'Chutiya'...ये गाली नहीं बल्कि असम के लाखों आदिवासियों का सरनेम, एक युवती की वजह से चर्चा में

असम में वो आदिवासी समुदाय, जो अपना सरनेम chutia लिखते हैं
असम में वो आदिवासी समुदाय, जो अपना सरनेम chutia लिखते हैं

आमतौर पर'Chutiya' शब्द अपशब्द (Absurd) माना जाता है. इसका इस्तेमाल बदसलूकी करने वाला माना ही जाता है. लेकिन क्या आप मानेंगे कि इस सरनेम को लिखने वाला एक बड़ा तबका असम (Assam) में रहता है. उन्होंने किस तरह से और कब से इस शब्द को सरनेम में रखना शुरू किया.

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आमतौर पर'Chutiya' शब्द को अपशब्द माना जाता है. बोलचाल की भाषा में तो इन्हें लोगों से बदसलूकी करने वाला शब्द माना ही जाता है बल्कि अब तो कंप्युटर सिस्टम भी इसकी पहचान अपशब्द के तौर पर करते हैं. हाल ही में जब इस समुदाय की एक युवती ने नौकरी के लिए आनलाइन आवेदन भरा तो उसके सरनेम को सिस्टम ने स्वीकार ही नहीं किया. आखिरकार वो आनलाइन आवेदन नहीं कर सकी. बाद में उसने अपना दर्द फेसबुक पर बयां किया. इससे ये आदिवासी समुदाय चर्चाओं में आ गया.

असम की एक युवती प्रियंका जब एक नौकरी के लिए आनलाइन आवेदन कर रही थी तो साइट ने उसके सरनेम को स्वीकार करने से मना कर दिया, क्योंकि ये चूतिया है और आनलाइन सिस्टम में इस शब्द को कई बार इसलिए स्वीकार नहीं किया जाता, क्योंकि इसे अपशब्द माना जाता है. खैर उस युवती ने सीधे विभाग के उच्चाधिकारियों से बात करके अपने आवेदन को मंजूर कराया.

कहां रहते हैं 'Chutia' समुदाय के लोग 
इस खबर ने असम में रहने वाली उस जाति के बारे में उत्सुकता जरूर पैदा कर दी कि क्या वास्तव में भारत में कहीं चूतिया सरनेम या जाति वाले लोग रहते हैं. ये बात सही है कि असम में कचारी वर्ग के लोग अपनी जाति के रूप में चूतिया शब्द का इस्तेमाल करते हैं. इसे सूतिया भी उच्चारित किया जाता है. असम में इनकी आबादी 20 से 25 लाख के बीच है.
एक खास साम्राज्य से ताल्लुक


असम के 'Assamese Chronicle' में 'Chutia' का इतिहास दर्ज है. 'असमिया क्रॉनिकल' के अनुसार इस समुदाय का नाम सातवीं शताब्दी की शुरुआत में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर निवास करने वाले 'Chutia King' अस्सम्भिना के नाम पर रखा गया है. उस काल में 'Chutia' वंश के लोगों ने वर्तमान के भारतीय राज्यों असम और अरुणाचल प्रदेश में अपने साम्राज्य का गठन किया और वहां पर सन 1187 से सन 1673 तक राज्य किया.

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समूह के लोगों की शारीरिक बनावट पूर्व एशियाई और इंडो आर्यन का मिला-जुला रूप है. ऐसा माना जाता है कि असम में रहने वाला ये समूह पहला ऐसा समूह है, जिसके लोग दक्षिणी चीन (वर्तमान में तिब्बत और सिचुआन) से स्थानांतरित होकर आये थे.

अपनी पारंपरिक पोशाक में असम के इस आदिवासी समुदाय का एक युवक


कभी था लंबा-चौड़ा साम्राज्य
प्राचीन समय में जब 'Chutiya' लोगों का राज्य था, उस वक़्त वो एरिया लगभग लखीमपुर और सुबानसिरी नदी के पीछे का हिस्सा जितना था. ये लोग पूरे राष्ट्र का संचालन ब्रह्मपुत्र के उत्तरी छोर से करते थे. पहले ये लोग तिब्बती-बर्मन मूल की भाषा बोलते थे, लेकिन धीरे-धीरे इन्होंने हिंदू धर्म को अपनाने के साथ असमिया बोलना शुरू कर दिया. इन लोगों के निवास का मूल स्थान असम आकर बसने से पहले सिचुआन हुआ करता था.

भारत सरकार की ओबीसी कैटेगरी में
चूतिया समुदाय को भारत सरकार ओबीसी यानि अन्य पिछड़ा वर्ग में रखती है. और मूलतौर पर असमी बोलने वाले माने जाते हैं. अब ज्यादातर इस समुदाय के लोग असम के ऊपरी और निचले जिलों के साथ बराक घाटी में रहते हैं. विकीपीडिया ने इस समुदाय के संबंध में एक लंबा-चौड़ा पेज भी बना रखा है.

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मतलब है शुद्ध पानी के करीब रहने वाले लोग
बिष्णुप्रसाद राभा, डब्ल्यूबी ब्राउन और पवन चंद्र सैकिया ने अपनी किताब द डिबोनगियास में लिखा है शब्द चू-ति-या मूलतौर पर देओरी चूतिया भाषा से आया है, जिसका मतलब है कि शुद्ध पानी के करीब रहने वाले लोग. इसमें चू का अर्थ प्योर यानि शुद्ध या अच्छा, ति का मतलब पानी और या यानि उस भूमि में रहने वाले निवासी या लोग.

रसोई में खाना तैयार करती इस आदिवासी समुदाय की महिलाएं


लोकगीतों से जाहिर करते हैं परिचय
आर एम नाथ ने अपनी किताब बैकग्राउंड ऑफ असमीज कल्चर में दावा किया है कि पहाड़ की चोटी (जिसे यहां की भाषा में चूट )से इस शब्द की उत्पत्ति हुई है. ऊपरी असम के मैदानी इलाकों में आने से पहले ये लोग पहाड़ों पर ही रहते थे. इस समुदाय के बहुत लोकगान हैं, जिसके जरिए वो कहते हैं कि वो भूमिक्का औऱ सुबाहु चूतन के वंशज हैं.

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400 सालों से ज्यादा रहा राज्य
कहा जाता है उत्तरी ब्रह्मपुत्र के इलाके में इस साम्राज्य का उदय प्राचीन पाल वंश के खत्म होने के बाद हुआ. ये 400 सालों से ज्यादा समय तक यहां राज करता रहा. जिसमें मौजूदा असम के उत्तर पूर्वी इलाके और अरुणाचल प्रदेश थे. मौजूदा असम के लखीमपुर, धेमजी, तिनसुकिया और जोरहाट, डिब्रुगढ़, सोनितपुर के कुछ हिस्से इसमें आते थे.

काली की पूजा और हिंदू धर्म को मानते हैं
ये लोग काली के विभिन्न अवतारों की पूजा करते हैं. आजकल ज्यादातर इस समुदाय के लोग एकसरना धर्म के फॉलोअर हैं. जिसकी स्थापना 15वीं शताब्दी में असम में हुई थी. लेकिन बड़े पैमाने पर चूतिया समुदाय के ऐसे भी लोग हैं जो हिंदू हैं और काफी बड़ी तादाद में हैं. ये कई छोटे समुदायों में भी बंटे हुए हैं.
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