दुनिया की एक बटे छह आबादी और सिर्फ 4 फीसदी पानी! जानें कैसे जोखिम में है भारत

#MISSIONPAANI: भारत में हीटवेव लगातार बढ़ रही है तो जलसंकट का बढ़ना स्वाभाविक है. इस साल भूमिगत जलस्तर में 54 फीसदी की गिरावट दर्ज की जा चुकी है. मानसून के लिहाज़ से ये साल सूखा जा रहा है. जानें क्या होंगे देश और दुनिया के हालात.

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Updated: July 8, 2019, 6:49 PM IST
दुनिया की एक बटे छह आबादी और सिर्फ 4 फीसदी पानी! जानें कैसे जोखिम में है भारत
जलसंकट के लिए प्रतीकात्मक तस्वीर.
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Updated: July 8, 2019, 6:49 PM IST
एक तरफ मुंबई में भारी बारिश की खबरें हैं, तो वहीं, दिल्ली और उसके आसपास के बीते शुक्रवार को हल्की बौछारों के अलावा बारिश के आंकड़े तकरीबन शून्य ही रहे हैं. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, बिहार और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों सहित उत्तर और मध्य भारत के कई हिस्सों में अब भी पूरे मानसून का इंतज़ार ही चल रहा है. तमाम आंकडों के लिहाज़ से अब तक ये साल भारत में मानसून के अभाव का साल है. पिछले पांच हफ्तों में दिल्ली में औसत से 90 फीसदी कम बरसात हुई है.

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आम तौर से जून से सितंबर तक मानसून का मौसम माना जाता है और पूरे मौसम की 17 फीसदी बारिश जून में हो जाती है, लेकिन इस साल जून के महीने में 50 फीसदी कम बारिश हुई. ज़ाहिर तौर पर, किसानों के लिए ये चिंता और मुसीबत का कारण है क्योंकि भारत में कृषि ज़्यादातर बारिश पर ही निर्भर है. दूसरी ओर, देश में इस साल भीषण गर्मी का मौसम लंबा खिंच चुका है.

पर्यावरण से जुड़े पत्र डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक इस साल 1 मार्च से पहले 100 दिनों के भीतर देश के 22 राज्यों में 70 से ज़्यादा हीट वेव चरण देखे गए. केवल बिहार में ही 200 लोग मारे गए और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में भी गर्मी से मौतों की खबर आई. वहीं, मौसम विभाग की मानें तो पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भी सामान्य से 5.1 डिग्री सेल्सियस ज़्यादा तापमान बना हुआ है.

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ज़्यादा प्रभावित होगा दक्षिण एशिया
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मौसम विभाग के डेटा के मुताबिक देश के कई हिस्सों में सामान्य से 3 से 5 डिग्री तक ज़्यादा तापमान हुआ है. वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले सालों में क्लाइमेट चेंज के कारण भारत जैसे देशों को और भीषण गर्मी से जूझना होगा. साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक दक्षिण एशिया के घने बसे कृषि क्षेत्रों के लोग भीषण गर्मी की चपेट में बाकियों की तुलना में ज़्यादा आएंगे.

इस रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि कैसे भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देश इस मामले में संवेदनशील हैं. इस रिपोर्ट के तथ्यों को व्यावहारिक अध्ययन से मिला डेटा भी पुष्त करता है. सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की वेबसाइट पर उपलब्ध डेटा के मुताबिक 2010 से 2016 के बीच देश में हीटवेव की कुल 178 पारियां थीं जबकि केवल 2017 में ही 524 और 2018 में 484 हो गईं. यानी कुछ सालों से गर्मी का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है.

भारत के लिए खतरनाक होगा आने वाला कल!
हीटवेव के साथ जलसंकट का बढ़ना स्वाभाविक है. इस साल भूमिगत जलस्तर में 54 फीसदी की गिरावट दर्ज की जा चुकी है. केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक जून में 90 रिज़र्वायरों में 20 फीसदी से भी कम पानी पाया गया. चेन्नई की तरह कुछ और जगह तो ये पूरी तरह सूखे हुए पाए गए. ये किसानों और आम लोगों के जीवन के लिए कतई अच्छी खबर नहीं है.

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इस साल भूमिगत जलस्तर में 54 फीसदी की गिरावट दर्ज की जा चुकी है.


दुनिया भर की रिपोर्टें देखी जाएं तो साफ कहा जा रहा है कि ग्लोबल वॉर्मिंग से सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले देशों में भारत शामिल है. पूरी दुनिया की ज़मीन का ढाई फीसदी और दुनिया भर के पानी का 4 फीसदी हिस्सा भारत के खाते में है, जबकि दुनिया की आबादी का 17 फीसदी हिस्सा है, ऐसे में भारत में खतरनाक होते मौसम परिवर्तन से देश के सामने बड़ी चुनौतियां खड़ी होने वाली हैं.

दुनिया भर में गर्मी की मार
साइंस एडवांसेज़ की रिसर्च में कहा गया है कि इस पूरे परिदृश्य का असर देश के लोगों की सेहत पर बुरी तरह पड़ सकता है. भारत के अलावा, दुनिया के दूसरे देश भी भीषण गर्मी से जूझ रहे हैं, जिनमें कुवैत और अरब देशों का नाम शामिल है. यहां इस साल जून के महीने में पारा 55 डिग्री के स्तर को पार कर चुका है. फ्रांस में 45 डिग्री तापमान रह चुका है. अमेरिका, यूके और यूरोप के कई इलाकों में हज़ारों की संख्या में छात्रों ने जुटकर सरकारों से क्लाइमेट चेंज को लेकर आपातकालीन एक्शन लेने की मांग भी की.

और कार्बन उत्सर्जन के आंकड़े
दूसरी ओर, अगर अमेरिका या यूरोपीय देशों की तुलना में देखा जाए तो प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन भारत में कम है, लेकिन कुल मिलाकर कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है. पूरी दुनिया में कार्बन उत्सर्जन की 70 फीसदी बढ़ोत्तरी के लिए सिर्फ 10 देश ज़िम्मेदार हैं. कुल कार्बन उत्सर्जन के 50 फीसदी के लिए ज़िम्मेदार चार देशों में भारत भी शामिल है.

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कुल कार्बन उत्सर्जन के 50 फीसदी के लिए ज़िम्मेदार चार देशों में भारत भी शामिल है.


हालांकि भारत ने इस दिशा में कुछ प्रयास शुरू किए हैं. पिछले साल, आईपीसीसी की स्पेशल रिपोर्ट में चेतावनी दी जा चुकी थी कि अगर दुनिया भर में जल्द आपात और ज़रूरी कदम नहीं उठाए गए तो अगले 10 से 12 सालों में ग्लोबल वॉर्मिंग के भयानक परिणाम देखने होंगे. साइंस एडवांसेज़ की रिसर्च में भी साफ कह दिया गया है कि ऐसी स्थिति में सबसे ज़्यादा दक्षिण एशिया प्रभावित होगा. अब ये ज़ाहिर है कि ऐसा होगा तो भारत पर ही सबसे ज़्यादा असर पड़ेगा.

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First published: July 8, 2019, 6:49 PM IST
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