कौन है वो चीनी महिला, जिसने नेपाल को नए नक्शे के लिए उकसाया

कौन है वो चीनी महिला, जिसने नेपाल को नए नक्शे के लिए उकसाया
नेपाल में चीन की राजदूत होऊ यांगी ने इसके लिए पीएम ओली को राजी किया (Photo- Hou Yanqi Twitter)

खुफिया एजेंसियों (intelligence agencies) का मानना है कि नेपाल के नए विवादित नक्शे के पीछे चीन की शह (China is behind Nepal new political map) है. खासकर नेपाल में चीन की राजदूत होऊ यांगी (Chinese ambassador to Nepal Hou Yanqi) ने इसके लिए नेपाल के पीएम केपी शर्मा ओली (KP Sharma Oli) को उकसाया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 20, 2020, 10:13 AM IST
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नेपाल की राष्‍ट्रपति ने देश के व‍िवादित राजनीतिक नक्‍शे को अपनी मंजूरी दे दी. इसके बाद नेपाल ने उत्‍तराखंड में भारत से लगी सीमा पर हथियारबंद जवान तैनात कर दिए हैं. नए नक्शे में भारत के तीन इलाकों को नेपाल अपना हिस्सा बता रहा है. लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा (Kalapani Lipulekh and Limpiyadhura) इलाके भारत के लिए सामरिक तौर पर काफी अहम इलाके रहे हैं. माना जा रहा है कि भारत के इलाकों को अपना कहने का काम नेपाल ने चीन के उकसाने पर किया है. खासकर नेपाल में चीन की राजदूत होऊ यांगी (Chinese ambassador to Nepal Hou Yanqi) ने इसके लिए पीएम ओली को राजी किया. इसके बाद ही ओली ने ऐसा नक्शा तैयार किया. इसे भारत के खिलाफ एक बड़े कदम की तरह देखा जा रहा है, जबकि नेपाल के साथ भारत के रिश्ते हमेशा ही अच्छे रहे. जानिए, कौन हैं होऊ यांगी.

चीनी नागरिक होऊ यांगी नेपाल में साल 2018 से चीन की राजदूत हैं. उन्हें दक्षिण एशियाई मामलों का जानकार माना जाता है. इसी लिहाज से यांगी ने मिनिस्ट्री ऑफ फॉरेन अफेयर्स में भी लंबे वक्त तक डिप्टी डायरेक्टर की भूमिका निभाई और कई अहम फैसले लिए, जिनसे चीन का संबंध पड़ोसी देशों से प्रभावित हुआ. यांगी ने चीनी राजदूत के तौर पर पाकिस्तान में भी तीन साल बिताए.

चीनी नागरिक होऊ यांगी नेपाल में साल 2018 से चीन की राजदूत हैं (Photo- Hou Yanqi Twitter)




यांगी के कूटनीतिक दिमाग का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एकदम अलग संस्कृति वाले देश में मेलजोल बढ़ाने के लिए इस राजदूत ने उर्दू भाषा सीखी और राजनेताओं से मेलजोल के मौके पर फ्लूएंट उर्दू बोला करती थीं ताकि उन्हीं में से एक लगें.
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भारतीय खुफिया एजेंसियों की मानें तो पाकिस्तान में राजदूत रहते हुए यांगी ने कई पाकिस्तानी नीतियों के लिए काम किया, जिसका भारत से कहीं न कहीं ताल्लुक था. पाकिस्तान जैसे जटिल देश में तीन अहम साल देने के बाद यांगी को नेपाल भेजा गया. इसके पीछे एक राजदूत के तौर पर यांगी की सफलता ही मानी जाती है. बता दें कि इससे पहले भारत-नेपाल के संबंध बड़े-छोटे भाई जैसे ही सहज रहे और कूटनीतिक टकराव की नौबत नहीं आई थी. अब माना जा रहा है कि नेपाल के पीएम के विवादित नक्शा बनाने के पीछे यांगी का ही हाथ है. उन्होंने ही पीएम ओली और नेपाल की संसद को इसके लिए तैयार किया.

जानकारी के मुताबिक यांगी का पीएम ओली के दफ्तर और यहां तक कि निवास पर भी लगातार आना-जाना था. इससे अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस राजदूत की नेपाल की स्थानीय राजनीति में पकड़ मजबूत है. साथ ही नेपाल की सत्तासीन पार्टी का वो प्रतिनिधिमंडल, जो नक्शा बदलने के लिए संविधान संशोधन विधेयक बना रहा था, यांगी लगातार उनके संपर्क में भी रहीं.

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नेपाल के नए मानचित्र लाने को चीन की साजिश के तौर पर पहले से ही देखा जा रहा था, जब विधेयक पास भी नहीं हुआ था. यहां तक कि भारतीय सेना प्रमुख एम. एम. नरवने ने भी इस बात का इशारा दिया था कि नेपाल में बीजिंग की शक्तियां काम कर रही हैं और लिपुलेख में सड़क बाने के भारत के विरोध के पीछे नेपाल खुद नहीं, बल्कि चीन ही है. अब माना जा रहा है कि चीन की राजदूत ने इस विवादित नक्शे के लिए काम किया ताकि भारत की परेशानियां बढ़ें.

यांगी का पीएम ओली के दफ्तर और यहां तक कि निवास पर भी लगातार आना-जाना था


बता दें कि चीन भी लद्दाख में गलवान घाटी पर लगातार भारत से भिड़ रहा है. इधर पाकिस्तान लगातार कश्मीर में आतंकी गतिविधियां बढ़ा रहा है. इन सबके बीच भारत में कोरोना के मामले भी तेजी से बढ़े हैं. भारत पर हर ओर से दबाव बढ़ाने के लिए चीनी राजदूत यांगी ने नेपाल के पीएम को भड़काया.

वैसे भी यांगी को चीन में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण राजदूतों में गिना जाता है और उनकी पोस्टिंग पहले पाकिस्तान और फिर नेपाल में होना चीन की किसी खास रणनीति की ओर इशारा करता दिख रहा है.

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यांगी सोशल मीडिया को भी अपने देश की स्थिति मजबूत करने के लिए इस्तेमाल करती आई हैं. खासकर ट्विटर पर वे चीन की छवि को बेहतर बनाने के लिए जानी जाती हैं. इस सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वे चीन की सांस्कृतिक और सामाजिक बातों का बखान करती हैं ताकि बड़े स्तर पर लोगों के मन में चीन की स्थिति बेहतर की जा सके. इसे राजनैतिक शब्दावली में सॉफ्ट पावर बढ़ाना कहते हैं.
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