सरकार का नियंत्रण होगा. क्या सच में ऐसा है...

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: July 30, 2019, 12:52 PM IST
क्या कमजोर हो गया है RTI एक्ट, जानें सरकार ने क्या किए हैं बदलाव?
आरटीआई एक्ट में बदलाव को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं
Vivek Anand | News18Hindi
Updated: July 30, 2019, 12:52 PM IST
मोदी सरकार ने RTI एक्ट में बदलाव किया है. लोकसभा के बाद पिछले हफ्ते राज्यसभा में भी संशोधन बिल पास हो गया. इसके बाद कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. आरटीआई में बदलाव क्यों किया गया? बदलाव से एक्ट पर क्या असर पड़ेगा? क्या सरकार ने एक्ट में बदलाव करके इसे कमजोर कर दिया है? विपक्ष का इस बारे में कैसा रवैया रहा? इन सारे सवालों को बारीकी से समझने की जरूरत है. सिलेसिलेवार तरीके से इसे जानने की कोशिश करते हैं.

सबसे पहले ये जान लें कि आरटीआई एक्ट है क्या.

क्या है सूचना का अधिकार?
लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार शासन चलाती है. इसमें जनता को सर्वोपरि माना गया है. लेकिन क्या ऐसा हो पाता है? दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में सत्ता मिलने के बाद सरकारों ने भ्रष्टाचार और जनता के प्रति लापरवाही और अत्याचार के नमूने पेश किए. सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग करके जनता के अधिकारों को कुचला गया.

जनता को ये अधिकार है कि वो सरकार से सवाल करे. वो सरकार से पूछे कि टैक्स के जरिए जो पैसे उससे वसूले जा रहे हैं, उसे कहां खर्च किया जा रहा है. सरकार और उसकी नौकरशाही के एक-एक काम के बारे में जानकारी हासिल करना जनता का हक है. लेकिन इसके लिए कोई कानून नहीं था. कई बार शासकीय गोपनीयता का हवाला देकर ऐसी जानकारी नहीं देने का बहाना किया जाता था.

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विपक्ष आरटीआई में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साध रही है


सत्तर के दशक में देश में एक ऐसी व्यवस्था की बात चली जिससे सरकार और उसकी नौकरशाही जनता के हर सवाल का जवाब देने को मजबूर हो जाए. अरसे तक चले आंदोलन के बाद एक ऐसे कानून की रूपरेखा तैयार हुई, जिसमें जनता को सूचना पाने का अधिकार दिया गया. इसे सूचना का अधिकार कहा गया. 2005 में मनमोहन सिंह सरकार में सूचना का अधिकार ने कानून की शक्ल ली. उसके बाद सरकार और उसकी नौकरशाही में व्याप्त भ्रष्टाचार के कई मामलों का खुलासा इसी सूचना के अधिकार के जरिए सामने आ सका.
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सरकार ने RTI कानून में क्या बदलाव किए हैं?
कई आरटीआई एक्टिविस्ट और विपक्ष का कहना है कि सरकार ने आरटीआई को कमजोर किया है. नए संशोधन के बाद आरटीआई उतना ताकतवर नहीं रह गया है, जितना पहले था. बदलाव के बाद सूचना के अधिकार के संस्थागत ढांचे पर सरकार की निगरानी होगी. पहले ये स्वतंत्र रूप से काम कर रही थी.

सरकार के नियंत्रण में आने की वजह से आरटीआई कमजोर हुआ है. वहीं सरकार का कहना है कि उन्होंने सूचना अधिकार की ताकतों को छुआ तक नहीं है. सिर्फ कमीशन के ढांचे में थोड़ा बहुत फेरबदल किया गया है. इससे सूचना के अधिकार की ताकत कम नहीं हुई है.

RTI एक्ट में नया क्या-क्या हुआ है
-सरकार ने सूचना अधिकारियों के वेतन के साथ उनके कार्यकाल के निर्धारण को अपने हाथ में ले लिया है. पहले मुख्य सूचना आयुक्तों के साथ दूसरे सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 साल निर्धारित होता था. अब इसे बदल दिया गया है. सूचना आयुक्तों के कार्यकाल का निर्धारण अब सरकार करेगी.

-अब तक सूचना आयुक्त का वेतन तय होता था. अब मुख्य सूचना आयुक्त के साथ दूसरे आयुक्तों के वेतन का निर्धारण सरकार करेगी. इसके पहले मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का वेतन मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के बराबर होता था और इन सबका वेतन सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर होता था.

सुप्रीम कोर्ट के जज को ढाई लाख महीना, 34 हजार महीने के भत्ते के साथ दूसरी सुविधाएं जैसे- किरायामुक्त आवास और हर महीने 200 लीटर का ईंधन खर्च मिलता है. सूचना के अधिकार कानून में बदलाव के बाद सरकार नए सिरे से वेतन का निर्धारण कर सकती है. सरकार सूचना आयुक्तों का वेतन कम भी कर सकती है. लेकिन मौजूदा सूचना आयुक्तों का वेतन वही रहेगा, जो अभी उन्हें मिल रहा है.

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सरकार का कहना है कि उन्होंने सूचना आयुक्तों के अधिकार में कोई हस्तक्षेप नहीं किया है.


-केंद्र में मुख्य चुनाव आयुक्त (CIC) की तरह राज्य में भी मुख्य चुनाव आयुक्त (SCIC) होते हैं. केंद्र के मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री की अगुआई में तीन सदस्यीय पैनल करता है. इसमें प्रधानमंत्री के साथ लोकसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी का नेता और पीएम द्वारा नॉमिनेटेड कोई कैबिनेट मंत्री होता है.

इसी तरह से राज्यों में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए मुख्यमंत्री की अगुआई में तीन सदस्यीय पैनल होता है. इसमें मुख्यमंत्री के साथ विधानसभा में विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी का नेता और सीएम द्वारा नॉमिनेटेड कैबिनेट मंत्री होता है.

अब नियुक्ति के सारे अधिकार केंद्र सरकार ने अपने हाथ में ले लिए हैं. नियुक्ति और सेवा शर्तों का निर्धारण अब केंद्र सरकार करेगी. केंद्र के साथ राज्यों के मुख्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति भी केंद्र सरकार ही करेगी. इसे लेकर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं. कहा जा रहा है कि एक्ट में इस बदलाव की वजह से मुख्य चुनाव आयुक्त केंद्र के हाथ की कठपुतली बन जाएंगे. क्योंकि उनकी नियुक्ति से लेकर उनकी सेवा शर्तों का निर्धारण केंद्र के हाथ में होगा. वो जनता के पक्षधर की बजाए अपनी नौकरी बचाए रखने के लिए केंद्र सरकार के पक्षधर बन जाएंगे.

-फिलहाल मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे आयुक्तों का कार्यकाल 5 साल या अधिकतम 65 साल की आयुसेवा निर्धारित है. केंद्र और राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे आयुक्तों के लिए यही सेवा शर्तें हैं. इसमें अगर कोई आयुक्त प्रमोशन पाकर मुख्य चुनाव आयुक्त बन जाता है तो भी उनका कुल कार्यकाल (चुनाव आयुक्त और मुख्य चुनाव आयुक्त दोनों का मिलाकर) 5 साल का ही होगा.

-एक्ट में बदलाव के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त और दूसरे आयुक्तों के कार्यकाल का निर्धारण केंद्र सरकार के हाथ में चला गया है. इसका मतलब है कि सूचना आयुक्त को 5 साल के कार्यकाल से पहले भी हटाया जा सकता है. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि सरकार अपनी मर्जी के मुताबिक नहीं चलने वाले सूचना आयुक्तों के पर कतर सकती है.

-एक्ट में बदलाव के बाद मुख्य सूचना आयुक्त से लेकर सूचना आयुक्तों की नियुक्ति से लेकर उन्हें हटाने का अधिकार भी केंद्र सरकार के पास चला गया है. ओरिजनल बिल में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त को हटाने का अधिकार सिर्फ राष्ट्रपति के पास था. राष्ट्रपति भी उन्हें तभी हटा सकते थे, जब सुप्रीम कोर्ट की जांच में कोई आयुक्त दोषी पाया जाता हो. राज्यों के मामले में मुख्य सूचना आयुक्त के साथ दूसरे आयुक्तों को हटाने का अधिकार राज्यपाल के पास था. अब ये सब बदल गया है.

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एक्ट में बदलाव को लेकर विपक्ष सवाल खड़े कर रहा है


सूचना के अधिकार का इतिहास
किसी सूचना को जनता से छिपाने का काम ब्रिटिश दौर से ही जारी था. ब्रिटिश शासन में 1923 में शासकीय गोपनीयता अधिनियम 1923 बनाया गया था. इस अधिनियम का सहारा लेकर ब्रिटिश सरकार किसी भी सूचना को छिपा ले जाती थी. आजादी के बाद भी ये एक्ट जारी रहा. सरकारें एक्ट की धारा 5 और 6 के प्रावधानों का सहारा लेकर सूचनाएं छिपाती रहीं.

1975 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद जनता को कुछ अधिकार हासिल हुए. 1975 में उत्तर प्रदेश सरकार बनाम राजनारायण मामले में कोर्ट ने सरकारी नौकरशाही के सार्वजनिक कामों का ब्योरा जनता के देने की व्यवस्था की.

1989 में वीपी सिंह की सरकार ने सूचना का अधिकार कानून बनाने का वादा किया. लेकिन वो इसे अमल में लाने से पहले ही गिर गई. 1997 में इस दिशा में एक कदम आगे की पहल हुई. संयुक्त मोर्चा की सरकार ने एचडी शौरी की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की. कमेटी ने सूचना की स्वतंत्रता को लेकर एक ड्राफ्ट पेश किया.

2002 में वाजपेयी सरकार के दौरान सूचना की स्वतंत्रता विधेयक पास किया गया. जनवरी 2003 में इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिली. लेकिन इसे लागू नहीं किया जा सका.

2004 की यूपीए सरकार में इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाए गए. 12 मई 2005 को सूचना का अधिकार अधिनियम संसद में पास किया. 15 जून 2005 को राष्ट्रपति ने इसे मंजूरी दी. 12 अक्टूबर 2005 को यह कानून जम्मू-कश्मीर को छोड़कर पूरे देश में लागू किया गया.
First published: July 30, 2019, 12:10 PM IST
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