नोबेल शांति पुरस्कार पर चीन क्यों बार-बार नार्वे पर भड़क जाता है?

नोबेल शांति पुरस्कार पर चीन क्यों बार-बार नार्वे पर भड़क जाता है?
चीन ने हांगकांग के लोकतंत्र समर्थकों को नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने के खिलाफ नार्वे को आगाह किया- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

पहले भी चीन दलाई लामा और चीनी मानवाधिकार कार्यकर्ता लियू शियाबो को नोबेल पुरस्कार मिलने पर (nobel peace prize to Dalai Lama and Liu Xiaobo) नार्वे पर भड़का था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 1, 2020, 9:49 AM IST
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चीन ने हांगकांग के लोकतंत्र समर्थकों को नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने के खिलाफ नार्वे को आगाह किया है. उसके मुताबिक नार्वे अगर ऐसा करता है तो इसका असर दोनों देशों के आपसी रिश्ते पर पड़ेगा. बता दें कि इससे पहले भी चीन और नार्वे के संबंधों में बुरी तरह से तनाव रहा था, जब नार्वे ने चीन के मानवाधिकार कार्यकर्ता लियू शियाबो और तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को नोबेल शांति पुरस्कार दिया था. वैसे नार्वे ही वो देश है जिसे नोबेल शांति पुरस्कार देने का अधिकार है. बाकी सारे नोबेल पुरस्कार स्वीडन में दिए जाते हैं. जानिए, आखिर क्यों नार्वे के पास ये हक है.

शांति पुरस्कार और नार्वे का संबंध
साल 1901 जब से नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत हुई, तब से ही इसके फाउंडर अल्फ्रेड नोबेल की मर्जी यही थी कि शांति पुरस्कार नार्वे की राजधानी ओस्लो में ही दिए जाए. इसके लिए नार्वे की संसद स्टॉर्टिंग द्वारा नियुक्त 5 लोगों की कमेटी शांति पुरस्कार देती है. वैसे इस बारे में किसी के पास कोई तथ्य नहीं है कि आखिर अल्फ्रेड नोबेल ने शांति पुरस्कार देने का जिम्मा नार्वे को क्यों दिया और स्वीडन को क्यों नहीं दिया. खुद नोबेल पीस प्राइज की वेबसाइट के मुताबिक इसके लिए अल्फ्रेड नोबेल ने कोई सफाई या दलील नहीं छोड़ी थी.

नार्वे ही वो देश है जिसे नोबेल शांति पुरस्कार देने का अधिकार है (Photo-needpix)

इस बारे में लगातार कयास ही लगाए जाते रहे हैं


एक अनुमान ये है कि नोबेल चाहते थे कि ये पुरस्कार नार्वे के लेखक बोर्न्‍सत्जेर्ने बोर्नसन को मिले. इसके लिए हो सकता है कि स्वीडिश तैयार न हों, लिहाजा ये पुरस्कार देने का जिम्मा ही उन्होंने नार्वे को दे दिया. ये भी एक दलील है कि इंटरनेशनल पीस कैंपेन के लिए बात करने और आवाज उठाने वाला पहला देश नार्वे ही था. इसके बाद अल्फ्रेड नोबेल के मन में ये छवि बनी हो कि स्वीडन के मुकाबले नार्वे ज्यादा बेहतर रहेगा. वैसे नार्वे ने साल 1890 के दशक के दौरान अमेरिका में आपसी लड़ाई के बीच भी शांति की बात की, इससे भी इस धारणा को बल मिला, ऐसा माना जाता है.

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वैसे नार्वे के शांति पुरस्कार देने के पीछे अल्फ्रेड की सोच जो भी रही हो, उन्होंने अपनी वसीयत में ये साफ कहा था- पुरस्कार देते वक्त उम्मीदवारों की राष्ट्रीयता नहीं देखी जाए. जो उम्मीदवार वास्तव में शांति दूत की तरह काम करे, उसे किसी भी राष्ट्र का होने के बाद भी ये पुरस्कार मिले.

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चीन को फिलहाल क्यों आया गुस्सा
अब बात करते हैं चीन और नार्वे के बीच हालिया तनातनी की. तो असल में नार्वे ने हांगकांग के लोकतंत्र समर्थकों को शांति पुरस्कार देने की बात की. इसपर ही चीन भड़क उठा क्योंकि चीन के विरोध में ही वहां ये आंदोलन चला था. बता दें कि चीन की मर्जी के चलते हाल ही में हांगकांग में नया कानून पारित हुआ है. इस नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत चीन हांगकांग में सीधे दखल दे सकता है. हांगकांग में नया नेशनल सेक्युरिटी ऑफिस बनेगा, जो वहां के हालात पर नजर रखेगा. खुफिया जानकारी इकट्ठा करेगा. अगर इस कार्यालय ने किसी के खिलाफ कोई मामला दर्ज किया, तो इसकी सुनवाई चीन में भी हो सकती है.

हांगकांग में सुरक्षा कानून लागू होने के बाद से बवाल मचा था और हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया


हांगकांग के साथ चीन ने क्या किया
कानून ये भी कहता है कि चीन का ये कार्यालय किसी सुपर वॉच-डॉग की तरह काम करेगा. हांगकांग के उसके साथ तालमेल के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग बनाना होगा. साथ ही उसकी बात भी माननी सुननी होगी. हांगकांग में अगर कोई सुरक्षा कानून से खिलवाड़ करने का दोषी पाया जाएगा तो उसे आजीवन कारावास भी हो सकता है. यानी एक तरह से कम्युनिस्ट चीन की सारी सेंसरशिप अब हांगकांग पर भी लागू होगी.

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हांगकांग में सुरक्षा कानून लागू होने के बाद से बवाल मचा था और हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया था. नार्वे इन्हीं प्रदर्शनकारियों को शांति पुरस्कार देने की बात कर रहा था, जिसपर चीन ने आपत्ति जताई. नार्वे की यात्रा पर गये चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने याद दिलाया कि पहले भी चीन के मानवाधिकार कार्यकर्ता लियू शियाबो और तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को (1989) अतीत में नोबेल शांति पुरस्कार दिये जाने से दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों में तनाव पैदा हुआ था. अब इसी तर्ज पर हांगकांग के लोकतंत्र समर्थकों को इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया तो देशों के बीच राजनयिक संबंध बुरी तरह से प्रभावित हो सकते हैं. ये बात उन्होंने एक तरह से चेताते हुए कही.
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