ड्रैगन से इस मामले में हारा अमेरिका, रोज झेलना पड़ रहा है करोड़ों का घाटा, नागरिकों की हेल्थ हो रही खराब

चीन के पास 2018 तक 4,21,000 इलेक्ट्रिक बसे थीं, जबकि अमेरिका के पास सिर्फ 300 इलेक्ट्रिक बसे थीं.

News18Hindi
Updated: May 27, 2019, 3:35 PM IST
ड्रैगन से इस मामले में हारा अमेरिका, रोज झेलना पड़ रहा है करोड़ों का घाटा, नागरिकों की हेल्थ हो रही खराब
2020 तक चीन ने अपने 30 बड़े शहरों को पूरी तरह से डीजल बसों से मुक्त करने का प्लान किया है. वहां केवल इलेक्ट्रिक बसें चलेंगीं...
News18Hindi
Updated: May 27, 2019, 3:35 PM IST
जब बिजली से चलने वाली बसों की खरीद की बात आती है तो चीन इस मामले में अमेरिका को पीछे छोड़ रहा है. वो भी थोड़े-बहुत अंतर से नहीं. चीन के पास 2018 तक 4,21,000 इलेक्ट्रिक बसे थीं, जबकि अमेरिका के पास सिर्फ 300 इलेक्ट्रिक बसे थीं. इसका श्रेय इस दिशा में चीन के लिए किए गए भारी आर्थिक निवेश को दिया जाना चाहिए. ब्लूमबर्ग के एक नए विश्लेषण के अनुसार दशकों से कई शहर और देश प्रदूषण फैलाने वाली डीजल बसों से निजात पाना चाहते हैं, जो जिनके चलते न केवल शहरों में बड़ी मात्रा में प्रदूषण फैलता है बल्कि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी होता है. इसके अलावा अक्सर उनमें ब्रेक डाउन होता है और मरम्मत की बहुत जरूरत पड़ती है.

कई सारे शहरों से डीजल की अपेक्षा कम प्रदूषण फैलाने वाले ईंधनों का बसों के लिए प्रयोग करने का प्रयास कर रहे हैं. इनमें प्राकृतिक गैस, हाइड्रोजन, बायोडीजल और बिजली आदि प्रमुख हैं. लेकिन हाल के सालों में, यह बात बिल्कुल साफ हो चुकी है कि इन सारे ही संसाधनों में से कोई भी बिजली की जगह नहीं ले सकता है. बिजली न सिर्फ ज्यादा अच्छे से काम करती है बल्कि वह सस्ती भी होती है और उससे किसी भी दूसरे ईंधन के मुकाबले कम प्रदूषण होता है और उसके रख-रखाव पर भी कम खर्च आता है.

हालांकि जानकार मानते हैं कि इलेक्ट्रिक बसों के बाकी ईंधन वाली बसों से आगे निकलने का कारण केवल ऊनका प्रदूषण न फैलाना नहीं है बल्कि उन्हें एक मील चलाने का खर्च डीजल बस के मुकाबले एक-चौथाई आता है. यह दूसरे वैकल्पिक ईंधनों से भी सस्ती पड़ती है. इसके लिए सौर और हवा की ऊर्जा के सस्ते होने का योगदान भी माना जा सकता है.

इसके साथ ही इलेक्ट्रिक बसों के रखरखाव में भी बहुत कम खर्च आता है. ऐसा कई अध्ययनों में भी सामने आ चुका है. एक अध्ययन में तो यह माना गया कि ऐसे में अगर हम एक रेगुलर सिटी ट्रांसपोर्ट बस की उम्र 10 से 12 साल मानें तो इतने दिनों में एक बस अपने पूरे खर्च में करीब ($0.4मिलियन) 2.8 करोड़ रुपये की बचत कर सकती है.

पहले, 2016 तक नई इलेक्ट्रिक बसों का दाम, डीजल बसों के मुकाबले में $0.3मिलियन डॉलर ज्यादा होता था. ऐसे में अपने जीवनकाल में इलेक्ट्रिक बसें मात्र $0.1मिलियन डॉलर की ही बचत कर पाती थीं. यह बचत लगातार बढ़ती जा रही है. चीन में ज्यादा से ज्यादा शहरों ने इन इलेक्ट्रिक बसों का प्रयोग शुरू कर दिया है.

शेनझान, चीन का पहला ऐसा शहर है जिसने पूरी तरह से इलेक्ट्रिक बसों को अपना लिया है. 2017 में ही इस शहर ने ऐसा कर दिखाया था. इसमें चीन की इलेक्ट्रिक बसों पर दी जाने वाली डेढ़ लाख डॉलर की सब्सिडी का भी बड़ा योगदान रहा है. वर्तमान में इस शहर में 1 करोड़ 30 लाख लोग रहते हैं और 16,000 बसें चलती हैं.

अब बीजिंग ने बड़े शहरों के लिए पूरी तरह से डीजल बसों को खत्म कर इलेक्ट्रिक बसों को लाने की बात कही है. दिसंबर में यूके संडे गार्डियन अख़बार ने एक लेख में बताया कि 2020 तक 30 से ज्यादा शहरों के लिए चीन ने 100% इलेक्ट्रिक बसें चलाने का लक्ष्य रखा है.
इस मामले में मदद के लिए पोटेरा ने अप्रैल में 12 सालों के लिए बैटरी किराए पर देने का काम शुरू किया था. इसके जरिए खर्च को आसान बनाने का प्रयास किया गया था.

अमेरिकन वेबसाइट थिंक प्रोग्रेस के अनुसार, चीनी इलेक्ट्रिक बैटरियों के उत्पादन और प्रयोग दोनों में ही दुनियाभर में 99% की हिस्सेदारी रखते हैं. बीजिंग अपने इन इलेक्ट्रॉनिक गाड़ियों में निवेश को धरती पर एक जीने लायक मौसम बनाए रखने के लिए बड़े रणनीतिक निवेश के रूप में देखता है.

यह भी पढ़ें: एक कार्यकर्ता से दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने तक का सफर

नॉलेज की खबरों को सोशल मीडिया पर भी पाने के लिए हमारे 'फेसबुक' पेज  को लाइक करें 
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...