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    Global Warming के कारण खत्म हुई ग्रेट बैरियर रीफ में मूंगे की आधी चट्टानें

    शोध के मुताबिक द ग्रैट बैरियर रीफ (Great Barrier Reef ) साल 1995 के बाद से आधा रह गया है.  (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)
    शोध के मुताबिक द ग्रैट बैरियर रीफ (Great Barrier Reef ) साल 1995 के बाद से आधा रह गया है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    ऑस्ट्रेलिया (Australia) के पास स्थित ग्रैट बैरियर रीफ (The Great Barrier Reef) की मूंगे की चट्टानें (Corals) पिछले 25 सालों में आधी रह गई हैं. शोध ने इसका सीधा संबंध ग्लोबल वार्मिंग से बताया है.

    • News18Hindi
    • Last Updated: October 15, 2020, 6:46 AM IST
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    इन दिनों पर्यावरण (Environment) पर हो रहे बहुत से शोध हमें ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) और जलवायु परिवर्तन (Climate change) से हो रहे नुकसान से अवगत करा रहे हैं. ध्रुवों से लेकर हिमालय तक की बर्फ तेजी से पिघलने लगी है जिससे महासागरों का जलस्तर बढ़ने लगा है तो वहीं बहुत से जीवों पर इन परिवर्तनों के कारण अस्तित्व तक का संकट आ गया है. ताजा शोध ने ग्रेट बैरियर रीफ (Great Barrier Reef) के बारे में एक बहुत निराशाजनक खबर सुनाई है.

    25 सालों में खत्म हुई आधी मूंगे की चट्टानें
    टाउन्सविले की ऑस्ट्रेलियाई रिसर्च काउंसिल के सेंटर फॉर कोरल रीफ स्टडीज के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया के पास स्थित दुनिया भर में प्रसिद्ध मूंगे की चट्टाने या कोरल रीफ ने पिछले 25 सालों में आधे मूंगे गंवा दिए हैं. इस अध्ययन में साल 1995 और साल 2017 के बीच के कोरल समुदाय का आंकलन किया और पाया कि छोटे, बड़े और विशाल मूंगे की चट्टानों में 50 प्रतिशत तक कि कमी आई है.

    ये है इस खात्मे की वजह
    इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता एंड्रियाज डाइटजेल ने बताया कि मूंगों के दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से खत्म होने की वजह इंसानी गतिविधियों के कारण पदा हुए जलवायु परिवर्तन हैं जिससे इनके लिए अनुकूल वातावरण को बुरी तरह से प्रभावित किया है.



    बढ़ता तापमान हुआ जानलेवा
    इस कारण के बारे में समझाते हुए डाइटजेल ने कहा, “हम साफ तौर पर देख सकते हैं कि कैसे बढ़ता तापमान इन मूंगे की चट्टानों के लिए जानलेवा साबित हुआ है और इससे ग्रेट बैरियर रीफ की ब्लीचिंग हो रही है.”

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    मूंगे की चट्टानों (Coral) के कम होने के पीछे की वजह पानी के तापमान (Temperature) का बढ़ना बताया जा रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    2020 के आंकड़ों को शामिल किए बिना है ये हाल
    डाइटजेल ने यह भी बताया कि इस अध्ययन में साल 2020 में हुई ब्लीचिंग के प्रभाव को शामिल नहीं किया गया है जिसका साफ मतलब है कि रीफ का स्वास्थ्य बताए जा रहे प्रमाणों की तुलना में कहीं ज्यादा खराब हैं.

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    ब्लीचिंग की घटनाएं
    इस अध्ययन के सहलेखक और जेम्स कुक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर टेरी ह्यूज का कहना है कि उनकी टीम ने विशाल मात्रा में ब्लीचिंग की घटनाएं देखी हैं जो साल 2016 से 2107 तक के बीच पानी का तापमान तेजी से बढ़ने से हुई हैं. इसका मूंगे की खात्मे में बहुत अहम योगदान है.

    क्या होती है ये ब्लीचिंग
    मूंगे में ब्लीचिंग या उसका रंग उड़ जाने की प्रक्रिया तब होती है जब मूंगे अपने चमकीले रंग खोने लगते हैं और उनमें पीलापन सा आने लगा है.  मूंगे के चमकीले रंग की वजह एक सूक्ष्म शैवाल (Algae) के कारण होते हैं जिसे जूऑक्सएनथोले (zooxanthellae) कहा जाता है. दोनों ही एक साथ रहकर एक दूसरे के असतित्व को बनाए रखने के लिए योगदान देते हैं.

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    मूंगे की चट्टानों (Coral) के अलग अलग रंगों के पीछे उसमें खास तरह के (शैवाल Algae) की मौजूदगी होता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


    यूं खत्म होता है दोनों का रिश्ता
    जब तापमान बढ़ने लगता है तो कोरल इसके दबाव में आकर इस शैवाल को अपने बाहर निकाल देते हैं. इससे मूंगे में फीकापन आने लगता है और ऐसा लगता है कि उसकी ब्लीचिंग हो गई है. ऐसे में अगर तापमान सामान्य नहीं होता है को मूंगे अपने अंदर शैवाल को आने नहीं देते हैं और अंततः खत्म हो जाते है.

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    जलवायु का यह अकेला संकट नहीं हैं. बहुत से जीवों को बढ़ते तापमान के कारण अपनी जीवन शैली में बदलाव करने पड़ रहे हैं जो उनके या फिर उन पर निर्भर दूसरे जीवों के लिए अस्तित्व का संकट तक बन रहा है. ऐसे में जल्दी कुछ नहीं किया गया तो कुछ प्रजातियां विलुप्त ही हो जाएंगी.
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