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सांप्रदायिक शांति और धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रताड़ना से बचाने के लिए अंबेडकर ने की थी जनता की अदला-बदली की सिफारिश

Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor | News18Hindi
Updated: December 20, 2019, 3:51 PM IST
सांप्रदायिक शांति और धार्मिक अल्पसंख्यकों को प्रताड़ना से बचाने के लिए अंबेडकर ने की थी जनता की अदला-बदली की सिफारिश
बाबा साहब का ये साफ मानना था कि अगर धार्मिक आधार पर दो देशों का निर्माण होता है, तो फिर जनसंख्या की अदला-बदली भी होनी चाहिए.

सवाल ये उठता है कि आखिर जिन अंबेडकर को स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माता होने का गौरव हासिल है, उनके खुद के मन में धार्मिक अल्पसंख्यकों को लेकर क्या समाधान थे?

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  • Last Updated: December 20, 2019, 3:51 PM IST
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सांप्रदायिक आधार पर देश के विभाजन के सात दशक बाद भी न तो सांप्रदायिक वैमनस्य दूर हो पाया है और न ही धार्मिक अल्पसंख्यकों की समस्याएं दूर हो पाई हैं. देश के विभाजन के समय ही अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना की आशंका व्यक्त की गई थी, लेकिन सत्ता जल्दी पाने की होड़ में उन लोगों ने उस पर खास ध्यान नहीं दिया, जिन्हें सत्ता का बागडोर लेने की जल्दी थी. हालात ये बने हैं कि मोदी सरकार ने धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होने की स्थिति में अल्पसंख्यकों के लिए नागरिकता का प्रावधान किया है, तो अब पड़ोसी देशों से आने वाले मुस्लिमों को भी समान अधिकार देने की सियासत जोर पकड़ रही है. भारतीय संविधान के रचयिता डॉक्टर अंबेडकर को इसका अंदाजा आजादी के पहले ही हो गया था, लेकिन उन्होंने जो समाधान सुझाए, वो किसी को मंजूर नहीं हुआ.

लोकसभा के बाद कल राज्यसभा से भी पारित हो चुके नागरिकता संशोधन विधेयक को आज सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गई. चुनौती भी उसी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने दी है, जो 1947 में भारत विभाजन कर पाकिस्तान की स्थापना करने वाली पार्टी मुस्लिम लीग का अवशेष है. मजे की बात ये है जो मुस्लिम लीग कभी कांग्रेस को हिंदू पार्टी के तौर पर प्रचारित कर उसके खिलाफ अपना आंदोलन चलाती थी, मौजूदा दौर में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग उसी कांग्रेस पार्टी की अगुआई वाले केरल के सियासी मोर्चे यूडीएफ में प्रमुख सहयोगी है, जो फिलहाल वहां विपक्ष में है.

आईयूएमएल ने क्यों दी है विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

आईयूएमएल और उसके चार सांसदों की तरफ से विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में ये कहते हुए चुनौती दी गई है कि ये असंवैधानिक है और ये धार्मिक आधार पर भेदभाव करता है. आईयूएमएल सहित विपक्ष की ज्यादातर पार्टियों ने संसद के दोनों सदनों में ये कहते हुए विधेयक का विरोध किया था कि ये धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होकर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हिंदू, सिख, पारसी, जैन, ईसाई और बौद्ध समुदाय के लोगों को तो भारत की नागरिकता तत्काल देने का प्रावधान करता है, लेकिन मुस्लिमों के बारे में चुप है और इसलिए भेदभाव भरा है.



इसका जवाब देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कल ही साफ तौर पर कहा कि तीनों ही देश घोषित तौर पर इस्लामी देश हैं, ऐसे में वहां मुस्लिमों की धार्मिक आधार पर प्रताड़ना का सवाल नहीं उठता. इसलिए इस विधेयक में उनके बारे में कोई प्रावधान नहीं किया गया है, बल्कि उन देशों में अल्पसंख्यक का दर्जा रखने वाले जो लोग हैं, वो धार्मिक प्रताणना के कारण अगर भारत आए हैं, तो उनकी समस्याओं को दूर करने के लिए है. शाह के मुताबिक ये बिल किसी के साथ भेदभाव करने के लिए नहीं है, बल्कि उन विशेष लोगों की समस्याओं को सुलझाने के लिए है, जो तीनों पड़ोसी इस्लामी देशों में प्रताड़ना का शिकार होकर भारत आने को मजबूर हुए हैं. लेकिन अमित शाह की ये बात न विपक्ष को मंजूर हुई और न ही उन तमाम लोगों को, जो देश में अल्पसंख्यकों की सियासत करते हैं और इसीलिए अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं.

धार्मिक अल्पसंख्यकों की समस्या पर राजनीति को लेकर हैं तमाम सवाल

साफ है कि आजादी के सात दशक बाद धार्मिक अल्पसंख्यकों से जुड़ी इस समस्या को लेकर तेज होती राजनीति कई सवाल खड़े करती है. विधि की विडंबना ये है कि जो मुस्लिम लीग धार्मिक आधार पर मुसलमानों के लिए अपना देश पाकिस्तान का आंदोलन चलाकर भारत का विभाजन कराने के लिए जिम्मेदार रही, उसी के बचे-खुचे भारतीय अंश के तौर पर मशहूर पार्टी आईयूएमएल ये कह रही है कि पाकिस्तान में तो अब हजारा, शिया और अहमदिया मुसलमान भी धार्मिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं, उनका क्या. जो भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमानों के लिए ड्रीमलैंड था, वो तो अब तहस-नहस हो गया है और अब वहां से भारत का रुख करने वाले मुसलमानों को भी भारत की नागरिकता बाकी अल्पसंख्यकों की तरह तत्काल क्यों नहीं दी जाए, इसकी बात की जा रही है.

जिस पार्टी ने हिंदू बहुल हिंदुस्तान में साथ रहने पर मुसलमान गुलामी को मजबूर हो जाएंगे, ये भय दिखाते हुए पाकिस्तान की मांग की, उसी विचारधारा से प्रेरित रहे लोगों को अब हिंदुस्तान की नागरिकता हासिल करने की ललक जाग उठी है. जो लोग हिंदुस्तान छोड़कर अपने सपनों के देश पाकिस्तान में गए थे, क्या कल वो भी भारत लौटने की मांग और फिर बाकियों की तरह अपने लिए भी नागरिकता की मांग नहीं करेंगे, कौन जानता है! हो सकता है, जो पार्टियां नागरिकता संशोधन बिल का संसद में विरोध करती रही हैं, कल वही इन लोगों की घर वापसी की भी मांग कर डालें!

सवाल ये उठता है कि आखिर जब 1945-47 के आसपास अलग पाकिस्तान की मांग जोर पकड़ रही थी और मुस्लिम समाज के लोग आंख मूंदकर मुस्लिम लीग को अपना रहनुमा मानते हुए उसे ज्यादातर मुस्लिम निर्वाचक मंडल वाली सीटों से जीता रहे थे, उस वक्त किसी ने ये सोचा नहीं था कि अगर देश का विभाजन धार्मिक आधार पर होगा, तो फिर नए बनने वाले पाकिस्तान और हिंदुस्तान में अल्पसंख्यकों की क्या हालत होगी और क्या वहां उनके साथ भेदभाव नहीं होगा? ये सवाल वाजिब थे, इसका अंदाजा सात दशक बाद भी लग रहा है जब पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक लगातार कम हो रहे हैं और भारत में अल्पसंख्यक मुस्लिमों की आबादी लगातार बढ़ने के बावजूद उनकी सियासत करने वाली पार्टियां उनके साथ भेदभाव होने का आरोप लगाती फिरती हैं.

बाबासाहेब अंबेडकर के मन भी थे यही सवाल

दरअसल ये सवाल आम लोगों के साथ जिन महत्वपूर्ण लोगों के मन में उठे थे, उनमें से एक बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भी थे. उन्होंने विभाजन की स्थिति में हिंदुस्तान और पाकिस्तान में क्या हालात बनेंगे  और क्या होगी वहां अल्पसंख्यकों की हालत, उसका सटीक अंदाजा लगा लिया था. उसका समाधान भी उनके मन में था, लेकिन वो समाधान उन लोगों को नहीं जंचा, जिनके हाथ में देश की बागडोर आई.

सवाल ये उठता है कि आखिर जिन अंबेडकर को स्वतंत्र भारत के संविधान के निर्माता होने का गौरव हासिल है, उनके खुद के मन में धार्मिक अल्पसंख्यकों को लेकर क्या समाधान थे. आज के दौर में अंबेडकर का नाम लेकर अपनी राजनीति चमकाने वाले लोगों को शायद उनकी ये राय जानकर झटका लग जाए और वो उस राय से पूरी तरह किनारा करने को मजबूर भी हो जाएं.

इस मामले पर क्या रहे डॉ. अंबेडकर के विचार

डॉक्टर अंबेडकर के विचार इस मामले में बहुत साफ तौर पर लिपिबद्ध हैं. उनका ये साफ मानना था कि अगर धार्मिक आधार पर दो देशों का निर्माण होता है, तो फिर जनसंख्या की अदला-बदली भी होनी चाहिए. यानी जिस देश में जो बहुसंख्यक है, वहां दूसरे देश से उन लोगों को स्थानांतरित कर देना चाहिए, जहां वो लोग अल्पसंख्यक हैं. अगर साफ शब्दों में कहा जाए तो डॉक्टर अंबेडकर इस हक में थे कि पाकिस्तान से हिंदू पूरी तरह भारत में स्थानांतरित कर दिए जाएं और हिंदुस्तान से मुसलमान पाकिस्तान में. उनका बहुत साफ तौर पर मानना था कि अगर ऐसा नहीं होता है तो सांप्रदायिक समस्या कभी हल ही नहीं होगी.

आज की राजनीति के मौजूदा दौर में बाबासाहेब की ये बातें अप्रिय लग सकती हैं, लेकिन जो आशंकाएं उन्होंने जताई थीं, वो निर्मूल नहीं साबित हुई हैं. बल्कि दुर्भाग्य से पूरी तरह सच साबित हुई हैं. चूंकि बातें उन्होंने बिना लाग-लपेट के की थीं, इसलिए उन्हीं के शब्दों में इसे समझना बेहतर होगा. जनसंख्या की अदला-बदली वाले उनके विचार पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन नामक उस पुस्तक का हिस्सा हैं, जो खुद भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने प्रकाशित की है. संयोग की बात ये है कि इस पुस्तक के कई संस्करण निकले हैं, एनडीए शासनकाल में इसकी योजना बनी थी, जो यूपीए के दौर में कार्यान्वित हुई, मेनका गांधी से लेकर कुमार शैलजा तक ये सिलसिला जारी रहा.

पुस्तक के पृष्ठ 100 से 103 के बीच डॉक्टर अंबेडकर के विचार इस मामले में इस प्रकार दर्ज हैं-

कुछ लोग जनता की अदला-बदली के विचार का उपहास करते हैं. परंतु उपहास करने वाले लोग यह कतई नहीं समझते कि अल्पसंख्यकों की समस्या के कारण कितनी जटिलताएं उठ खड़ी होती हैं और उनकी रक्षा के लिए किए जाने वाले सभी प्रयास किस तरह असफल हो जाते हैं. युद्धोतर बने राज्यों और यूरोप के पुराने राज्यों में भी जहां अल्पसंख्यकों की समस्या थी, संविधानों में यह मानकर प्रावधान किए गए कि ऐसे संरक्षण उनकी रक्षा के लिए पर्याप्त होंगे. इसलिए सभी नए राज्यों के बहुसंख्यकों और अल्पसंख्यकों वाले संविधानों में उनके मौलिक अधिकारों और संरक्षणों की एक लंबी सूची लगा दी गई जिससे यह सुनिश्चित किया जाना था कि बहुसंख्यक उनका उल्लंघन नहीं करेंगे.

परंतु अनुभव क्या बताता हैअनुभव से पता चला कि संरक्षणों से अल्पसंख्यकों की रक्षा नहीं हुई. अनुभव से यह भी पता चला कि अल्पसंख्यकों के विरुद्ध एक क्रूरतापूर्ण युद्ध छेड़ देने से भी समस्या हल नहीं हुई. तब ये राज्य इस बात पर सहमत हो गए कि समस्या का सर्वोतम हल यही है कि अपनी-अपनी सीमाओं में ही अपने से भिन्न अल्पसंख्यकों की अदला-बदली कर लें और अपनी सीमाओं में परिवर्तन न करें, ताकि समजातीय राज्य बन सकें. तुर्की, यूनान और बुल्गारिया में यही हुआ. जो जनसंख्या के तबादले का उपहास करते हैं उनके लिए यह अच्छा होगा कि तुर्की, यूनान और बुल्गारिया के अल्पसंख्यकों की समस्या के इतिहास का अध्ययन करें. यदि वे इसका अध्ययन करेंगे तो उन्हें इस बात का पता चलेगा कि अल्पसंख्यकों की समस्या का एकमात्र प्रभावकारी हल जनसंख्या की अदला-बदली ही है. इन तीन देशों ने जो काम अपने हाथ में लिया, वह कोई मामूली काम नहीं था. इसमें लगभग दो करोड़ लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना था. किंतु बिना हिम्मत हारे हुए इन तीनों ने यह काम पूरा कर दिखाया, क्योंकि उन्हें लगा कि सांप्रदायिक शांति स्थापित करने का काम अन्य सब कामों से अधिक महत्वपूर्ण है.

पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन नामक पुस्तक के अंश.


यह बात निश्चित है कि सांप्रदायिक शांति स्थापित करने का टिकाऊ तरीका अल्पसंख्यकों की अदला-बदली ही है. यदि यही बात है तो फिर यह व्यर्थ होगा कि हिंदू और मुस्लिम संरक्षण के ऐसे उपाय खोजने में लगे रहें जो इतने असुरक्षित पाए गए हैं. यदि यूनान, तुर्की और बुल्गारिया जैसे सीमित साधनों वाले छोटे-छोटे देश भी यह काम पूरा कर सके, तो यह मानने का कोई कारण नहीं कि हिंदुस्तानी ऐसा नहीं कर सकते. फिर यहां तो बहुत कम जनता की अदला-बदली करने की आवश्यकता पड़ेगी, और चूंकि कुछ ही बाधाओं को दूर करना है, इसलिए सांप्रदायिक शांति स्थापित करने के एक निश्चित उपाय को न अपनाना अत्यंत उपहास्यास्पद होगा.

आलोचना के एक मुद्दे का अब तक उल्लेख नहीं किया गया है. चूंकि यह बात उठाई जा सकती है, इसलिए मैं यहां इसकी चर्चा करना चाहूंगा. यह निश्चित रूप से पूछा जाएगा कि हिंदुस्तान में बच रहे मुस्लिमों के बारे में पाकिस्तान क्या करेगा? यह प्रश्न स्वाभाविक है क्योंकि पाकिस्तान की योजना में बहुसंख्यक मुस्लिमों की चिंता तो की गई है, परंतु उन मुस्लिम अल्पसंख्यकों की उपेक्षा कर दी गई है जिन्हें वास्तव में संरक्षण की आवश्यकता है. परंतु मुद्दा यह है कि यह प्रश्न कौन उठाएहिंदू तो निश्चित रूप से नहीं उठाएंगे. केवल पाकिस्तान या हिंदुस्तान के मुस्लिम इसे उठा सकते हैं. यह प्रश्न पाकिस्तान के मुख्य समर्थक श्री रहमत अली से किया गया था और उन्होंने इस प्रश्न का निम्नलिखित उत्तर दिया:

पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन नामक पुस्तक के अंश.


खास हिंदुस्तान में रहने वाले 4.5 करोड़ मुसलमानों की स्थिति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? सच्चाई यह है कि इस संघर्ष में उनके बारे में हम बहुत चिंतित हैं. वे हमारा ही खून हैं, हमारी ही आत्मा हैं. न हम उन्हें भूल सकते हैं और न ही वे हमें. उनकी वर्तमान स्थिति और भावी सुरक्षा हमारे लिए अत्यधिक महत्व की है और भविष्य में भी बनी रहेगी. वर्तमान स्थिति खराब नहीं होगी. जनसंख्या के आधार पर चार हिंदुओं के पीछे एक मुसलमान विधानसभाओं में होगा और प्रशासनिक क्षेत्र में उनका उतना ही प्रतिनिधित्व बना रहेगा, जितना कि आज मिला हुआ है. भविष्य में जो एकमात्र गारंटी हम उन्हें दे सकते हैं, वह है परस्पर आदान-प्रदान की। इसलिए हम सच्चे दिल से यह प्रतिज्ञा करते हैं कि पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों को वे सब सुरक्षा प्रदान करेंगे जो पाकिस्तान में मुसलमानों को मिलेंगी.

परंतु जो बात हमें सबसे अधिक बल प्रदान करती है, वह यह कि वे जानते हैं कि पाकिस्तान की घोषणा मिल्लतके सर्वोत्तम हित में है. यह जितनी हमारे हित में है, उतनी ही उनके हित में. जहां हमारे लिए यह एक राष्ट्रीय किले के समान होगी, वहीं उनके लिए नैतिक लंगर का काम करेगी. जब तक यह लंगर टिका रहेगा, सब कुछ सुरक्षित रहेगा या सुरक्षित बनाया जा सकेगा. पर यदि लंगर ही टूट गया तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा.

पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन नामक पुस्तक के अंश.


हिंदुस्तान के मुस्लिमों ने इस प्रश्न का जो उत्तर दिया है, वह भी काफी स्पष्ट है. उनका कहना है- मुस्लिमों का पाकिस्तान और हिंदुस्तान में बंटवारा कर देने से हम कमजोर नहीं होंगे, हम हिंदुस्तान की पश्चिमी और पूर्वी सीमाओं पर अलग इस्लामी देश बन जाने से अधिक सुरक्षा का अनुभव करेंगे बजाए इसके कि वे हिंदुस्तान में आत्मसात कर लिए जाएं.कौन कह सकता है कि वे गलत हैं? क्या यह नहीं देखा जा चुका है कि जर्मनी अपने यहां रहने वाले सुडेटेन जर्मनों की अपेक्षा चेकोस्लोवाकिया में रहने वाले सुडेटेन जर्मनों की बेहतर सुरक्षा कर सका?* (*ऐसा लगता है कि मुस्लिम लीग ने सुडेटेन जर्मनों के हितों की रक्षा के लिए चेकोस्लोवाकिया के विरुद्ध जर्मनी की धौंसपट्टी के तरीकों का गहराई से अध्ययन किया है और यह भी सीखा है कि इन तरीकों से क्या सबक मिलता है. कराची अधिवेशन, 1937 में दिए गए लीग के धमकी भरे भाषण इस बारे में दृष्टव्य हैं)

जो भी हो, यह प्रश्न हिंदुओं के लिए चिंता का विषय नहीं है. हिंदुओं के लिए चिंतनीय प्रश्न यह है कि पाकिस्तान बनने से हिंदुस्तान में सांप्रदायिक समस्या किस हद तक सुलझेगी. यह बहुत उचित प्रश्न है, और इस पर विचार करना चाहिए. यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि पाकिस्तान बनने से हिंदुस्तान सांप्रदायिक समस्या से मुक्त नहीं हो जाएगा. सीमाओं का पुनर्निर्धारण करके पाकिस्तान को तो एक सजातीय देश बनाया जा सकता है, परंतु हिंदुस्तान तो एक मिश्रित देश बना ही रहेगा. मुसलमान समूचे हिंदुस्तान में छितरे हुए हैं- यद्यपि वे मुख्यतया शहरों और कस्बों में केंद्रित हैं. चाहे किसी भी ढंग से सीमांकन की कोशिश की जाए, उसे सजातीय देश नहीं बनाया जा सकता. हिंदुस्तान को सजातीय देश बनाने का एकमात्र तरीका है जनसंख्या की अदला-बदली की व्यवस्था करना. यह अवश्य विचार कर लेना चाहिए कि जब तक ऐसा नहीं किया जाएगा, हिंदुस्तान में बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक की समस्या और हिंदुस्तान की राजनीति में असंगति पहले की तरह बनी ही रहेगी.

पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन नामक पुस्तक के अंश.


डॉक्टर अंबेडकर ने ये सुझाव देश की आजादी के साथ ही सांप्रदायिक आधार पर हुए विभाजन के दो साल पहले दिया था. उनके इन विचारों से उस समय भी कई लोग अप्रसन्न हुए थे, लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की थी. उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि उनके ये विचार पूर्वाग्रह से मुक्त रहे हैं और इसके जरिये उन्होंने वास्तविक चित्र प्रस्तुत करने की कोशिश की है.

जाहिर है, बाबासाहेब के इन विचारों पर न तो उनके समकालीनों ने ध्यान दिया और न ही आज के दौर में, जब उनकी तमाम आशंकाएं सही साबित हुई हैं, उनके नाम की माला जपने वाले भी उनकी राय से शायद ही सहमत होंगे. लेकिन डॉक्टर अंबेडकर ने जो बातें कहीं थीं, वो पूरी तरह सही साबित हुई हैं. न तो भारत में सेक्युलरिज्म की माला जपने वाली पार्टियां देश में सांप्रदायिक समस्या को खत्म कर पाई हैं और न ही मिल्लत के सर्वोत्तम हित में बने पाकिस्तान ने अल्पसंख्यकों की रक्षा की है. बल्कि हालात तो ये हैं कि अगर भारत सरकार अनुमति दे दे तो पूरा पाकिस्तान एक दिन में खाली हो जाए, वो भी भारत आने के लिए मचल पड़ेंगे, जो अपने सपनों के देश के लिए 1947 में हिंदुस्तान को अलविदा कह पाकिस्तान चले गए थे. जो कभी हिंदुस्तान के मुसलमानों के लिए अपने को लंगर बता रहा था, आज वो लंगर तो दूर, उस लंगर को पकड़े लोग, भारत आने का सपना देख रहे हैं.

आईयूएमएल की सुप्रीम कोर्ट में याचिका खुद उस सोच के मुंह पर भी तमाचा है, जिसने मुस्लिमों के लिए अलग देश पाकिस्तान का निर्माण कराया और अब हिंदुस्तान में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आने वाले हिंदू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी लोगों की तर्ज पर मुस्लिमों के लिए भी फटाफट नागरिकता की मांग कर रहे हैं, वो भी सपनों के देश में ही सताए जाने की बात कहकर.

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First published: December 12, 2019, 5:36 PM IST
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स्रोत: स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत सरकार
अपडेटेड: April 09 (05:00 PM)
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स्रोत: जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी, U.S. (www.jhu.edu)
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