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Climate change समझने में पुरातन संकेत करेंगे मदद, बेहतर होगा पूर्वानुमान

Climate change समझने में पुरातन संकेत करेंगे मदद, बेहतर होगा पूर्वानुमान

पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण अचानक होने वाले बदलावों का अभी सही अनुमान नहीं लग पता है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण अचानक होने वाले बदलावों का अभी सही अनुमान नहीं लग पता है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के अध्ययन में जलवायु प्रतिरूपों (Climate Models) की बहुत अहम भूमिका है, लेकिन अभी तक ऐसे मॉडल के लिए पर्याप्त आंकड़े उपलब्ध नहीं हो सके हैं जिससे इनके नतीजे बहुत ही सीमित हो जाते हैं और सटीक भी नहीं रह पाते है. इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने दर्शाया है कि कैसे ऐतिहासिक जलवायु जानकारी (Ancient Climate Information) को जोड़ने से यही प्रतिरूप बेहतर नतीजे दे सकते हैं और उन अचानक होने वाली घटनाओं की सही अनुमान लगाने में भी मददगार हो सकते हैं जो जलवायु परिवर्तन से निपटने में काफी कारगर साबित हो सकती हैं.

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    इस समय दुनिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से निपटना है. पिछले कुछ दशकों में इसका प्रकोप ज्यादा देखने को मिल रहा है. लेकिन पृथ्वी के जलवायु परिवर्तन नया नहीं हैं. इससे पहले भी पृथ्वी (Earth) में कई बार जलवायु परिवर्तन देखने को मिले हैं. अगर कुछ नया है तो वो यह है कि इस बार जलवायु परिवर्तन में मानवीय गतिविधियां भी एक प्रमुख कारक हैं. एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने दर्शाया है कि अभी तक हुए जलवायु उच्चतम बिंदु (Climate tipping points) क पुराने जलवायु परिवर्तन के आंकड़ों के जरिए बेहतर तरीके समझा जा सकता है और उसका पूर्वानुमान भी लगाया जा सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)
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    जलवायु के ये उच्चतम बिंदु (Climate Tipping Points) वे स्थितियां कहलाती हैं जिनके आने के बाद बदलाव को पलटा नहीं जा सकता है. जैसे ग्रीनलैंड (Greenland) में बर्फ इतनी ज्याद पिघल जाए कि उसके बाद वर्तमान मौसमी परिवर्तनों (Seasonal Changes) में फिर वहां उतनी बर्फ का वापस आना संभव ही ना रह जाए. फिलहाल वैज्ञानिकों को पास इस तरह के टिंपिंग प्वाइंट्स की समझ बहुत कम है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इस तरह की घटनाएं हाल की पिछले समय में घटित नहीं हुई हैं ना ही वैज्ञानिकों के पास इस तरह की घटनाओं का कोई रिकॉर्ड है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)
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    अभी तक जो पृथ्वी (Earth) के तंत्र के मॉडल (Climate Models) जलवायु का अनुमान लगाने के लिए उपयोग में लाए गए हैं, उन्हें हमारे ग्रह के वातावरण (Environment) को आकार देने वाली भैतिक, रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं को हमारी समझ के आधार पर बनाया गया है. वैज्ञानिक जानते हैं कि ये मॉडल पूरी और सही तस्वीर पेश नहीं कर पाते क्योंकि ये पुरानी जलवायु घटनाएं सिम्यूलेट करने में नाकाम हो जाते हैं. ऐसे में उनसे यह उम्मीद करना की वे भविष्य की भी सही और सटीक जानकारी देंगे, सही नहीं होगा. इसलिए शोधकर्ताओं ने इन प्रतिरूपों को मजबूत करने कि दिशा में काम करने का प्रयास किया. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)
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    प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित इस अध्ययन में बर्मिंघम और ब्रिसट्ल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने दर्शाया है कि हजारों साल पुराने जलवायु (Climate) पुनर्निर्माण की जानकारी कैसे पृथ्वी (Earth) के तंत्र वाले सभी मॉडल को सही कर सकती है जिससे हमें जलवायु तंत्र की सीमाओं की सही समझ हो सके. इस अध्ययन के वरिष्ठ लेखक और बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ ज्योग्राफी, अर्थ एंड एनवायर्नमेंटल साइंसेस के डा पीटर होपक्राफ्ट का कहना है की जलवायु प्रतिरूपण (Climate Modelling) ही वह अकेला तरीका है जिससे हमें भविष्य के जलवायु परिवर्तन का अनुमान लगा सकते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)
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    जब इन मॉडल (Climate Modelling) को विकसित किया जाता है, तब उन्हें केवल पिछले 150 सालों के मौसम के अवलोकनों के आधार पर आंकलित किया जाता है. इसका मतलब यह है कि हमारे पास यह है कि हमारे पास उनके सक्षम अचानक होने वाले बदलावों के अनुमानों की पुष्टि करने का कोई तरीका नहीं है, जिनका जोखिम हमारी पृथ्वी (Earth) के गर्म होने से बढ़ता जा रहा है. गहरे इतिहास से पुरातन जलवायु (Ancient Climate) के अचानक आए जलवायु बदालव के रिकॉर्ड से हम इस समस्या से उबर सकते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)
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    इस अध्ययन में शोधकर्ताओं की टीम ने एक प्रमुख उदाहरण पर ध्यान दिया. सहारा (Sahara) क्षेत्र का हरित होने के बाद वहां तेजी से मरुस्थलीकरण (Desertification) होना जो मध्य होलोसीन काल में, यानि 6 हजार साल पहले हुआ था. एक विशेष जलवायु प्रतिरूप (Climate Model) में जीवाश्म परागों और अवसादों के रिकॉर्ड के आंकड़ों को डालने से शोधकर्ता यह दर्शाने में सफल सके कि कैसे मॉडल साहारा को सवाना में बदल जाने का अनुमान लगा सकता है. जिसे पौधे का क्षेत्र बढ़ गया. झीलों का विस्तार हो गया और सबसे अहम वर्षा बढ़ गई. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)
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    इसके नतीजों की फिर स्वतंत्र रूप से इलाके के उन समुद्री अवसादों के रिकॉर्ड के अध्ययनों से तुलना की गई. इससे पता चला कि कैसे मॉडल (Climate Model) ने सहारा के तेजी से रेगिस्तान (Desert) बनने के हालात को समझ सका. डॉ होपक्रॉफ्ट का कहना है, “अब हमें इन पद्धतियों को दूसरे प्रतिरूपों पर लागू करने की जरूरत है. लेकिन यह दर्शा कर कि पुरातन जलवायु (paleoclimate) की जानकारी इस लिए किया जा सकता है कि हमारे प्रतिरूपों को पिछले अचानक होने वाले जलवायु परिवर्तन के लिहाज से बेहतर सिम्यूलेट कर सकती है. अब हम उम्मीद कर सकते हैं कि हम भविष्य के अचानक होने वाली घटनाओं का बेहतर विश्वास के साथ अनुमान लगा सकते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    Tags: Climate Change, Earth, Environment, Research, Science

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