क्यों लद्दाख में चीनी लाउडस्पीकर हिंदी और पंजाबी बोल रहे हैं?

लद्दाख के पैंगोंग इलाके में भारतीय और चीनी सैनिक डटे हुए हैं- सांकेतिक फोटो
लद्दाख के पैंगोंग इलाके में भारतीय और चीनी सैनिक डटे हुए हैं- सांकेतिक फोटो

चीनी सैनिक अब मनोवैज्ञानिक युद्ध (psychological war by Chinese army against Indian army by playing Punjabi and Hindi) के पैंतरे आजमा रहे हैं. वे लद्दाख में सीमा पार पंजाबी गाने बजा रहे हैं और हिंदी में भड़काऊ बातें बोल रहे हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 18, 2020, 4:06 PM IST
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पूर्वी लद्दाख के पैंगोंग सो इलाके में भारतीय और चीनी सैनिक डटे (India China clashes near Pangong Tso Southern bank) हुए हैं. जून में हिंसक झड़प के बाद हुआ तनाव लगातार गहरा रहा है, जो कमांडर-स्तर की पांच बैठकों के बाद भी कम नहीं हुआ. इसी बीच चीनी सेना एक अलग ही पैंतरा आजमा रही है. वो भारतीय सैनिकों का दिल जीतने या यूं कहें कि उनका ध्यान भटकाने के लिए लाउडस्पीकर पर पंजाबी गाने बजा रही है. साथ में हिंदी में घोषणाएं भी रही हैं. चीनी के अलावा दूसरी किसी भी भाषा में तंग चीन आखिर हिंदुस्तानी भाषाएं क्यों बोल रहा है? जानिए, उसकी अजब चाल के क्या हैं मायने.

क्या चल रहा है सीमा पार
इसी गुरुवार को लद्दाख में सीमा पार तैनात चीनी सैनिकों के खेमों से जोरों से पंजाबी गाने सुनाई देने लगे. बीच-बीच में हिंदी में अजीबोगरीब और भड़काऊ बातें भी कही जा रही थीं. माना जा रहा है कि सैन्य झड़प से लेकर कूटनीतिक मोर्चे पर भारत से मुकाबला नहीं कर पा रहा चीन भारतीय सैनिकों के खिलाफ एक तरह का मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ चुका है. ये गाने बजाना इसी के तहत एक रणनीति है. इंडिया टु़डे की एक रिपोर्ट के मुताबिक असल में चीन को लगता है कि भारत में रहने वाले और लद्दाख में तैनात सारे जवान पंजाबी होते हैं. यही वजह है कि वो उनका ध्यान भटकाने के लिए पंजाबी गाने बजा रहा है. इसका एक मकसद ये भी है कि ऐसा करके वो सैनिकों में भड़का गुस्सा कम करके उन्हें कमजोर बनाना चाहता है.

सीमा पार तैनात चीनी सैनिकों के खेमों से जोरों से पंजाबी गाने चल रहे हैं- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

भड़काऊ बयान भी दे रहे 


यहां तक की चीनी लाउडस्पीकर चालाकी दिखाते हुए भारतीय सैनिकों को भड़काने की भी कोशिश कर रहे हैं. यूरेशियन टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार गानों के बीच-बीच में शुद्ध हिंदी में उस पार से कहा जाता है कि दिल्ली में नेता आराम से बैठे हैं, जबकि यहां बर्फ में सैनिकों को तैनात कर दिया है. वे ये याद दिलाने से भी बाज नहीं आ रहे है कि कुछ ही हफ्तों बाद लद्दाख में -30 से -40 तक तापमान गिर जाएगा. ऐसे में सैनिकों को न तो नींद आएगी, न गर्म खाना ही मिल सकेगा.

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भारतीय सैनिक ले रहे मजे
सीमा पर तैनात भारतीय सैनिकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा. उल्टे वे इन बातों को सुनते हुए चीनी सैनिकों के डर का अंदाजा लगा पा रहे हैं. बता दें कि पूर्वी लद्दाख में तैनात स्पेशल फ्रंटियर फोर्स के सैनिकों को तोड़ने के लिए कुछ दिनों पहले ही चीनी लाउडस्पीकरों ने एक और तरीका आजमाया था. वे घोषणा कर रहे थे कि इतने दुर्गम मोर्चे पर तैनात सैनिक सिर्फ राजनेताओं के इस्तेमाल के लिए हैं और किसी काम के नहीं हैं.

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पुरानी है चीन की ये ट्रिक
भारतीय सैनिकों की हिम्मत तोड़ने के लिए मनोवैज्ञानिक युद्ध का ये चीनी तरीका काफी पुराना है. साल 1962 में भी युद्ध के दौरान चीन ने यही पैंतरा आजमाया था. टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में एक पूर्व भारतीय सेना प्रमुख ने बताया कि उस दौरान भी सीमा पार से चीन पंजाबी गाने बजाया करता था. कई बार हिंदी में भड़काऊ बातें भी करता था.

भारत तिब्बत सीमा पुलिस की जो भी टीम पेट्रोलिंग पर जाए, उनके साथ चीनी भाषा बोलने वाला कोई जवान अनिवार्य है- सांकेतिक फोटो


चीन ने जमकर खाई थी शिकस्त
यहां तक कि पांच सालों बाद साल 1967 में नाथू ला में भी चीन-भारत संघर्ष हुआ, जिस दौरान भी चीन यही काम करता रहा था. हालांकि इसका कोई फायदा नहीं हुआ. उल्टे चीन के 300 से अधिक सैनिक मारे गए. वहीं भारत के 90 सैनिकों की शहादत हुई थी. इसके बाद भारतीय सैनिकों की जांबाजी का डर चीन के मन में बैठ गया. यही दोनों देशों के बीच खुलकर हुआ आखिरी खूनी संघर्ष था. साल 1996 और 2005 में हुई भारत-चीन संधि के कारण दोनों देशों के जवान फायर आर्म्स (बंदूक) का इस्तेमाल नहीं करते हैं.

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भारतीय सेना सीख रही चीनी
इसके बाद भी चीन बाज नहीं आ रहा और दोबारा भारतीय सेना का ध्यान भटकाने के लिए पुराना तरीका आजमा रहा है. दूसरी ओर भारतीय सैनिक चीनी सीख रहे हैं. दरअसल ये दोनों देशों की सीमाओं पर छिटपुट टकराव कम करने के लिए उठाया गया कदम है. सीमा पर तैनात चीनी और भारतीय सैनिकों के बीच धक्का-मुक्की जैसी बातें आती रही हैं. पेट्रोलिंग के दौरान धक्का लगाना, डंडों के जरिए सैनिकों को पीछे करना या पिट्ठू बैग गिराना जैसी बातें सीमा पर होती रही हैं.

टकराव के बीच दोनों देश के सैनिक आपस में कुछ बोलने की कोशिश करते लेकिन भाषा उनके बीच बाधा रही. छोटे-मोटे गतिरोध को आपसी बात से कम करने की सोचकर साल 2017 में ही आईटीबीपी के लगभग 300 जवानों को चीनी भाषा सिखाई गई. ये पक्का किया गया कि पेट्रोलिंग के दौरान हर पोस्ट पर चीनी भाषा जानने वाला कोई न कोई जवान रहे.

लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बना रहता है


अब हालिया तनाव के बाद से आईटीबीपी के हर जवान को चीनी सिखाई जाने वाली है. यहां पर लगभग 180 बॉर्डर आउटपोस्ट हैं, जहां करीब 90 हजार जवानों की फोर्स तैनात है. अब हरेक को चीनी भाषा सिखाने के लिए ट्रेनिंग प्लान तैयार किया जा रहा है. हरेक जवान के लिए ये अनिवार्य होगा. बेसिक ट्रेनिंग कोर्स के अलावा रिफ्रेशर कोर्स भी होगा ताकि समय-समय पर भाषा को मांजने का मौका मिले.

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चीन में भी हिंदी की चली बात
इंडियन आर्मी की तर्ज पर चीन के एक्सपर्ट भी कहते आए हैं कि उनके सैनिकों को हिंदी सीखनी चाहिए. इस बारे में सरकारी समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स में भी साल 2017 में एक रिपोर्ट आई थी. डोकलाम विवाद के बीच अखबार ने कहा था कि चीन के सैनिकों को भी हिंदी सिखाई जाए ताकि जवानों के बीच दोस्ती बढ़े. हालांकि इसके बाद से ऐसी कोई जानकारी नहीं आई कि चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी अपनी फौज को हिंदी सिखा रही है.
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