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Asian Games 2018 : चीन में बेरहमी से तैयार होते हैं चैम्पियन, जानकर आ जाएंगे आंसू

Asian Games 2018 : चीन में बेरहमी से तैयार होते हैं चैम्पियन, जानकर आ जाएंगे आंसू

चीन के एक स्पोर्ट्स बोर्डिंग स्कूल में ट्रेनिंग लेती बच्ची की फाइल फोटो, फोटो क्रेडिट : रॉयटर्स

चीन के एक स्पोर्ट्स बोर्डिंग स्कूल में ट्रेनिंग लेती बच्ची की फाइल फोटो, फोटो क्रेडिट : रॉयटर्स

एशियन गेम्स में चीन को टॉप पर देखकर आपको भारत से भी ऐसे प्रदर्शन की ख्वाहिश होती होगी, लेकिन चीनी खिलाड़ियों की ट्रेनिंग के बारे में जानेंगे तो आपकी यह इच्छा फीकी पड़ जाएगी.

    चीन में ऐसे हज़ारों बोर्डिंग स्कूल हैं, जहां खेलों की कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है. इन स्कूलों को सरकार से ठीक-ठाक पैसा भी दिया जाता है. इसमें 5-6 साल तक के बच्चे भी होते हैं, जिन्हें ताइक्वांडो, टेबल टेनिस, जिमनास्टिक्स और बैडमिंटन जैसे खेलों की बरसों तक ट्रेनिंग दी जाती है. यह सालों की ट्रेनिंग केवल इसलिए दी जाती है, ताकि वे अपने परिवारों के लिए आशाएं और सम्मान लेकर आ सकें. हालांकि इन बच्चों में से ज्यादातर के ख्वाब जल्द ही मर जाते हैं. लेकिन इनमें से कुछ के लिए यही ओलंपिक की पहली सीढ़ी बन जाती है.

    चीन के लिए क्यों अहम हैं खेल?
    चीन के लिए खेल का महत्व किसी युद्ध से कम नहीं. चीन के लिए खेल वर्ल्ड पॉलिटिक्स के बड़े गेम के चीट कोड जैसे हैं. चीन मानता है कि अगर वह मेडल टैली में छाएगा तो खेलों में अपने दबदबे का प्रयोग वो राजनीतिक दबदबा दिखाने के लिए भी कर सकता है. चीन की इस कूटनीति को 'पिंग पॉन्ग कूटनीति' कहा जाता है. पिंग पॉन्ग माने 'टेबल टेनिस'.

    1970 के दशक तक चीन पूरी दुनिया से व्यापारिक-राजनीतिक और वैज्ञानिक आदान-प्रदान नहीं करता था. उसका दूसरे सभी देशों ने बायकॉट कर रखा था. वजह थी उसकी विचारधारा. 1971 में वहां अमेरिका से बड़ी संख्या में टेबल टेनिस के खिलाड़ी आए और इसे दुनिया ने चीन को विश्व राजनीति में शामिल होने के रूप में देखा. चीन में अमेरिकी खिलाड़ियों ने पिंग पॉन्ग खेला, अमेरिका में चीनी खिलाड़ियों ने पिंग पॉन्ग खेला और धीरे-धीरे विश्व राजनीति के बड़े खिलाड़ी के तौर पर स्थापित होने के लिए चीन की राह प्रशस्त होती चली गई.

    'गोल्ड' के लिए चीन ने खड़ा कर लिया है ट्रेनिंग स्कूलों का बड़ा मॉडल
    पिंग पॉन्ग कूटनीति से चीन ने खेलों का रोल वर्ल्ड पॉलिटिक्स में समझ लिया और अब वह इसका बेहतरीन तरह से प्रयोग करता है. यह वजह है कि वह लगातार ओलंपिक खेलों की मेडल टैली में अमेरिका को पिछाड़कर नंबर वन होने के लिए हाथ-पांव मार रहा है. इसके लिए चीन ने देश के अंदर बहुत बड़ा स्पोर्ट्स ट्रेनिंग स्कूलों का मॉडल खड़ा कर रखा है. जिसके जरिए वह अच्छे एथलीट्स पैदा करता है लेकिन इन ट्रेनिंग सेंटर्स ने चीन को जितनी ख्याति दिलाई है.

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    चीन के नैनिंग प्रांत का नैनिंग जिम, चीन के सबसे भयानक ट्रेनिंग कैंप्स में से एक है. यहां का दृश्य ऐसा है कि देखकर अच्छे-खासे इंसान की आंखों में आंसू आ जाए. पांच-पांच साल के छोटे बच्चे यहां रोते-बिलखते अपनी ट्रेनिंग पूरी कर रहे होते हैं. चटाई, रिंग या लटकने वाले डंडे पर आपको आंखों में मोटे-मोटे आंसू भरे हुए कई-कई बच्चे दिखेंगे.

    गरीब परिवारों से आते हैं ज्यादातर बच्चे
    आपने एथलीट पान सिंह तोमर की जिंदगी पर बनी इसी नाम की फिल्म जरूर देखी होगी. पान सिंह तोमर केवल पौष्टिक खाने के लिए स्पोर्ट्स-आर्मी ज्वाइन कर लेता है. चीन में यह लाखों-लाख बच्चों का सच है. ये बच्चे पढ़ते हैं स्पोर्ट्स बोर्डिंग स्कूल में. इन स्कूलों का एक ही मकसद है, अपने-अपने स्पोर्ट्स में अच्छे से अच्छा परफॉर्म करना. ताकि अपने देश यानी चीन का नाम ऊंचा किया जा सके. इसके लिए वे सबकुछ सहते हैं, घंटों की कड़ी ट्रेनिंग, जिसमें कई बार किसी डंडे से लटके रहना होता है तो कभी घंटों पानी में खड़े रहना. इसके अलावा बच्चों को कई-कई घंटों के लिए बिना बात स्कूल में दी जाने वाली सजाएं भी दी जाती हैं ताकि ये बच्चे अपने स्ट्रेंथ बढ़ा सकें. आपके दिमाग में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा कि इतने कोमल बच्चों पर ऐसा कठिन प्रयोग उनके मां-बाप क्यों होने देते होंगे? दरअसल इन स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे गरीब परिवारों से आते हैं. ऐसे किसान और मजदूर जिन्हें लगता है कि वे अपने बच्चों का कभी अच्छे से पोषण नहीं कर पाएंगे.

    ट्रेनिंग के दौरान रोती एक बच्ची, फाइल फोटो


    इन ट्रेनिंग स्कूलों में पढ़ाई की बजाए खेलों पर होता है ज्यादा फोकस
    जाहिर सी बात है ऐसे स्कूलों में पढ़ाई की बजाए ज्यादा से ज्यादा फोकस स्पोर्ट की ट्रेनिंग पर रहता है. ऐसे में बच्चे बाकी पूरी दुनिया से कट जाते हैं. और कई बार जो बच्चे किसी खास स्पोर्ट को नहीं फॉलो कर पाते और इन स्कूल से बाहर निकल जाते हैं. वे दुनिया के बाकी किसी काम के नहीं रह जाते.

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    ऐसे बच्चों से उन्हें आशा होती है कि ये एक रोज जब देश का और परिवार का नाम अंतरराष्ट्रीय मंच पर रौशन करके लौटेंगे तो वे अपने साथ केवल गर्व की भावना और एक प्रतिष्ठित नाम ही नहीं लेकर आयेंगे बल्कि वे अपने परिवार के साथ एक नए तरह का भविष्य भी लेकर लौटेंगे. एक भविष्य जिसमें अपनी जिंदगी गांवों में किसानी-मजदूरी करते उनके मां-बाप को तसल्ली भरा बुढ़ापा मिल सकेगा. उन्हें अपनी दो जून की रोटी की चिंता नहीं होगी और साथ ही उनके पास होगा शहर में अपनी बाकी जिंदगी एक आलीशान घर में गुजारने का मौका जो अभी तक उनके लिए बहुत दूर की कौड़ी ही रहा था.

    इसी उम्मीद के साथ चीन के इस स्कूलों में बच्चे 2020 और यहां तक की उसके बाद के अंतरराष्ट्रीय खेलों के लिए भी गोल सेट करके तैयारी कर रहे होते हैं.

    इस समय चीन का एक ही मकसद है, 'ओलंपिक में टॉप पर जाना'
    जब चीन को 2008 के ओलंपिक की तैयारी कर रहा था जब उसने प्रोजेक्ट 119 लॉन्च किया था. यह एक ऐसा प्रयास था जिसमें खिलाड़ियों को 119 पदकों के साथ घर लौटना था. उसने ऐसा लक्ष्य अपने सन् 2000 के प्रदर्शन को देखते हुए तय किया था. 2000 में चीन का प्रदर्शन अच्छा रहा था. इस साल चीन पहली बार 91 मेडल्स के साथ पदकतालिका में शीर्ष तीन देशों में शामिल हो गया था.

    लेकिन आप नहीं चाहेंगे भारत पाये ऐसी सफलता
    चीन का 2013 का खेल बजट 4,206 करोड़ था और पांच साल बाद भी भारत का 2018 का खेल बजट लगभग आधा 2,196 करोड़ है. साथ ही चीन के पास एक तय स्पोर्ट्स ट्रेनिंग स्कूलों का मॉडल है जिसके जरिए उसका पैसा ट्रेनिंग पर ही खर्च होता है. और चूंकि चीन खेलों पर अपने खर्चे के हिसाब से अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में पदक ले आता है तो वह अपने मॉडल को तुलनात्मक रूप से सफल मानता है. लेकिन यह मॉडल कितना सफल है कितना नहीं यह तो वही माता-पिता बता सकते हैं जो अपने बच्चों का एडमिशन ऐसे ट्रेनिंग स्कूल में कराते हैं और 10 साल की ट्रेनिंग के बाद भी उनके बच्चे खिलाड़ी नहीं बन पाते. साथ ही उन्हें कोई दूसरा ऐसा हुनर भी नहीं आता है जो उन्होंने नॉर्मल स्कूल जाकर सीखा होता.

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    Tags: Asian Games 2018, China, London olympic 2012, Rio Olympics 2016, Water sports

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