म्यांमार तख्तापलट: क्या रणनीतिक तौर पर चीन ने भारत को दी पटखनी?

एक तरह से जाल में फंसकर चीन का मोहरा दिख रहा है म्यांमार.

एक तरह से जाल में फंसकर चीन का मोहरा दिख रहा है म्यांमार.

शी जिनपिंग (Xi Jinping) पहले प्रमुख चीनी नेता थे, जिन्होंने 2020 में म्यांमार का दौरा किया था. इसके एक साल के भीतर ही, म्यांमार में तख्तापलट हो गया. साझा संबंधों और वर्चस्व को लेकर म्यांमार में साफ तौर पर भारत के मुकाबले चीन (India vs China) ने बढ़त ली है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 3, 2021, 10:43 PM IST
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एक तरफ भारत ने लोकतांत्रिक मूल्यों (Democratic India) का हवाला देकर म्यांमार के हालात को 'बेहद तकलीफ़देह' बताकर पड़ोसी देश में लोकतंत्र बहाल (Democracy) किए जाने की बात कही. दूसरी तरफ, म्यांमार के निरंकुश पड़ोसी चीन ने फौरी प्रतिक्रिया (China Reacts to Myanmar Coup) न देते हुए इतना ही कहा कि वहां मिलिट्री और नागरिकों के बीच समन्वय होना चाहिए. चीन ने तो सैन्य शासन की आलोचना की और न ही चिंता जताई. म्यांमार में दस सालों में जो थोड़ा बहुत लोकतंत्र आया था, उस पर फिर सेना के काबिज़ (Military Rule in Myanmar) होने पर भारत और चीन का स्टैंड कुछ खास इशारे देता है.

इससे पहले कि आगे बात करें, आपको बता दें कि म्यांमार में बीते सोमवार को सेना ने अचानक घात करते हुए सिविलियन सरकार को हटाकर देश में एक साल के लिए इमरजेंसी की घोषणा कर दी. यानी शासन अपने हाथों में ले लिया. दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच पुल बनने वाले म्यांमार की लोकेशन रणनीति के लिहाज़ से भारत के लिए बेहद अहम है, वो भी तब चीन इस देश में कुटिल खेल खेल रहा है.

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टैटमाडॉ के साथ कैसे हैं रिश्ते?
म्यांमार में जल, थल और वायु सेना के पूरे समूह को टैटमाडॉ कहा जाता है, जिसके साथ पिछले कुछ समय में भारत के रिश्ते सकारात्मक रहे. परोक्ष या अपरोक्ष सैन्य शासन में रहे म्यांमार को भारत ने आईएनएस सिंधुवीर सबमरीन जब दी थी तो टैटमाडॉ ने खास तौर से भारतीय विद्रोही समूहों को कुचलने के लिए भारत को बुलावा भेजा था. सरकार के साथ ही म्यांमार की सेना के साथ भारत के संबंधों पर अब दक्षिण एशिया की नज़रें रहेंगी.

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भारत के पूर्व में स्थित पड़ोसी देश की नक्शे पर स्थिति.

दूसरी तरफ, भारत के खिलाफ अपना उल्लू सीधा करने के लिए चीन ने म्यांमार को 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल' रणनीति के तहत तरजीह दी है. चीन ने छलावे से म्यांमार को अपने कर्ज़ के जाल में फंसा रखा है. आंकड़ा यह है कि म्यांमार में जितना विदेशी निवेश है, उसका 25 फीसदी चीन का है. सिंगापुर के बाद म्यांमार में चीन ने सबसे बड़ा 21.5 अरब डॉलर का निवेश कर रखा है. वहीं, 2019-20 में भारत व म्यांमार के बीच 1.5 अरब डॉलर का साझा कारोबार हुआ, जो चीन के मुकाबले कुछ नहीं है.



क्या है कारोबार का मकसद?

अपने महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत चीन ने म्यांमार के साथ इकोनॉमिक कॉरिडोर बनाया है. इसके चलते बड़े प्रोजेक्टों की आड़ में चीन भविष्य में म्यांमार के सैन्य बेसों का इस्तेमाल करने का इरादा रखता है. म्यांमार पर इस समय जो 10 अरब डॉलर का कर्ज़ है, उसमें से 40 फीसदी चीन का है. लेकिन चीन को पिछले कुछ समय से इस देश में झटका लगा.

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भारत-म्यांमार-थाईलैंड के बीच त्रिकोणीय हाईवे का अहम प्रोजेक्ट रहा हो या कालाडन मल्टी मोडल ट्रांज़िट नेटवर्क और डीप वॉटर पोर्ट में स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन की बात हो, भारत ने म्यांमार में चीन के मुकाबले बढ़त बनाई. उधर, म्यांमार ने चीन के 38 प्रस्तावित प्रोजेक्टों में से सिर्फ 9 को मंज़ूरी देकर साफ किया कि सिर्फ वही प्रोजेक्ट अप्रूव होंगे, जो दोनों देशों के हित में हों. साफ है कि यहां भारत और चीन वर्चस्व की लड़ाई में शामिल रहे.

चीन के लिए और चिंता की वजहें?

भारत ही नहीं, म्यांमार में भारत के सहयोगी माने जाने वाले अमेरिका और जापान की बढ़ती दखलंदाज़ी भी चीन के लिए परेशानी का कारण बनी. माना जा रहा है कि नेपाल में जैसे भारत के खिलाफ भावना रखने वाली सरकार बनवाने का दांव चीन ने खेला, म्यांमार में भी सैन्य घात के पीछे चीन की ही भूमिका है.

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म्यांमार की लोकप्रिय नेता सू की और आर्मी प्रमुख की तस्वीर विकिकॉमन्स से साभार.

पिछले महीने बीजिंग में चीनी विदेश मंत्री के साथ म्यांमार के आर्मी प्रमुख मिन ऑंग हलैंग ने मुलाकात की थी और एक ही महीने बाद म्यांमार में सेना ने तख्तापलट कर दिया. बीजिंग की मुलाकात में चीन ने म्यांमार के साथ भाईचारे की बड़ी नुमाइश की थी. हालांकि तख्तापलट के बाद टैटमाडॉ को चीन ने औपचारिक रूप से समर्थन नहीं दिया है.

क्या है चीन की चाल?

तख्तापलट से पहले म्यांमार की सरकार बीआरआई से जुड़े चीन के प्रोजेक्टों को टाल रही थी और अब अंदेशा है कि चीन यहां अपने पक्ष वाली सरकार बनवा लेता है तो उसके ज़रिये वो तमाम मंज़ूरियां हासिल करेगा. इसके बाद भारत के लिए पूर्व एशिया के रास्ते बंद करने की कवायद चीन का अहम मकसद रहेगी.

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हैरतअंगेज़ आंकड़ा यह है कि 2019 में चीन व म्यांमार के बीच 168 अरब डॉलर का साझा कारोबार हुआ. यही नहीं, पिछले 50 सालों से सैन्य शासन होने और दुनिया से कटे होने के चलते म्यांमार वास्तव में चीनी एक्सपोर्ट से ही चलता रहा है. अब तख्तापलट के बाद अगर अमेरिका म्यांमार के साथ व्यापारिक प्रतिबंध का रास्ता अपनाएगा, तो इससे चीन के ही रास्ते खुलेंगे.

बात यह है कि चीन के कर्ज़, व्यापार और ​चीनी निर्भरता के जाल में फंसे म्यांमार में चीनी समर्थन वाली सरकार बनने की संभावनाएं भी हैं. और यह भारत के लिए सिरदर्द बहुत बढ़ाने वाले हालात हैं.

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