तिब्बत को लेकर भी चीन ने भारत को रखा था धोखे में, कहीं थीं झांसे में डालने वाली बातें

जब तिब्बत खुशहाल और स्वतंत्र था
जब तिब्बत खुशहाल और स्वतंत्र था

तिब्बत को लेकर चीन ने 40 के दशक में भारत से कुछ कहा था और किया कुछ. 40 के दशक में तिब्बत स्वतंत्र राष्ट्र था. चीन की सेनाओं पर उस पर कब्जा किया और फिर उसे बदलना शुरू कर दिया. भारत स्वतंत्र तिब्बत के पक्ष में था, क्योंकि ये उसके सामरिक हित में भी था. चीन ने वादा किया था कि उसकी धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक स्वायत्तता बरकरार रखी जाएगी लेकिन हुआ इससे एकदम अलग.

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ये 50 के दशक के आसपास का समय था. भारत जहा तिब्बत के भविष्य को लेकर चिंतित था, वहीं चीन उसे लगातार तिब्बत को लेकर धोखे में रख रहा था. वो बराबर विश्वास दिला रहा था कि वो चीन की स्वतंत्रता का आदर करता है. कभी तिब्बत के धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक हालात में ना तो कोई बदलाव करना चाहेगा यानि इन मामलों में दखल देगा,
हिन्दुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक और जाने-माने पत्रकार दुर्गादास अपनी किताब "कर्जन टू नेहरू" में इसका उल्लेख किया है. किताब कहती है कि 40 के दशक के आखिर और 50 के दशक की शुरुआत में उत्तरी सीमांत के उस पार परिस्थितियां बिगड़ गईं. इसके फलस्वरूप नेहरू और पटेल में आखिरी बार विवाद हुआ.
किताब कहती है, "लाल चीन ने तिब्बत पर आक्रमण कर दिया. नेपाल में अंदरूनी गड़बड़ होनी शुरू हो गई. ये बात सबको जाहिर थी कि तिब्बत के सवाल पर पटेल औऱ प्रसाद का नेहरू से मतभेद था. उन्होंने नेहरू से कहा था कि भारत और चीन के बीच तिब्बत का स्वतंत्र प्रतिरोधक राज्य के रूप में रहना जरूरी था. अब उनकी आशंकाएं सही साबित हो रही थीं."
बकौल किताब, "नेहरू इस बात से परेशान थे कि चीन ने उनकी राय को तोड़ा है, वादाखिलाफी की है. किताब के अनुसार इस मामले में भारत से भी एक भूल हुई जो भारी पड़ी. भारत सरकार के कम्युनिस्ट चीन को लिखे गए पहले पत्र में तिब्बत के प्रति चीन की स्थिति पारिभाषित करने की थी. ब्रिटेन ने तिब्बत पर चीन अधिराजत्व को मान्यता दी थी. दिल्ली ने दुर्भाग्यवश अधिराजत्व की जगह प्रभुसत्ता शब्द का प्रयोग किया था. चीन सरकार ने इस भूल का पूरा फायदा उठाया."





 

तब जो कहा वो बाद में कुछ और निकला

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