नेपाल के स्कूलों में क्यों अनिवार्य कर दी गई चीनी भाषा?

नेपाल के स्कूलों में क्यों अनिवार्य कर दी गई चीनी भाषा?
ऐसी क्या बात है कि नेपाल में इस विदेशी भाषा को सीखना जरूरी कर दिया गया?- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

नेपाल पर चीन का असर कितना ज्यादा हो चुका है, ये इस बात से समझ सकते हैं कि वहां के स्कूलों में चीनी भाषा अनिवार्य (schools in Nepal make Mandarin language compulsory) कर दी गई है. भाषा पढ़ाने वाले टीचर्स की तनख्वाह चीन का दूतावास दे रहा है.

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भारत से मधुर संबंध रखने वाला नेपाल एकाएक भड़क उठा और उत्तराखंड के तीन इलाकों पर अपनी दावेदारी जताने लगा. यहां तक कि नेपाल के पीएम ने नागरिकता कानून में बदलाव की बात की, जिससे भारतीय बहुओं को नेपाल की नागरिकता देर से मिले. नेपाल के इस बदले रवैये के पीछे चीन का कूटनीतिक दिमाग माना जा रहा है. नेपाल में चीनियों की बढ़ती आवाजाही और चीनी राजदूत की नेपाल की राजनीति में सीधे दखल से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. वैसे नेपाल में चीन का दखल समझना हो तो एक और बात मदद कर सकती है, वो है यहां के स्कूलों में चीनी भाषा सीखना अनिवार्य किया जाना.

क्या कहता है नेपाल का करिकुलम
नेपाल में करिकुलम डेवलपमेंट सेंटर (CDC) सरकारी संगठन है, जो तय करता है कि नेपाल में स्कूल्स चाहें तो कोई भी फॉरेन लैंग्वेज सिखा सकते हैं. लेकिन इसमें ये भी साफ है कि कोई भी विदेशी भाषा किसी बच्चे के लिए अनिवार्य नहीं की जा सकती. ऐसे में नेपाल के ख्यात स्कूलों में चीनी भाषा की अनिवार्यता कई सवाल उठाती है. ऐसी क्या बात है कि नेपाल में इस विदेशी भाषा को सीखना जरूरी कर दिया गया?

यूनाइटेड नेशन्स के मुताबिक चीनी भाषा मंडारिन दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है (Photo-pixabay)

चीन दे रहा तनख्वाह


द हिमालयन टाइम्स के मुताबिक देश के 10 बड़े स्कूलों में चीनी भाषा पहले से ही अनिवार्य सब्जेक्ट रही क्योंकि इसे सिखाने के लिए चीनी दूतावास से सैलरी मिलती है. काठमांडू का चीनी दूतावास ही इसके लिए टीचर भी मुहैया कराता है. ऐसे में जाहिर है स्कूलों को भाषा सिखाने से कोई आपत्ति नहीं होगी. ऐसा ही हुआ भी. 10 स्कूलों के बाद हाल ही में पोखरा, धुलीखेल और कई दूसरे निजी स्कूलों में चीनी भाषा बच्चों के लिए अनिवार्य कर दी गई है.

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भाषा सीखने की अनिवार्यता का मतलब है कि इससे बच्चे अपनी पसंद की दूसरी विदेशी भाषाएं नहीं सीख सकेंगे. चूंकि चीनी भाषा दूसरी कई भाषाओं से काफी मुश्किल मानी जाती है इसलिए बच्चों का वक्त इसपर ही पूरा उतरने में बीतेगा. वहीं अंग्रेजी से मिलती-जुलती कई दूसरी भाषाएं सीखना आसान होने और इंटरनेशनल बाजार उनकी स्वीकृति के बाद भी बच्चे वे भाषाएं नहीं चुन सकेंगे.

क्यों सिखाना चाहता है अपनी भाषा
यूनाइटेड नेशन्स के मुताबिक चीनी भाषा मंडारिन दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है. इसे लगभग 1.12 बिलियन लोग बोलते हैं. चिन्हों से बनी भाषा होने के कारण ये कई दूसरी भाषाओं से अलग और इसलिए मुश्किल मानी जाती है. हालांकि चीन ने जब नेपाल में इसके लिए सैलरी और स्कूल टीचर तक मुहैया कराने की बात की तो इसके पीछे उसकी रणनीति है.

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असल में चीन माओ के वक्त से ही पाइव फिंगर पॉलिसी पर कहीं न कहीं यकीन करता आया है. उनका मानना है कि तिब्बत उनकी एक हथेली है और लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और अरुणाचल प्रदेश हथेली की पांच उंगलियां. इसी रणनीति के तहत नेपाल में चीनी भाषा का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है ताकि वहां की युवा पीढ़ी पर चीन की सभ्यता-संस्कृति का असल जमने लगे. इस तरह से नेपाल में चीन का वर्चस्व बढ़ेगा.

काठमांडू के बाजारों में दुकानदार चीनी पर्यटकों से चीनी भाषा में बात करने लगे हैं (Photo-pixabay)


व्यापार में मिलेगी मदद
चीन की इस चाल के पीछे आर्थिक पहलू भी है. नेपाल आकार में छोटा है लेकिन सामरिक तरीके से काफी महत्वपूर्ण है. साथ ही इसका व्यापारिक महत्व भी है. खासकर भारत के वन बेल्ट- वन रोड प्रोजेक्ट से इनकार करने के बाद से चीन नेपाल से संबंध बढ़ा रहा है. उसकी योजना है कि नेपाल के जरिए वो व्यापार में सेंध लगा सके. यही वजह है कि नेपाल में चीन ने भारी रकम सड़क योजना पर लगाई हुई है. नेपाल और चीन के बीच रेलवे लिंक बनाने की भी बात चल रही है. चीन की योजना है इसके जरिए वो नेपाल में भी अपने को मजबूत करेगा और साथ ही नेपाल के रास्ते भारत से भी व्यापार का रास्ता आसान होगा. यहां तक कि अब चीन नेपाल के पोखरा शहर में हवाई अड्डा बना रहा है.

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नेपाल में दिख रहे चीनी साइनबोर्ड
नेपाल में चीनी पर्यटकों का आना भी बढ़ा है. काठमांडू पोस्ट के अनुसार साल 2017 में चीन के सैलानियों में 38.04 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई. इससे पहले नेपाल घूमने के लिए भारतीय ज्यादा जाया करते थे. वहीं उस साल जनवरी से मार्च के दौरान 40,976 चीनी सैलानी आए. अब सैलानी आ रहे हैं तो उनकी जरूरतों के लिए नेपाल का बाजार भी चीन के बाजार में बदल रहा है. काठमांडू के बाजारों में दुकानदार चीनी पर्यटकों से चीनी भाषा में बात करने लगे हैं. यहां तक कि बाजारों में चीनी भाषा के साइन बोर्ड भी लगे हुए हैं ताकि चीनियों को सुविधा हो. काठमांडू में अब चीनी व्यावसायी लीज पर दुकानें ले रहे हैं और नेपाली दुकानदारों को टक्कर दे रहे हैं.
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