अब पाकिस्तान भी बनाएगा जानलेवा वायरस, चीन ने की सीक्रेट डील

अब पाकिस्तान भी बनाएगा जानलेवा वायरस, चीन ने की सीक्रेट डील
खुफिया एजेंसियों के मुताबिक चीन पाकिस्तान को जैविक हथियार बनाने में मदद करेगा (Photo-pixabay)

चीन (China) अपने देश से बाहर खतरनाक जैविक हथियार (bio weapon) बनाने की फिराक में है ताकि कोई दुर्घटना हो भी जाए तो वो अपना पल्ला झाड़ सके. इसके लिए पाकिस्तान (Pakistan) राजी है.

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भारत की परेशानियां बढ़ाने के लिए देश के दो दुश्मन पूरी तरह से एक हो गए हैं. खुफिया एजेंसियों ने हाल ही में खुलासा किया है कि चीन और पाकिस्तान के बीच एक डील हुई है, जिसके तहत चीन पाकिस्तान को जैविक हथियार बनाने में मदद करेगा. ये बात ऐसे समय में सामने आई है जब कोरोना को लेकर चीन शक के घेरे में है. बहुत से देश मानते हैं कि ये वायरस चीन की लैब से लीक हुआ है. इन हालातों में पाक के साथ जैविक हथियार बनाने की बात काफी डराने वाली है.

क्या है पूरा मामला
खुफिया एजेंसियों के मार्फ लीक हुई एक रिपोर्ट के मुताबिक चीन की लैब ने पाकिस्तान सेना की डिफेंस साइसेंज एंड टेक्नॉलजी ऑर्गनाइजेशन (डीईएसटीओ) के साथ सीक्रेट डील की है. इस डील के तहत दोनों देश संक्रामक बीमारियों और उनके कंट्रोल पर साथ मिलकर रिसर्च करेंगे. डील उसी लैब ने की है, जहां से वायरस लीक होने के आरोप लगते रहे हैं, यानी वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी. सुनने में ये डील काफी पाक-साफ लगती है लेकिन इससे खुफिया एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है.

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चीन का खुला खेल


माना जा रहा है कि पाकिस्तान को चीन इस्तेमाल कर रहा है. चूंकि कोरोना के बाद से सारे देश चीन से गुस्साए हुए हैं इसलिए वो अपने देश की सीमा से बाहर जैविक हथियार टेस्ट करने का इरादा रखता है. इसी इरादे से उसने पाकिस्तान से डील की ताकि अगर कोई जैविक दुर्घटना घट भी जाए तो चीन अपना पल्ला झाड़ सके.

जानलेवा वायरस और बैक्टीरिया से डील करने के लिए जिस तरह की लैब चाहिए, वो पाकिस्तान में नहीं (Photo-pixabay)


क्या है डील में
टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में The Klaxon के हवाले से बताया है कि खुफिया एजेंसियां अब भारत की सुरक्षा को लेकर फ्रिक में हैं. उन्हें शक है कि चीन इस डील की आड़ में भारत और पश्चिमी देशों को नुकसान पहुंचाना चाहता है. साथ ही पाकिस्तान में करार से फायदा ये है कि कुछ भी समस्या दिखे तो वो आसानी से पीछे हट सकता है. इस डील को नाम दिया गया है- "Collaboration for Emerging Infectious Diseases and Studies on Biological Control of Vector Transmitting Diseases".

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चीन-पाकिस्तान डील में के तहत खतरनाक बैक्टीरिया और वायरस पर स्टडी की जाएगी. इसके लिए वुहान लैब पाकिस्तान को ट्रेनिंग देगा और आर्थिक मदद भी चीनी सरकार देगी. चीन सफाई में कर रहा है कि वो पाकिस्तान को वायरस और बैक्टीरिया का अपना संग्रह तैयार करने में मदद दे रहा है ताकि पाकिस्तान भी रिसर्च कर सके.

क्यों डर रही हैं खुफिया एजेंसियां
एक सबसे बड़ा डर ये है कि जानलेवा वायरस और बैक्टीरिया से डील करने के लिए जिस तरह की लैब चाहिए, वो पाकिस्तान में नहीं है. बता दें कि बायोसेफ्टी लेवल 4 लैब में ही उनपर काम हो सकता है, जो जर्म्स जानलेवा हैं और जिनका कोई इलाज नहीं मिल सका है. चीन का वुहान लैब ऐसा ही एक लैब था, जो कोरोना के मामले में लापरवाही के आरोप से बाहर नहीं आ सका है. पाकिस्तान में जैविक रिसर्च की हालत और खराब है. वहां जब बायोसेफ्टी प्रोटोकॉल को नजरअंदाज करते हुए रिसर्च की जाएगी तो कुछ भी हो सकता है. चूंकि भारत पाकिस्तान का पड़ोसी देश है इसलिए किसी संक्रामक बीमारी के फैलने पर खतरा यहां भी आ सकता है.

जब बायोसेफ्टी प्रोटोकॉल को नजरअंदाज करते हुए रिसर्च की जाए तो कुछ भी हो सकता है


क्या होता है जैविक युद्ध
जीवाणुओं, विषाणुओं, कीटों या फंगस जैसे एजेंटों के ज़रिए खतरनाक किस्म के संक्रमणों को जब हमले के तौर पर इस्तेमाल किया जाए तो इसे जैविक युद्ध माना जाता है. ताज़ा इतिहास देखा जाए तो केन एलिबेक की किताब बायोहैज़ार्ड में उल्लेख है कि रिफ्ट वैली फीवर वायरस, एबोला वायरस, जापानी एनसेफलाइटिस वायरस, माचुपो, मारबर्ग, येलो फीवर और वैरिओला जैसे वायरसों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा चुका है.

रहा है इतिहास
एनसीबीआई पोर्टल की एक रिपोर्ट 'द हिस्ट्री ऑफ बायोलॉजिकल वॉरफेयर' के अनुसार पिछली यानी 20वीं सदी में संक्रामक बीमारियों से 50 करोड़ से ज़्यादा मौतें हुईं. इनमें से लाखों मौतों का कारण जान बूझकर किए गए हमले थे. उदाहरण के तौर पर जापानियों ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान चीन पर जैविक हमले किए थे. जापान ही नहीं बल्कि अमेरिका, यूरोपीय देश भी विश्व युद्ध से लेकर कोल्ड वॉर के समय के बाद तक भी समय समय पर जैविक हमले करने के आरोपी रहे हैं.

जापानियों ने दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान चीन पर जैविक हमले किए थे- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)


संधि के जरिए लगी रोक
1925 और 1972 में दो बार दो महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संधियां भी हुईं, जिनके तहत जैविक हमलों को गैरकानूनी करार दिया गया लेकिन जैविक हथियारों के बड़े पैमाने पर उत्पादन, उन पर रिसर्च करने से संधि में शामिल देश रुके नहीं. अब भी दुनिया के कई देशों के बारे में संदेह है कि वे जैविक हथियार तैयार कर रहे हैं ताकि युद्ध के हालात बनें तो वे भारी पड़ें. एनटीआई.ओआरजी पोर्टल की रिपोर्ट की मानें तो कनाडा, चीन, फ्रांस, जर्मनी, ईरान, इराक, इज़रायल, जापान, लीबिया, उत्तर कोरिया, रूस, दक्षिण अफ्रीका, सीरिया, यूके और यूएसए पर संदेह किया जाता है कि यहां जैविक हथियार संबंधी कार्यक्रम चल रहे हैं. चीन की लैब में खतरनाक वायरस पर कथित तौर पर लापरवाही से प्रयोग भी यही साबित करता है.

हथियार पाक आतंकियों के हाथ लग जाएं तो वे तबाही मचा सकते हैं- सांकेतिक फोटो (Photo- pixabay)


भारत के लिए क्यों है ज्यादा खतरा
चीन और पाकिस्तान दोनों ही देश भारत के लिए खास अच्छा नहीं सोचते. लद्दाख में पीछे हटने के बाद से चीन बौखलाया हुआ है. सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर कई मामलों में पाकिस्तान की पोल भी खुलती रही है. ऐसे में दोनों ने हाथ मिला लिया. अब डर ये है कि अगर हथियार पाक आतंकियों के हाथ लग जाएं तो वे भारत में तबाही मचा सकते हैं. आतंकी एंथ्रेक्स, प्लेग, इबोला, सार्स जैसे जैविक हथियारों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ कर सकते हैं. इससे जान-माल को गंभीर खतरा है.

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क्या है तैयारी
हम साल 1972 की संधि के तहत बायोवेपन तैयार नहीं कर सकते, लेकिन उसके खतरों को जानते हैं. इसके लिए देश के पास कई सारी तैयारियां भी हैं. देश की कई लैब में इसपर काम चल रहा है कि खुद को कैसे बचाया जा सकता है. मध्यप्रदेश के ग्वालियर में डीआरडीओ की लैब में खासतौर से जैविक हमले से निपटने को लेकर ही शोध चलता है. साथ ही सेंट्रल गर्वनमेंट ने सशस्त्र बलों में न्यूक्लियर, बॉयोलॉजिकल एंड केमिकल (NBC) निदेशालय बना रखे हैं, जो इसी पर नजर रखते हैं.
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