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ग्रीनहाउस प्रभाव केवल पुरातन वायुमंडल को गर्म कर रहा था, महासागरों को नहीं

तीन से चार अरब साल पहले पृथ्वी (Earth) बहुत ज्यादा गर्म हुआ करती थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

पृथ्वी (Earth) पर 3 से 4 अरब साल पहले का वातावरण ग्रीन हाउस प्रभाव (Greenhouse Effect) के कारण बहुत गर्म था. लेकिन उनकी तब के महासागरों के गर्म करने में इनकी अधिक भूमिका नहीं थी.

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    दुनिया में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का असर साफ तौर पर दिखाई देने लगा है. इसमें ग्रीनहाउस प्रभाव (Greenhouse Effect) की अहम भूमिका है जो ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) का सबसे बड़ा कारण है. ग्रीन हाउस गैसों के कारण हमारा वायुमंडल ही नहीं बल्कि धरती और महासागर भी गर्म हो रहे हैं. लेकिन हाल में हुए एक शोध से पता चला है कि पुरातन पृथ्वी का वायुमंडल तो ग्रीन हाउस गैसों के कारण गर्म होता था, लेकिन ऐसा महासागरों के साथ नहीं हो पाया था.

    अरबों साल पुरानी गर्म पृथ्वी
    हाल ही में प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस में प्रकाशित अध्ययन ने इस विषय पर रोशनी डाली है. जर्मनी की कोलोग्ने यूनिवर्सिटी के डॉ डेनियल हरवर्ट्स, गोटिंगेन यूनिवर्सिटी के डॉ एंड्रियास पैक  और डेनमार्क की ऑरहोस यूनिवर्सिटी के डॉ थार्सटेन नेगल के इस शोध ने तीन से चार अरब साल पुरानी पृथ्वी के वातावरण के बारे में कई जानाकारियां निकाली हैं.

    कम चमका करता था तब सूरज
    उस समय पृथ्वी का तापमान बहुत ज्यादा हुआ करता था. तब कार्बन डाइऑक्साइड बहुत अधिक मात्रा में पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद थी. तब सूर्य आज की तुलना में 70 से 80 प्रतिशत ही चमकता था.  फिर भी तब पृथ्वी की जलवायु काफी गर्म थी  क्यों उस दौरान पृथ्वी पर कहीं ग्लेशियर वाली बर्फ नहीं थी. इस परिघटना को ‘पैराडॉक्स ऑफ द यंग वीक सन’ कहते हैं. वैज्ञानिकों में लंबे समय से यह शोध का विषय रहा है कि उस समय पृथ्वी को गर्म रखने वाली ग्रीन हाउस गैस कौन सी थी.

    पता लगाया कारण
    शोधकर्ताओं ने ना केवल इस सवाल का हल निकाला बल्कि यह भूवैज्ञानिक सवाल का भी जवाब निकाला है कि आखिर उस समय महासागरों के तापमान इतने ज्यादा क्यों थे. शोधकर्ताओं का कहना है कि उस समय कार्बन डाइऑक्साइड की उच्च मात्रा इसका जवाब हो सकती है. पृथ्वी विज्ञान में यह बड़ी बहस का विषय रहा है कि शुरुआती महासागरों में तापमान कैसा रहा करता था.

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    वैज्ञानिकों का कहना है कि कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) की बहुतायत मात्रा ही इनका कारण हो सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    कैसे मिले प्रमाण
    वैज्ञानिकों को इस बात के प्रमाण मिले के हैं कि 3-4 अरब साल पहले के महासागर बहुत गर्म हुआ करते थे. बहुत पुराने चूनापत्थर और सिलिका चट्टानों में ऑक्सीजन आइसोटोप का मापन इस बारे में जानकारी दे सकता है. यह एक तरह का जियो थर्मामीटर की तरह काम करता था. पता चला है कि समुद्री पानी का तापमान उस समय  70 डिग्री सेल्सियस हुआ करता था.

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    दो घटनाओं की व्याख्या
    इस अध्ययन के नए मॉडल्स दर्शाते हैं कि वायुमंडल उच्च कार्बन डाइऑक्साइड स्तर इसकी व्याख्या कर सकते हैं क्योंकि इसकी वजह से महासागरों की संरचना में भी बदलाव आ गया होगा. जेनियल हरवार्ट्स बताते हैं कि उच्च कार्बन डाइऑक्साइड दो परिघटनाओं की व्याख्या करते हैं. एक पृथ्वी का ग्रम वातावारण और दूसरा यह के समुद्री पानी के जियो थर्मामीटर उसे इतना गर्म क्यों दिखा रहे हैं.

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    उस समय पूरी पृथ्वी (Earth) समुद्री पानी से ढकी थी. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    महासागर गर्म क्यों
    हरवार्ट्स  का कहना है कि अगर समुद्री पानी के अलग-अलग ऑक्सीजन आइसोटोप के अनुपात को देखा जाए तो इससे केवल 40 डिग्री तक का तापमान बढ़ेगा. उस समय वायुमंडल में बहुत सी मीथेन के होने की संभावना भी हो सकती है. लेकिन उससे भी महासागारों की संरचना में कोई असर नहीं पड़ा होगा. इससे यह व्याख्या नहीं होती कि ऑक्सीजन जियो थर्मामीटर ज्यादा तापमान क्यों बता रहे हैं.

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    दोनों परिघटना की व्याख्या कार्बन डाइऑक्साइड के बहुतायत से ही हो सकती है. शोधकर्ताओं  का कहना है कि उस समय आज की वायुमंडल की समस्त गैसों के बराबर ऑक्सीजन की मात्रा रही होगी. पृथ्वी पर बाद में ये कार्बन डाइऑक्साइड खनिजों के रूप में जमा हो गई. महाद्वीपों का निर्माण काफी बाद में हुआ था जहां बहुत ज्यादा मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड जमा होती गई. वहीं महासागरों की रासायनिक संरचना आज की तुलना में बहुत अलग थी जिसकी वजह से संकेतक उस समय का तापमान ज्यादा दिखा रहे हैं.
    Published by:Vikas Sharma
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