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नागरिकता कानून: क्या है यह कानून और क्यों हो रहा है इतना विवाद? जानें हर सवाल का जवाब

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Updated: December 19, 2019, 2:16 PM IST
नागरिकता कानून: क्या है यह कानून और क्यों हो रहा है इतना विवाद? जानें हर सवाल का जवाब
नागरिकता (संशोधन) कानून के खिलाफ प्रदर्शन

नागरिकता (संशोधन) कानून, 2019 (Citizen Amendment Act) के असर में आने के बाद कोई भी व्यक्ति जो भारत का नागरिक है, अपनी नागरिकता नहीं खोएगा. क्या है इस कानून का असली मतलब यहां पढ़ें विस्तार से...

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  • Last Updated: December 19, 2019, 2:16 PM IST
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भारत जल रहा है. अल्पसंख्यक चिंतित हैं, फिलहाल डरे हुए हैं. यह सोचना कि यह वर्तमान सरकार के नागरिकता कानून पर उठाए कदम का नतीजा है, हालात को गलत तरीके से देखना होगा. तथ्य यह है कि निहित स्वार्थों के कारण उन्हें निशाना बनाकर एक बड़ा झूठी सूचनाओं का अभियान शुरू कर चलाया जा रहा है और बढ़ावा दिया जा रहा है. इससे राष्ट्रीय आतंक की स्थिति पैदा हो गई है.

नागरिकता (संशोधन) कानून, 2019 (Citizen Amendment Act) के असर में आने के बाद कोई भी व्यक्ति जो भारत का नागरिक है, अपनी नागरिकता नहीं खोएगा. यह कानून किसी को भी वर्तमान नागरिकता से वंचित नहीं करता न ही दक्षिण एशिया (South Asia) में रहने वाले सभी धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारत आकर नागरिकता का दावा करने का पूर्णाधिकार देता है.

क्या पड़ोसी देशों के किसी भी हिंदू को नागरिकता मिल जाएगी
कानून के पारित होने के बाद ऐसा नहीं होगा कि ढाका से कुछ हिंदू प्लेन में चढ़ेंगे और कलकत्ता में उतरकर इमिग्रेशन ऑफिसर के पास नागरिकता के लिए दावा कर सकेंगे. यह एक गलत और खतरनाक वर्णन है. खासतौर से यह समझा जाना चाहिए कि यही वह वर्णन है जिसे विपक्ष और प्रदर्शनकारियों के उन तथाकथित नेताओं ने गढ़ा है, जिन्होंने मात्र सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य के साथ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन के लिए उतरे हैं.



किसको मिलेगी नागरिकता




किस तरह भारत अपने नागरिकों के साथ खड़ा रहता है
संविधान की शुरुआत के समय, भारत कई लोगों का घर था. उनमें से सभी भारतीय नागरिक होने के योग्य नहीं थे. इसके अलावा, भारतीय मूल के व्यक्ति पूरे राष्ट्रमंडल के अलग-अलग राष्ट्रों में फैले हुए थे, जिनकी राष्ट्रीयता को हल करना था. भारत ने इस मुद्दो को कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सुलझाने का प्रयास किया है. हमने इस सवाल को श्रीलंका के साथ सुलझाया है, जब हमने भारत सरकार और सीलोन की सरकार के बीच सीलोन में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों की वर्तमान स्थिति और भविष्य को लेकर 1964 में पत्रों के आदान-प्रदान के जरिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए और कई लोगों को भारत वापस लौटा लिया और उन्हें भारतीय नागरिकता दे दी.

(1) जब बर्मा की सरकार वहां रह रहे भारतीयों की खिलाफ हो गई तो भारत ने सक्रियता दिखाते हुए हस्तक्षेप किया और उन्हें वापस लेकर आया.

(2) ऐसा ही मामला था, जब उत्तर-औपनिवेशिक अफ्रीकी सरकारों ने भारतीयों को अपने उपनिवेशवादी दौर से जोड़ना शुरू कर दिया और उनके खिलाफ हो गई. भारत ने भारतीय मूल के उन लोगों को वापस लाने के सक्रिय प्रयास किए, जो कि प्रभावी रूप से बिना किसी राष्ट्रीयता के वहां फंसे हुए थे. स्वतंत्रता के बाद से ही निरंतर हमारी नीति रही है कि हम असुरक्षित परिस्थितियों में रहने वाले भारतीय मूल के उन लोगों पर उनके बसने वाले देशों में नजर बनाए रखें.

क्यों पैदा हुई है ये स्थिति
शायद इसलिए संविधान की शुरुआत से ही भारत के लिए महत्वपूर्ण था कि नागरिकों का एक राष्ट्रीय रजिस्टर बनाया जाए. भारत में केवल नागरिकों को ही वोट देने का अधिकार है. यह एक के बाद एक आने वाली सरकारों की विफलता रही है कि वे ऐसा अपडेटेड रजिस्टर बनाने में विफल रहे हैं. अगर रजिस्टर को नियमित रूप से अपडेट किया जाता, तो शायद आज हम जिस अराजक स्थिति में हैं, नहीं होते.

NRC की जरूरत क्यों?


1971 में क्या थी बांग्लादेशी शरणार्थियों की स्थिति
यह हमें 1971 की उस स्थिति में ले आता है, जब पूर्वी बंगाल बांग्लादेशियों के नरसंहार की अराजकता में घिरकर टूट रहा था. तबके पूर्वी पाकिस्तान से शरणार्थियों के समूह सीमा के इसपार असम में शरण मांगने के लिए आ रहे थे. देश ने उन्हें स्वीकारा और सुरक्षा दी. लेकिन यह हमारी आधिकारिक नीति थी कि इन सभी शरणार्थियों को वापस जाना था और उन्हें भारत में हमेशा के लिए जगह नहीं दी जा सकती थी. तब हमारी प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर जाकर यह बयान दिया था, जिसे लंदन के टेम्स टेलीविजन पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है.

(3) दुर्भाग्यवश, एक धर्मनिरपेक्ष और उदार बांग्लादेश का विचार, जिसके लिए भारतीय सैनिकों ने अपना जीवन बलिदान किया था, हमेशा के लिए एक कल्पना बनकर रह गया. बांग्लादेश भी पाकिस्तान की राह पर ही चला और एक इस्लामिक राष्ट्र बन गया, जहां गैर-मुस्लिमों पर अत्याचार हुआ और आज भी जारी है. बांग्लादेश में शायद अल्पसंख्यकों के लिए चीजें उतनी बुरी नहीं हैं, जितनी पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए बुरी हैं लेकिन कोई यह नहीं कह सकता के वे काफी बेहतर हैं.

किस तरह उत्तर पूर्व इस समस्या से जूझ रहा है
तथ्य यह है कि एक के बाद एक सरकारें बांग्लादेशी स्वतंत्रता संग्राम के बाद सीमा पार कर भारत आए लोगों को वापस बुलाने की अपनी बात को पूरा कर पाने में असफल रहीं. गैरकानूनी प्रवासी भारत में बने रहे और रोज हमारी सीमाओं का उल्लंघन करते रहे. असम के लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं. उत्तर-पूर्व इस समस्या से जूझ रहा है. जो लोग अपनी पहचान और संस्कृति को बचाए रखना चाहते हैं उनके लिए यह विदेशियों का डर नहीं हो सकता. यह विदेशियों का डर नहीं हो सकता जो कि लोगों के लिए बाहर से आने वाले लोगों से मुक्ति चाहता है.

क्यों है एनआरसी की जरूरत
उत्तर-पूर्व के लोग इस समस्या से आहत हैं और किसी ने भी उनकी मदद के लिए कुछ नहीं किया है. ये प्रवासी हमारे बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक सेवाओं को निष्प्रभावी करने वाले हैं. और इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि इस परिस्थिति पर तुरंत लगाम लगाने के लिए एनआरसी की तत्काल आवश्यकता है. एनआरसी की जरूरत है क्योंकि भारत को यह निर्धारित करने का अधिकार है कि उसकी सीमाओं के भीतर कौन रहता है. केवल भारत के नागरिक ही यहां रहने के स्वत: अधिकार का दावा कर सकते हैं. गैर-नागरिक केंद्र सरकार की मर्जी से ही यहां रहते हैं. जो लोग केंद्र सरकार की अनुमति के बिना प्रवेश करते हैं, वे अपराधी हैं, जिन्हें वापस भेजा जाना चाहिए.

भारत क्या करता रहा है शरणार्थियों के साथ
लेकिन शरणार्थी अपराधी नहीं हैं. वे लोग उत्पीड़न से भागकर यहां आ रहे हैं और हमें उन्हें अपराधी नहीं मानना चाहिए. स्वतंत्र भारत ने कभी शरणार्थी सम्मेलन (रिफ्यूजी कन्वेंशन) में हस्ताक्षर नहीं किए हैं लेकिन यह उसे शरणार्थियों को पनाह देने से नहीं रोकता. हमने फिर भी शरणार्थियों को आश्रय दिया. लेकिन हमारी नीति ने हमेशा एक शरणार्थी को अवैध प्रवासी से अलग रखा है.

भारत क्या करता है शरणार्थियों के साथ


क्या शरणार्थियों के यहां पैदा होने बच्चे खुद-ब-खुद भारत की नागरिकता पा जाते हैं
एक शरणार्थी को हम सुरक्षा प्रदान करते हैं जबकि एक अवैध प्रवासी को हम केवल देशनिकाला दे सकते हैं. ऐसे में लंबे समय से भारत में रहते आ रहे प्रवासियों के लिए भारतीय नागरिकता पाने का कोई रास्ता नहीं है. इसका मतलब है कि कई मामलों में, उनके बच्चे जो कि भारतीय जमीन पर पैदा हुए हैं, वे भी भारतीय नागरिकता के लिए योग्य नहीं हैं. भारत में शरणार्थियों की स्थिति वह मुद्दा है जो आजादी के समय से ही लंबित है. यह कानून यह सुनिश्चित करने का एक लक्षित उपाय है कि इस स्थिति का निपटारा कर दिया गया है.

क्या है नागरिकता कानून
पहले इस कानून के बारे में कुछ मूलभूत बातें जान लें. जैसा कि मैंने ऊपर कहा, यह कानून किसी को भी नागरिकता से वंचित नहीं करता न ही यह किसी को नागरिकता देता है. यह केवल उन लोगों की श्रेणी को संशोधित करता है, जो (नागरिकता के लिए) आवेदन कर सकते हैं. यह ऐसा उन्हें (आवेदन करने वालों को) "अवैध प्रवासी" की परिभाषा से छूट देकर करता है- "कोई भी व्यक्ति जो कि हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई समुदाय से संबंधित है और अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान से है, जो कि भारत में 31 दिसंबर, 2014 को या इससे पहले प्रवेश कर गया है और जिसे केंद्र सरकार के द्वारा या पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 की धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (स) या विदेशी अधिनियम, 1946 के प्रावधानों के आवेदन या उसके अंतर्गत किसी नियम या आदेश के तहत छूट दी गई हो.

क्या है नागरिकता कानून?


इस छूट के लिए कानूनी ढांचा 2015 में गृह मंत्रालय द्वारा जारी दो अधिसूचनाओं में पाया जाता है.
(4) यह अधिसूचना केवल उन्हीं लोगों को छूट देती है जो हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई हैं, अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान से हैं और अगर वे भारत में 31 दिसंबर, 2014 से पहले धार्मिक उत्पीड़न की आशंका से भारत में प्रवेश कर गए थे.

क्या करता है नागरिकता का कानून
ये कानून उन्हें खुद ब खुद नागरिकता नहीं देता बस उन्हें इसके आवेदन के लिए योग्य बनाता है. उन्हें ये दिखाना होगा कि वो भारत में पांच साल रह चुके हैं, ये साबित करना होगा कि वो भारत में 31 दिसंबर 2014 से पहले आए हैं. ये साबित करना होगा कि वो अपने देशों से धार्मिक उत्पीड़न के कारण भागकर अपने देशों से आए हैं. वो उन भाषाओं को बोलते हैं जो संविधान की आठवीं अनुसूची में है और नागरिक कानून 1955 की तीसरी सूची की अनिवार्यताओं को पूरा करते हों. इसी के जरिए वो आवेदन के पात्र होंगे. उसके बाद ये भारत सरकार पर होगा कि वो उन्हें नागरिकता दे या नहीं.

शरणार्थियों को कैसा वीसा जारी करता है भारत
जो शरणार्थी पात्रता नहीं रखते (धर्म के बगैर भी) वो भारत की तदर्थ शरणार्थी नीति के साथ सुरक्षित रहते रहेंगे. जहां शरणार्थियों को भारत में रहने के लिए लंबी अवधि के स्टे वीसा जारी किये जाते हैं.
यूएन रिफ्यूजी एजेंसी यूएनएचसीआर के अनुसार, भारत में म्यांमार (बर्मा) , श्रीलंका, अफगानिस्तान आदि देशों के बहुत से शरणार्थी आराम से रह रहे हैं. मैं अब उन तीनों बातों पर आ रहा हूं, जिसे लेकर इस एक्ट की आलोचना की जा रही है, जिसे सांप्रदायिकता को उभार देने में इस्तेमाल किया जा रहा है.
1. एक्ट में मुस्लिम शरणार्थी क्यों नहीं
2. रोहिंग्या का क्या होगा
3. श्री लंका के तमिलों का क्या होगा
ये कानून मुस्लिम शरणार्थियों को कवर नहीं करता, क्योंकि हमारी स्थिति ये है कि जब हालत उनके लिए सुरक्षित हो जाएगी, तब शरणार्थी अफने घर वापस लौट सकते हैं और लौट जाना चाहिए.

भारत शरणार्थियों को वीजा कैसे देता है


क्यों भागकर आते हैं मुस्लिम
भारत की हमेशा की नीति गैर समावेश की थी (इस सरकार के होने से बहुत पहले से). कुछ देश विशेष तौर पर संवैधानिक तौर पर इस्लामी राष्ट्र हैं. वहां का आधिकारिक धर्म इस्लाम है. जबकि कुछ मुस्लिम भागकर भारत आते हैं. वो अपने देशों में जुल्म और अत्याचार के हालात के चलते वहां से भागकर यहां आते हैं. इस बात का कोई मतलब नहीं बनता कि उन्हें नीति दृष्टिकोण के अनुसार न्यूट्रीलाइज किया जाए.

गैर मुस्लिम शरणार्थियों के लिए क्या दिक्कतें हैं
गैर मुस्लिमों के लिए पड़ोसी देशों में संवैधानिक तौर पर दिक्कतें हैं. उन्हें लेकर एक ऐसा दृष्टिकोण है कि उनके साथ वहां ऐसे अत्याचार होते हैं मानो वो वहां रहने लायक ही नहीं हों. इसलिए गैर मुस्लिमों के लिए एमनेस्टी का मतलब बनता है. जबकि मुस्लिमों को अलग अलग केस के तौर पर लिया जाता है (जैसा हमने सीरिया, अफगानिस्तान आदि देशों से आने वाले मुस्लिमों के लिए किया है.

गैर मुस्लिम शरणार्थियों की परेशानी


रोहिंग्या मामले को सरकार किस तरह ले रही है
जब बात रोहिंग्या की आती है तो हमें याद रखने की जरूरत है कि बर्मा की स्थिति ये है कि रोहिंग्या वास्तविक तौर पर अविभाजित भारत के समय भारत आए थे, तब जबकि ब्रिटेन ने बर्मा पर कब्जा कर लिया. इसलिए बर्मा उन्हें अपने जातीय ग्रुप और योग्य नागरिकता में नहीं रखते. भारत इस विवाद में फंसा है. अगर भारत रोहिंग्या को भारत में न्यूट्राइज का अधिकार देता है, तो ये बर्मा के साथ हमारे नाजुक विवाद को अपसेट करेगा. जहां हम अपेक्षा करते हैं कि बर्मा इस मामले को बांग्लादेश से बातचीत करके समाधान करेगा. वो जगह अब बांग्लादेश के पास है, जहां से बर्मा का दावा है कि रोहिंग्या ने माइग्रेट किया था. भारत में रोहिंग्या को शरणार्थी प्रोटेक्शन और लॉन्ग टर्म वीज़ा मिला हुआ है. लेकिन वो नागरिकता के योग्य नहीं होंगे.

रोहिंग्या पर सरकार का रुख


श्रीलंकाई तमिलों का नागरिकता का क्या मसला है
आखिर में हमें श्रीलंका के साथ लगातार बातचीत की श्रृंखला के जरिए पिछले कुछ बरसों से राष्ट्रीयता के सवाल पर बातचीत करते रहे हैं. हमने लगातार श्रीलंकाई तमिलों के लिए न्यूट्रालाइज लाभों को बढाया है, जो भारत में हैं, बेशक वो भारत में श्रीलंका के सिविल वार खत्म होने के बाद भी हैं और वहां शांति स्थापित हो चुकी है. ये बात अनावश्यक तौर पर श्रीलंका के साथ टकराव बढाएगी. वो टकराव जिसे हम ठीक कर चुके हैं और ये वो देश है जहां हमें अनावश्यक दखंलदाजी और प्रभाव इस्तेमाल करने का आरोपी माना जाता रहा है.

श्रीलंकाई तमिलों की नागरिकता


ये कानून क्यों मुस्लिमों के खिलाफ नहीं है
ये कानून मुस्लिमों के खिलाफ नहीं है. जो भी शख्स भारत में है क्योंकि वो अत्याचार के चलते आया है उसे वापस उसी जगह भेजा जाएगा. इसका मतलब ये नहीं माना जाना चाहिए कि वो कभी यहां नागरिकता के योग्य होंगे. वो लोग जिनके अत्याचार स्थायी हैं, उन्हें सुरक्षा दी जाएगी. हमारी नीति गैर समावेश की जारी रहेगी. अलबत्ता अगर चीजें अगले 50 सालों में शरणार्थियों के लिए बेहतर नहीं होंती तो हमें अतिरिक्त तदर्थ संविधान के कानून की तरह उनकी सुरक्षा को बढाने की जरूरत होगी. लेकिन फिलहाल ये इस सरकार की नीति नहीं है.

ये कानून मुस्लिमों के खिलाफ नहीं है


क्या कुछ लोग गलत जानकारियां फैला रहे हैं
हकीकत ये है कि कुछ लोग इस कानून को तोड़मरोड़ कर बताकर अपना हित साध रहे हैं और उन्होंने देश दंगों की आग में झोंक दिया है. लोगों को हिंसा के लिए उकसाया जा रहा है. इन गलत सूचनाओं का सामना करने की जरूरत है. केंद्र और राज्य सरकारों को इसके बारे में जनता को सूचना देने और कानून के बारे में सही जानकारी देने की जरूरत है.
First published: December 17, 2019, 9:26 AM IST
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