इंसान नहीं, जलवायु परिवर्तन की वजह से विलुप्त हो गई गैंडों की यह खास प्रजाति

इंसान नहीं, जलवायु परिवर्तन की वजह से विलुप्त हो गई गैंडों की यह खास प्रजाति
14 हजार साल पहले आए जलवायु परिवर्तन के कारण गैंडों की यह प्रजाति विलुप्त हुई जिसमें इंसान का हाथ नहीं था. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

गैंडों (rhinoceros) की हजारों साल पुरानी प्रजाति (Species) विलुप्त (Extinct) होने की वजह जलवायु परिवर्तन (Climate change) था, इंसानी गतिविधियां इसके लिए जिम्मेदार नहीं थीं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 14, 2020, 5:14 PM IST
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जलवायु परिवर्तन (Climate change) के नुकसान हम इंसान को दिखने लगे हैं. इस खतरे के वजह से जो भविष्यवाणियां की जा रही थीं, उनके होने के समय में भी बदलाव की आशंका होने लगी है. लेकिन इस जलावायु परिवर्तन में हजारों साल पहले गैंडों की एक प्रजाति खत्म (Extinct) कर दी थी. भूरे रंगे के ये ऊनी गैंडे (woolly brown rhinoceros) दो टन के वजन के थे जो उत्तर पूर्वी साइबेरिया (Siberia) में विचरण करते थे. लेकिन शोधकर्ताओं के सामने यही सवाल था कि क्या इस बदलाव के जिम्मेदार इंसान (Humans) थे जिसके कारण ये गैंडे विलुप्त हो गए.

14 हजार साल पहले हुआ था ये
यह प्रक्रिया आज से 14 हजार साल पहले हुई थी फिर भी यह सवाल उठा कि क्या यह जलावयु परिवर्तन इंसानों के कारण हुआ था या फिर उस दौरान बढ़ती गर्मी की वजह इंसान नहीं थे. स्वीडन और रूस के वैज्ञानिकों की एक टीम ने पुराने समय के 14 स्तनपायी जीवों की प्रजातियों के डीएनए के हिस्सों का अध्ययन किया जिन्हें इंसान अपने लिए उपयोग में लाने के लिए पाला करते थे. लेकिन इन प्रजातियों में शोधकर्ताओं ने इन ऊनी गैंडों को भी शामिल किया.

कैसे गिरने लगी इनकी संख्या
शोधकर्ताओं का कहना है कि कोएलोडोन्टा एंटिक्विटाटिस वैज्ञानिक नाम के ये गैंडे, करीब दस लाख साल तक जिंदा रहे और इंसान के साथ रहे, लेकिन पिछले हिम युग के अंत के बाद उनकी संख्या तेजी से गिरने लगी.



इंसान नहीं जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार
स्वीडन के पेलेओजेनेटिक्स सेंटर की जेनेटिसिस्ट लव डालेन का कहना है, “इससे यह संभावना बढ़ जाती है कि 14 हजार साल पहले हुए जलवायु परिवर्तन के कारण ये जीव विलुप्त हुए थे, ना कि इंसानी गतिविधियों के कारण.”  डालेन की अगुआई में हुआ यह शोद करेंट बायोलॉजी में प्रकाशित हुआ है.
कैसे निकाला यह नतीजाशोधकर्ताओं ने हजारों साल तक बर्फ में दबे रहे जानवरों के अवशेषों के डीएनए के आधार पर यह निष्कर्ष कैसे निकाला. डालेन ने इसका कारण बताते हुए कहा कि किसी प्रजाति की संख्या का आकार उसके जेनेटिक विविधता और अंतःप्रजनन के स्तरों के समानुपातिक होता है.जीनोम ने की मददशोधकर्ता 18,500 साल पहले एक गैंडे को जोड़े के मिलाप के पूरे जीनोम का विश्लेषण करने में कामयाब रहे. इसके बाद दोनों के वंश के क्रोमोजोम्स की तुलना के आधार पर वे यह पता लगा सके कि उनमें अंतःप्रजनन कम था और उनकी विविधता ज्यादा थी. डालेन ने बताया कि एक जीव का जीनोम उसके सभी पूर्वजों के बारे में काफी कुछ बता देता है. 18 हजार साल पहले वह गेंडा विशाल जनसंख्या का हिस्सा रहा होगा. दूसरे जानवरों से शोधकर्ता माइटोकॉन्ड्रिया जीनोम निकाल सके जो माता से आया था. जिससे उस समय की मादा जनसंख्या के बारे में पता चला.इंसानों का भी था असरइंसान साइबेरिया के इस हिस्से में तीस हजार साल पहले आए थे. उन्होंने गैंडों का शिकार भी किया, लेकिन इन जानवरों की संख्या 12 हजार सालों से ज्यादा के समय तक स्थायी ही रही, जबतक वार्मिंग का युग नहीं आ गया. इस युग को बोलिंग-एलेरॉड कहते हैं.


मैथम का भी किया था ऐसा विश्लेषण
इसी टीम ने इससे पहले एक अन्य विशाल जीव मैमथ का जीनोम प्रकाशित किया था और उनका मानना है कि यह प्रजाति भी जलवायु परिवर्तन के कारण  विलुप्त हुई थी इंसानी शिकारी गतिविधियों के कारण नहीं. उनके नतीजे आज भी विज्ञान जगत में बहस का विषय हैं. मैमथ विशालकाय ऊनी हाथी हुआ करते थे और वे दो बार विलुप्त हुए.  एक बार वे साइबेरिया से गैंडों के साथ ही विलुप्त हुए लेकिन उनमें से कुछ रैंगल द्वीप में साठ लाख साल तक बचे रहे.

आज इन ऊनी गैंडों की प्रजाति के सबसे निकतम गैंडे सुमात्रा के गैंडे हैं. लेकिन उनके आवास के नष्ट होने के और शिकार होने के कारण ये केवल 80 ही बचे हैं. यहां पर कोई यह नहीं कह सकता कि इस बार इंसान का कोई कसूर नहीं है.
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