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climate change global warming can exceed one and half degree celsius within 5 year viks

5 साल में ही डेढ़ डिग्री सेंटीग्रेड तक गर्म हो सकती है दुनिया- रिपोर्ट

ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के कारण दुनिया का तापमान नए रिकॉर्ड बना सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के कारण दुनिया का तापमान नए रिकॉर्ड बना सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

संयुक्त राष्ट्र (United Nations) के विश्व मौसम विज्ञान संगठन (world meteorological organization) की सालाना अपडेट रिपोर्ट में बताया गया है कि इस बात की आधी आधी संभावना है कि वैश्विक औसत तापमान वृद्धि साल 2022 से 2026 के बीच के किसी साल में ही 1.5 डिग्री सेल्सियस को पार कर जाएगी. और तेजी से हो रहे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के कारण इस दौरान गर्मी के नए रिकॉर्ड भी बन जाएंगे.

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    पिछले कुछ सालों से पर्यावरण के लिए ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) एक चिंताजनक विषय बना हुआ है. पेरिस समझौते (Paris Agreement) में गर्म होती पृथ्वी के औसत तापमान को नीचे बकरार रखने के लिए एक लक्ष्य तय हुआ था. औद्योगिक क्रांति काल के औसत तापमान की तुलना में वर्तमान औसत तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से काफी (संभव हो ते 1.5 डिग्री से भी) नीचे रखने का लक्ष्य रखा गया है. लेकिन हाल ही संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की एक नई रिपोर्ट ने चेताया है कि 1.5 डिग्री की सीमा तो अगले पांच साल में पार हो सकती है.

    खतरे में पेरिस समझौते के लक्ष्य
    साल 2015 में पेरिस समझौते में में तय किए गए तापमान वृद्धि को नियंत्रित करने के लक्ष्यों में बदलाव करने के प्रयास पिछले साल ग्लासगो में हुए जलवायु सम्मेलन में किए गए थे लेकिन इन लक्ष्यों में कायम रखने पर ही सहमति बन सकी. अब संयुक्त राष्ट्र की विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने अपने वार्षिक जलवायु अपडेट में कहा है कि संभावना है कि वैश्विक सतह के पास के तापमान पूर्व औद्योगिक काल से 1.5 डिग्री ज्यादा की वृद्धि  2022 स 2026 के किसी भी साल में होने की आधी आधी संभावना बन गई है.

    टूट सकता है 2016 का रिकॉर्ड
    डब्ल्यूएमओ ने इस संभावना को 48 प्रतिशत रखा है और कहा है कि यह समय के साथ बढ़ रही है. इससे पेरिस समझौते की लक्ष्य टूट सकते हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस बात के 90 प्रतिशत संभावना है कि की 2022-2026 के बीच किसी एक साल में पृथ्वी 2016 के रिकॉर्ड को तोड़ कर सबसे ज्यादा गर्म हो सकती है.

    निचले लक्ष्य की ओर
    इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि साल 2022-2026 के बीच का पांच साल का औसत तपमान पिछले पांच साल (2017-2021) के औसत तापमान से ज्यादा होने की संभावना भी करीब 93 प्रतिशत है. डब्ल्यू एम ओ के प्रमुख पेटेरी तालास ने कहा कि यह अध्ययन दर्शाता है कि उच्च स्तर की वैज्ञानिक क्षमताओं के साथ हम अस्थायी तौर पर पेरिस समझौते के निचले लक्ष्य तक पहुंच रहे हैं.

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    पिछले कुछ सालों में तापमान वृद्धि (Temperature Rise) ज्यादा देखने को मिल रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    अभी से ही बढ़ रहा है तापमान
    तालास ने कहा कि 1.5 डिग्री सेंटीग्रेट का आंकड़ा कोई बेतरतीब संख्यिकीय आंकड़ा नहीं है. बल्कि यह तो एक सांकेतिक बिंदु है जो दर्शाता  कि जलवायु प्रभाव लोगों और यहां तक कि पूरे ग्रह के लिए तेजी से नुकसानदेह बनता जा रहा है. पेरिस समझौते के 1.5डिग्री का स्तर लंबे समय की वार्मिंग को दर्शाता है. लेकिन तात्कालिक बढ़ोत्तरी ही वैश्विक तापमान वृद्धि की आवृति को बढ़ा रहे हैं

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    अभी पेरिस समझौते की सीमा टूटी नहीं है
    इस रिपोर्ट की अगुआई करने वाले ब्रिटेन के मेट ऑफिस नेशनल वेदर सर्विस के लियोन हरमैंसन का कहना है कि केवल एक साल में ही 1.5 डिग्र के इजाफे का मतलब यह नहीं है कि हमने पेरिस समझौते की सीमा को लांघ दिया है. लेकिन यह रिपोर्ट यह जरूर बताती है कि हम इस सीमा पर पहले से उस हालात के और पास पहुंच रहे हैं जहां 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा का तापमान लंबे समय तक हो जाएगा.

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    साल 2021 में ला नीना (La Nina) की ठंडक का भी बढ़ते तापमान पर असर नहीं हुआ.
    (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    2021 का औसत तापमान
    गौर किया जाए तो हरमैनसन की दलील का आधार औसत शब्द में है. क्योंकि औसत तापमान की गणना के लिए कई सालों के समय को शामिल किया जाएगा जिसमें तापमान वृद्धि उतनी नहीं दिखेगी जितनी लग रही है. विश्व मौसम विज्ञान विभाग के ही आंकड़ों के मुताबिक साल 2021 में ही औसत तापमान पूर्व औद्योगिक क्रांत काल से 1.11 डिग्री सेंटिग्रेड ज्यादा था. रिपोर्ट में बताया है कि 2021 के शुरु और अंत में ला नीना की घटनाओं का वैश्विक तापमानों पर ठंडक का प्रभाव दिखा था. लेकिन ला नीना के प्रभाव से भी बढ़ते तापमान का चलन नहीं बदल सका.

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    ला नीना हर दो से सात सालों में मध्य और पूर्वी भूमध्य प्रशांतमहासागर की सतहों पर ठंडक के प्रभाव को कहा जाता है. यह गर्म करने वाले अल नीलो का विपरीत प्रभाव है. विश्व मौसम विज्ञान विभाग का कहना है कि अलनीनों की कोई भी घटना तापमान वृद्धि करने का काम करेगा जैसे कि साल 2016 में हुआ था. तालास का कहना है कि जब तक हम ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करते रहेंगे ऐसा ही चलता रहेगा.

    Tags: Climate Change, Global warming, Research, Science, United nations

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